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प्रमोद भार्गव का ब्लॉग: अमेरिका-रूस ने बढ़ाया परमाणु युद्ध का खतरा

By लोकमत न्यूज़ ब्यूरो | Updated: October 30, 2018 15:18 IST

ट्रम्प ने आईआरएनएफ यानी ‘मध्यम दूरी परमाणु शक्ति संधि’ से पृथक होने और नए व ज्यादा मारक क्षमता वाले परमाणु शस्त्र बनाने की घोषणा करके दुनिया को चिंतित कर दिया है।

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अभी तक दुनिया को परमाणु युद्ध का खतरा पाकिस्तान और उत्तर कोरिया की जमीन से झांकता दिखाई देता रहा है। पाकिस्तान से यह आशंका इसलिए ज्यादा थी, क्योंकि वहां की जमीन पर आतंक के खिलाड़ी पनाह लिए हुए हैं, लिहाजा भूल से भी उनके हाथ परमाणु हथियार लग गए तो दुनिया को तबाह करने में उन्हें देर नहीं लगेगी। परंतु अब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन के ताजा बयानों के बाद इस डर की दिशा बदलती दिख रही है।

ट्रम्प ने आईआरएनएफ यानी ‘मध्यम दूरी परमाणु शक्ति संधि’ से पृथक होने और नए व ज्यादा मारक क्षमता वाले परमाणु शस्त्र बनाने की घोषणा करके दुनिया को चिंतित कर दिया है। वहीं दूसरी तरफ इस ऐलान की प्रतिक्रिया में पुतिन ने कहा है कि ‘अगर अमेरिका ने संधि से पलटने का फैसला लिया तो रूस भी इसका प्रभावी ढंग से उत्तर देगा। जिस किसी भी यूरोपीय देश ने अमेरिका की परमाणु मिसाइलों को अपने देश में जगह दी तो उसे निशाना बनाया जाएगा।’ मतलब वैश्विक शक्तियां पुरानी परमाणु संधियों से अलग  होती हैं तो इन्हीं परमाणु शक्तियों को युद्ध का शंखनाद करने में देर नहीं लगेगी। युद्ध यदि हुआ तो वैश्विक परमाणु युद्ध में बदलना तय है। 

दरअसल ट्रम्प जो भी अंतर्राष्ट्रीय संधियां हैं, उन्हें शक की निगाह से देख रहे हैं। हालांकि संधि बनाए रखने की दृष्टि से उन्होंने यह भी कहा है कि यदि रूस और चीन घोषणा कर दें कि दोनों देश संधि पर पुनर्विचार के लिए तैयार हैं, तो अमेरिका अपना फैसला बदल सकता है। लेकिन रूस व चीन अमेरिका की धमकी के आगे क्यों घुटने टेकेंगे? यदि अमेरिका संधि पर पुनर्विचार का शांतिपूर्ण ढंग से प्रस्ताव रखता तो एक बार इस पर विचार की संभावना रूस व चीन कर सकते थे।

लेकिन धमकी तो आखिर में टकराव के रास्ते ही खोलती है, इसीलिए रूस ने ईंट का जवाब पत्थर से दे भी दिया है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इस संधि को लेकर उपजे विवाद को दोनों देश को बातचीत से हल करने का सुझाव दिया है। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं जिस तरह से अप्रासंगिक होती जा रही हैं, उससे लगता नहीं कि इन महाशक्तियों पर उसका पर्याप्त दबाव बन पाएगा।

दरअसल इस संधि की समय-सीमा दो साल बाद खत्म हो रही है, इसलिए अमेरिका अब अपने देशहित के चलते इसके नवीनीकरण के पक्ष में नहीं है। इस संधि का ही नतीजा था कि शीतयुद्ध के समय दुनिया तनावमुक्त रही। इससे यह भरोसा बना हुआ था कि दुनिया एकाएक परमाणु विभीषिका की भट्टी में नहीं झोंकी जाएगी। संधि अगर टूटती है तो दुनिया कभी भी परमाणु हमले की चपेट में आ सकती है। हालांकि 20 अक्तूबर को ट्रम्प ने जो बयान दिया है, वह प्रस्ताव अभी अमेरिकी सीनेट से अनुमोदित नहीं हुआ है। इसलिए यह कहना भी मुश्किल है कि यह संधि समाप्त हो ही जाएगी।

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