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विजय दर्डा का ब्लॉग: अफगानी महिलाओं के अंजाम पे रोना आया

By विजय दर्डा | Updated: July 26, 2021 14:42 IST

तालिबान ने अब तक जिन इलाकों पर कब्जा जमाया है वहां शरिया के नाम पर बर्बरता शुरू कर दी है। ऐसा फरमान जारी कर दिया है कि पंद्रह साल से ज्यादा उम्र की कुंवारी लड़कियों और विधवाओं की सूची तैयार की जाए।

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ठळक मुद्देतालिबान ने अब तक जिन इलाकों पर कब्जा जमाया है वहां शरिया के नाम पर बर्बरता शुरू कर दी है।1996 में जब तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा किया था तब भी महिलाओं को भुगतना पड़ा था। कई शहरी इलाकों में महिलाएं कलाश्निकोव राइफलें और अफगानिस्तान का झंडा लिए सड़कों पर निकलीं।

एक अंतरराष्ट्रीय न्यूज चैनल की एक छोटी सी वीडियो क्लिपिंग ने मुझे भीतर तक हिला कर रख दिया है। वीडियो में कोई चौदह-पंद्रह साल की एक बच्ची चीख रही है, चिल्ला रही है। उसके माता-पिता रहम की भीख मांग रहे हैं लेकिन तालिबान के आतंकी बच्ची को परिवार से छीन कर ले जा रहे हैं। बच्ची अब किसी तालिबानी भेड़िए को हवस बुझाने के लिए दे दी जाएगी। जंग में वह भेड़िया किसी दिन मारा जाएगा तो बच्ची किसी दूसरे भेड़िए को परोस दी जाएगी! उस बच्ची की यह किस्मत है!

..और वह बच्ची अकेली ऐसी बदनसीब नहीं है। उस जैसी लाखों बच्चियों की अफगानिस्तान में यही किस्मत है। तालिबान ने अब तक जिन इलाकों पर कब्जा जमाया है वहां शरिया के नाम पर बर्बरता शुरू कर दी है। ऐसा फरमान जारी कर दिया है कि पंद्रह साल से ज्यादा उम्र की कुंवारी लड़कियों और विधवाओं की सूची तैयार की जाए। जाहिर सी बात है कि ये सारी बच्चियां और महिलाएं आतंकियों की हवस बुझाने के काम आएंगी। हालांकि कतर में बैठा तालिबान का नेतृत्व इस तरह की घटनाओं से इनकार कर रहा है लेकिन अफगानिस्तान की सरजमीं को रक्तरंजित कर रहे तालिबानी आतंकवादी हर रोज लड़कियों को अगवा कर रहे हैं। उन इलाकों में तो अब मीडिया भी काम नहीं कर रहा है कि पूरी सच्चाई सामने आए लेकिन छन छन कर जो तस्वीरें और खबरें सामने आ रही हैं वे जेहन को दर्द से भर रही हैं। 

1996 में जब तालिबान ने पूरे अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया था तब सबसे ज्यादा खामियाजा महिलाओं को ही भुगतना पड़ा था। बच्चियों की पढ़ाई बंद हो गई थी। आपको याद ही होगा कि मलाला को किस कदर मौत के घाट उतारने की कोशिश की गई थी क्योंकि वह बच्चियों की पढ़ाई के हक में चुपके से अपनी आवाज दुनिया तक पहुंचा रही थी। तो क्या अब फिर बच्चियां घरों में कैद हो जाएंगी? यह सवाल जब कतर में तालिबान के प्रवक्ता सुहैल शाहीन से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि महिलाओं को शिक्षा और काम करने की आजादी तो होगी लेकिन शरिया कानून के तहत और उन्हें हिजाब भी पहनना होगा। आपको याद दिला दें कि 1996 से 2001 के बीच तालिबान के शासन के दौरान हिजाब न पहनने वाली महिलाओं की बात तो छोड़िए जिसकी उंगलियां भी दिख जाती थीं उस महिला को कोड़ों से पीटा जाता था। महिला अपने घर के किसी पुरुष सदस्य के बगैर घर से बाहर नहीं निकल सकती थी। तालिबान की हरकतें बता रही हैं कि पुराने काले दिन और भयावह रातें फिर लौटने वाली हैं। 

अफगानिस्तान की धरती पर 2001 में जब अमेरिका उतरा और तालिबान सिमटने लगा था तब वहां की महिलाओं की जिंदगी में उजाले की किरण दिखी। बच्चियां स्कूल जाने लगीं।  महिलाओं पर क्रूरता कम हुई। महिलाएं दफ्तरों में काम के लिए निकलने लगीं। बीते 20 वर्षो में अफगानिस्तान में वाकई बहुत कुछ बदला लेकिन अमेरिका ने अचानक अफगानिस्तान से अपने सैनिक वापस बुलाने का निर्णय ले लिया तो अफगानिस्तान की महिलाओं के पैरों तले जमीन खिसक गई! अब तालिबान को कौन रोकेगा? हालांकि वहां की ग्रामीण महिलाओं को भेदभाव की तो पैदाइशी आदत है क्योंकि घर के बाहर किसी महिला का नाम भी नहीं लिया जाता। यहां तक कि डॉक्टर की पर्ची पर भी 'अमुक की बेटी' या 'अमुक की पत्नी' लिखा जाता है। न जन्म प्रमाण पत्र पर नाम होता है और न मृत्यु प्रमाण पत्र पर! यह विडंबना उनकी जिंदगी में शामिल है लेकिन शहरी क्षेत्रों में हालात बेहतर हो रहे थे। तालिबान के आने की आहट ने भय और संशय का कोहरा खड़ा कर दिया है। समस्या यह है कि अफगानिस्तान में महिलाओं की आवाज बुलंद करने वाला भी कोई नहीं है और तालिबान किसी की आवाज सुनता कहां है?

लेकिन इस बार कुछ बहादुर अफगानी महिलाएं तालिबान तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए आगे आई हैं। अफगानिस्तान के काबुल, फारयाब, हेरात, जोजजान और गौर जैसे शहरी इलाकों में सैकड़ों अफगानी महिलाएं हाथों में कलाश्निकोव राइफलें और अफगानिस्तान का झंडा लिए सड़कों पर निकलीं। वे दुनिया के सामने यह प्रदर्शित करना चाह रही हैं कि तालिबान का शासन उन्हें मंजूर नहीं। इसलिए तालिबान से जंग में वे नेशनल आर्मी के साथ हैं और बर्बर आतंकवादियों को भी समझ लेना चाहिए कि महिलाएं उनकी हवस के लिए मांस का लोथड़ा नहीं हैं। वे भी जंग लड़ सकती हैं और जंग के लिए तैयार हैं। संभव है कि अफगान सेना इस तरह की बहादुर महिलाओं को ट्रेनिंग और हथियारों से लैस भी करे! बहरहाल, शहरों में तो शायद यह संभव भी हो जाए कि नेशनल आर्मी के साथ वे आएं और जंग लड़ें लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में क्या होगा?

मौजूदा वक्त की दर्दनाक और कड़वी हकीकत यही है कि अफगान सेना ने भी ग्रामीण क्षेत्रों को बेसहारा छोड़ दिया है। अफगान नेशनल आर्मी सारा ध्यान देश की राजधानी काबुल और विभिन्न प्रांतीय शहरों की सुरक्षा पर लगा रही है। इसका फायदा तालिबान ने तत्काल उठाया और ग्रामीण इलाकों को अपने कब्जे में ले लिया है। अभी यह कहना मुश्किल है कि देश का कितना हिस्सा तालिबान के पास है और कितना इलाका सेना के पास है लेकिन जहां भी तालिबान है वहां महिलाओं की जिंदगी नरक से भी बदतर हो गई है। अफगानिस्तान की 3 करोड़ 80 लाख की आबादी में महिलाओं की संख्या करीब 1 करोड़ 80 लाख है। तालिबान ने इनकी जिंदगी में फिर से अंधेरा घोल दिया है और दुनिया खामोश है! 

मुझे इन महिलाओं के अंजाम पे रोना आ रहा है..!

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