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विश्वनाथ सचदेव का ब्लॉग: राजनीति में न हो कथनी-करनी का फर्क

By विश्वनाथ सचदेव | Updated: January 6, 2021 14:57 IST

हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था को आज सिर्फ इसी खतरे का ही सामना नहीं करना पड़ रहा. एक और गंभीर मुद्दा भी है जो हर भारतीय की चिंता का विषय होना चाहिए. जनतंत्न के औचित्य और सफलता के लिए एक सुदृढ़ विपक्ष बुनियादी जरूरत है.

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हमारी राजनीति का दुर्भाग्य ही है कि इसमें सफलता के लिए आस्था की बैसाखी सबको जरूरी लगने लगी है. यह हमारी त्नासदी भी है. पता नहीं वह दिन कब आएगा, आएगा भी या नहीं, जब हमारे राजनेता नीतियों, मूल्यों और जनतंत्न में सच्ची श्रद्धा के नाम पर वोट मांगना जरूरी समझेंगे?

नीतियों-मूल्यों की बात तो अब भी की जाती है, पर वह हमारी राजनीति का सिर्फ दिखाने वाला चेहरा है. देश के भविष्य की दृष्टि से यह एक बड़ा संकट है.

हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था को आज सिर्फ इसी खतरे का ही सामना नहीं करना पड़ रहा. एक और गंभीर मुद्दा भी है जो हर भारतीय की चिंता का विषय होना चाहिए. जनतंत्न के औचित्य और सफलता के लिए एक सुदृढ़ विपक्ष बुनियादी जरूरत है.

कमजोर विपक्ष सत्तारूढ़ दल और उस दल की पहचान बने नेतृत्व को तानाशाह बनने का अवसर देता है. यह स्थिति जनतंत्न के लिए खतरे की घंटी है. इस घंटी की आवाज को अनसुना करना जनतंत्न के प्रति अपनी अनास्था दिखाने से कम नहीं है.

हमने एक पंथ-निरपेक्ष, सार्वभौम गणतंत्न की शपथ ली थी, जिसमें गण की प्रतिष्ठा सर्वाधिक होगी. इस गणतंत्न में धर्म, जाति, वर्ण, वर्ग के आधार पर किसी भी प्रकार का भेद-भाव नहीं होगा. बातें तो अब भी इसी आशय की होती हैं, पर व्यवहार में जो कुछ सामने आ रहा है, वह इस सबका उल्टा दिखाई देता है.

हमने धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र बनाने की शपथ ली थी, आज धर्म के नाम पर सत्ता हथियाने का खेल खुलेआम चल रहा है; हमने समानता के आधार पर एक समाज के बनने का सपना देखा था, आज समाज में न अवसर की समानता है, न उपलब्धियों की.

एक तरफ आर्थिक सत्ता कुछ हाथों में सिमटती जा रही है, दूसरी ओर गरीब और गरीब होता जा रहा है. सबके विकास के वादे तो बहुत हुए हैं, पर हम विकास के टापू ही बना पा रहे हैं. भविष्य के प्रति एक चिंता और अविश्वास का भाव लगातार पनप रहा है.

यूं तो चुनौती हर विवेकशील नागरिक के लिए है, पर बड़ा दायित्व उन राजनीतिक दलों का है जो जनता में विश्वास पैदा नहीं कर पा रहे. अकेली कांग्रेस या कोई एक दल आज की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाएगा.

जनतंत्न की सफलता की शर्त होती है एक मजबूत सरकार और एक सुदृढ़ विपक्ष. यह सुदृढ़ विपक्ष तभी सार्थक होगा जब उद्देश्य सिर्फ सत्ता में आना नहीं, एक बेहतर समाज, बेहतर देश बनाना होगा.

मजबूत सरकार होना अच्छी बात है, पर मजबूत विपक्ष का होना भी उतना ही जरूरी है. सत्ता के खेल में हमारे राजनीतिक दल इस बात को कब समझेंगे?

टॅग्स :भारतकांग्रेस
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