Life Lessons one can learn from childhood | तुमसे सीख रहा हूँ में गिर कर उठना और बिना किसी डर के कुछ भी कर जाना

जब कठिन ये रास्ता न था,
इस संसार से वास्ता न था।
तनावरहित जब यह मन था,
कितना अनमोल बचपन था।

उत्सुकता प्रबल जब होती है,
वो बचपन बिलकुल दीवाना होता है।
हर चीज जानने को हठ करता है,
वह दुनिया के झूठ, फरेब से बेगाना होता है।
प्रभु का स्वरूप है, वह हृदय अनमोल,
उसके मुख से निकलते हैं प्रभु के अपने बोल।
अपनी नई दुनिया बसाने का सपना रहता सवार है,
उस दुनिया में जीने का आनंद अपार है।

बचपन की तरह ही सीधी - सादी सी हैं ये पंक्तियां लेकिन कितनी सच्चाई है इनमें.

मेरा भी कभी बचपन रहा होगा, अल्हड़ सा, उन्मुक्त सा, बेफ़िक्र सा. अभी दो बच्चों का पिता हूँ लेकिन हर एक निर्णय बेहद कठिन सा लगता है, आसानी से कोई भी कदम नहीं उठा सकता है मेरा जीवन। मेरा वर्तमान समय हमेशा दुविधा में रहता है, कोई भी निर्णय लेने से पहले उसके बारे में पूरा नाप तौल करता है. क्या होगा अगर यह निर्णय गलत निकला तो, यह नकारात्मक सोच सकारात्मक सोच पर हमेशा भारी पड़ती है और कदम हमेशा पीछे खींच जाते हैं.

कितना बिंदास होता है बचपन, उनको कभी भी सही या गलत के तराज़ू में परिस्थिति को तौलने की ज़रुरत आन नहीं पड़ती. मेरे दो बच्चे हैं, बड़ी बेटी 8 साल की है और 6 महीने का छोटा सा बेटा. बेफिक्री क्या होती है, ये तो जनाब इन बच्चों से ही सीख सकते हैं. छोटे साहब को तो हर चीज़ के बारे में जानना ज़रूरी है. अगर बेड पर लेटा हुआ हो तो हर चीज़ को हाथ से छूने की ज़िद. कई बार इस ज़िद की वजह से महाशय बेड से नीचे भी गिर चुके हैं लेकिन यह ज़िद ख़त्म नहीं हुई. हर बार कुछ नया करने की ज़िद. हाथ में कुछ भी हो बस होना चाहिए. जूता, चप्पल, अखबार का टुकड़ा, फ़ोन, कुछ भी. अखबार का अगर टुकड़ा ना हो तो कुछ देर में टुकड़ा हो ही जाता है. तार - तार कर देता हैं अखबार को छोटा सा बच्चा लेकिन सब कुछ जानने की लालसा ख़त्म नहीं होती.

हम कई बार जीवन में एक कदम तक लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाते, एक डर कि आगे क्या होगा हमारे कदमों को पीछे खींच लेता है. ऐसा डर मैंने इस मासूम से बचपन में नहीं देखा. लुढ़क कर चलना, गिर जाना, गिर कर फिर उठना और चलना शुरू कर देना, बिना इस डर के कि फिर से ना गिर जायें. बचपन जो मासूम सा तो होता है लेकिन उसमें कुछ नया  कुछ सीखने का एक ज़ज़्बा होता है. इस उम्र में आते - आते ऐसा ज़ज़्बा ना जाने कहां खो जाता है. जहां हम नंबर की दौड़ में अपने कीमती समय को खोते जा रहे हैं वहीं बचपन ही तो है जो इस तरह की किसी भी दौड़ से कोसों दूर है. किसी भी तरह की प्रतिद्वंदिता से बेअसर, बस आज में जीने का नाम है बचपन। जहां वक़्त तक ठहर जाता है अठखेलियों की आगे उस प्रहर का नाम है बचपन. एक शिक्षक ना होते हुए भी जो हमें अपने आप को ना भूलने की सीख दे जाए, वो है बचपन.

English summary :
Important Life Lessons One Can Learn from Children.


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