लोकलुभावन योजनाओं पर कब लगेगी लगाम ?
By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: January 31, 2026 08:07 IST2026-01-31T08:07:16+5:302026-01-31T08:07:19+5:30
कुछ अधिकारियों ने कई राज्यों द्वारा घोषित लोकलुभावन योजनाओं पर चिंता जताते हुए कहा था कि वे आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं हैं और राज्यों को श्रीलंका के रास्ते पर ले जा सकती हैं.

लोकलुभावन योजनाओं पर कब लगेगी लगाम ?
राज्यों की लोकलुभावन योजनाओं को लेकर गुरुवार को संसद के दोनों सदनों में पेश आर्थिक समीक्षा में जो चिंता जताई गई है, वह वास्तव में एक बहुत ही गंभीर विषय है. यह कोई नई बात नहीं है. वर्ष 2022 में जब श्रीलंका में गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हुआ था, उसी समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वरिष्ठ नौकरशाहों के साथ बैठक में कुछ अधिकारियों ने कई राज्यों द्वारा घोषित लोकलुभावन योजनाओं पर चिंता जताते हुए कहा था कि वे आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं हैं और राज्यों को श्रीलंका के रास्ते पर ले जा सकती हैं.
भारत में चुनावों के दौरान बढ़ते फ्रीबी कल्चर यानी मुफ्त सुविधाओं और नकद वादों पर पूर्व रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर डी. सुब्बाराव ने भी पिछले साल गंभीर चिंता जाते हुए कहा था कि इन मुफ्त योजनाओं से चुनाव भले ही जीते जा सकते हों, लेकिन इससे देश का भविष्य मजबूत नहीं होता. सुब्बाराव ने चेतावनी देते हुए कहा था कि ऐसी योजनाओं को पूरा करने के लिए सरकारें उधार ले रही हैं, लेकिन आज का खर्च लोगों के आने वाले कल पर बोझ बन रहा है, आज दिया गया पैसा आने वाली पीढ़ियों को चुकाना होगा.
विडंबना यह है कि इन सारी चिंताओं के बावजूद लोकलुभावन योजनाओं का विस्तार होता ही जा रहा है और कोई भी राजनीतिक दल इस मामले में पीछे नहीं रहना चाहता. दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि चुनावों के दौरान मतदाताओं को ‘चारा’ डालने वाली ऐसी योजनाओं से राजनीतिक दलों का उल्लू सीधा भी हो रहा है.
एक राज्य के चुनाव में इससे सफलता मिलती है तो अगले चुनाव में दूसरे राज्य में भी इस फार्मूले को दुहराया जाता है और इस तरह यह बीमारी महामारी की तरह पूरे देश में फैल गई है, न तो राज्यों के चुनाव इससे अछूते रह गए हैं और न केंद्र के. लेकिन अब इसके दुष्परिणाम नजर आने लगे हैं इसलिए गंभीर चिंता जताई जाने लगी है. मुफ्त में पैसे बांटने वाली योजनाओं से सरकारी खजाना तो खाली होता ही है, अब भारतीय सरकारी बांड वैश्विक निवेशकों के लिए भी उपलब्ध होने के कारण निवेशक सरकार की वित्तीय स्थिति का लगातार मूल्यांकन कर रहे हैं, इसलिए अब यह केवल स्थानीय समस्या नहीं रह गई है बल्कि इसका सीधा असर देश की सरकारी उधारी लागत पर पड़ता है.
सरकार लोकलुभावन योजनाओं पर चिंता जता रही है, उधर सुप्रीम कोर्ट भी इस पर सख्त टिप्पणी करते हुए एक साल पहले ही केंद्र से सवाल पूछ चुका है कि ‘क्या आप मुफ्त की योजनाएं लागू करके परजीवियों की जमात नहीं खड़ी कर रहे हैं?’ इसके बाद भी अगर राजनीतिक दलों को शर्म नहीं आ रही है तो आम जनता को ही इस पर लगाम लगाने के लिए आगे आना होगा और साबित करना होगा कि इस तरह के शार्टकट अपनाने से चुनाव नहीं जीता जा सकता है.