जब सोनिया गांधी ने राहुल के प्रस्ताव को रोका

By हरीश गुप्ता | Updated: May 6, 2026 10:14 IST2026-05-06T10:12:04+5:302026-05-06T10:14:42+5:30

हालांकि, दिल्ली के सुरक्षा हलकों में चल रही चर्चा से संकेत मिलता है कि परिणाम केवल सेनाओं के भीतर ही सीमित नहीं रह सकता है.

When Sonia Gandhi blocked Rahul's proposal | जब सोनिया गांधी ने राहुल के प्रस्ताव को रोका

जब सोनिया गांधी ने राहुल के प्रस्ताव को रोका

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गुप्त गलियारों में, तमिलनाडु की पहेली रणनीति से ज्यादा पारिवारिक विवाद का रूप लेने लगी थी. राहुल गांधी बेचैन और अधीर होकर, चुपचाप एक राजनीतिक दांव खेलने की तैयारी कर रहे थे - पुराने दिग्गज दल द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) को छोड़कर अभिनेता से नेता बने विजय के नेतृत्व वाली तमिलगा वेट्री कषगम (टीवीके) के साथ साहसिक गठबंधन की संभावना तलाश रहे थे. संकेत सूक्ष्म लेकिन स्पष्ट थे. इस साल जनवरी की शुरुआत में सेंसरशिप विवादों पर विजय के प्रति राहुल का सार्वजनिक बचाव कोई आकस्मिक संयोग नहीं था - यह एक राजनीतिक संकेत था.

कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों में पर्दे के पीछे की बातचीत, दूतों द्वारा स्थिति का जायजा लेने और एक नई दक्षिणी रणनीति तैयार किए जाने की चर्चा थी. द्रमुक के अधीन रहने से ऊब चुकी राज्य इकाई भी पूरी तरह से इसके विरोध में नहीं थी. लेकिन द्रमुक कोई जोखिम नहीं लेना चाहती थी. वरिष्ठ नेता कनिमोझी चुपचाप दिल्ली के लिए रवाना हुईं और जनवरी की ठंडी शाम को 10 जनपथ पर उतरीं. उनका संदेश स्पष्ट था : कोई भी विवाद न छेड़ें. फिर भी, राहुल अपने रुख पर अड़े रहे.

गतिरोध गहराता गया और तमिलनाडु में गठबंधन का समीकरण टूटने के कगार पर पहुंच गया. ऐसे में सोनिया गांधी का आगमन हुआ. तीन मार्च को कांग्रेस की वरिष्ठ नेता ने अपने विशिष्ट दृढ़ निश्चय के साथ हस्तक्षेप किया. फोन किए गए, सीमाएं तय की गईं और एमके स्टालिन से सीधा संपर्क स्थापित किया गया. संदेश स्पष्ट था- कोई जोखिम नहीं लिया जाएगा. डीएमके गठबंधन कायम रहेगा. राहुल का प्रयोग शुरू होने से पहले ही समाप्त हो गया. अनिच्छा से ही सही, पार्टी ने बात मान ली.

सीटों का बंटवारा तय किया गया और एकता का दिखावा फिर से कायम किया गया. यह अलग बात है कि राहुल गांधी ने किसी भी संयुक्त रैली को संबोधित नहीं किया और दूरी बनाए रखी. लेकिन राजनीति में समय का खेल बहुत क्रूर होता है. जैसे-जैसे नतीजे आने शुरू हुए, कानाफूसी तेज होती गई- क्या राहुल ने वह देख लिया था जो दूसरे नहीं देख पाए?

टीवीके के उदय ने जमीनी हकीकत में बदलाव का संकेत दिया, जिस पर कांग्रेस ने आगे बढ़ने का फैसला नहीं किया. फिलहाल, अनुशासन ने सहज प्रवृत्ति पर विजय प्राप्त कर ली. राहुल ने टालमटोल किया, सोनिया गांधी ने फैसला लिया. और तमिलनाडु में कहीं न कहीं, एक छूटा हुआ अवसर खामोशी से नजर आता रहा.

अमित शाह ने केजरीवाल के किले को कैसे भेदा

कई वर्षों तक, आम आदमी पार्टी के दस सांसदों के सुगठित लेकिन जुझारू राज्यसभा गुट ने अपनी क्षमता से कहीं अधिक प्रभाव डाला और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को हर मोड़ पर चुनौती दी. यहां तक कि जब स्वाति मालीवाल ने गठबंधन तोड़ा, तब भी यह किला डटा रहा- दरारें दिखाई दीं, लेकिन कोई पतन नहीं हुआ. फिर वो पल आया जिसने सारी कहानी बदल दी. अरविंद केजरीवाल के कभी चहेते रणनीतिकार रहे राघव चड्ढा जब पार्टी में अपनी पकड़ खोने लगे, तो हलचल शुरू हो गई. फुसफुसाहटें दबी हुई चर्चाओं में बदल गईं; बेचैनी को एक दिशा मिल गई. दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में सुर्खियां बनने से पहले ही हलचल का आभास हो गया था. इसके बाद जो कुछ हुआ, उसमें राजधानी की किसी क्लासिक साजिश के सभी तत्व मौजूद थे.

दिल्ली की उमस भरी रात में, नियमित राजनीतिक गतिविधियों के समय के काफी बाद, आम आदमी पार्टी के सात सांसद अमित शाह के आवास पर गुप्त रूप से पहुंचे और एक बंद कमरे में बैठक की, जिसे अंदरूनी सूत्रों ने निर्णायक बताया है. यह महज शिष्टाचार भेंट नहीं थी. शाह ने अपने विशिष्ट सधे हुए अंदाज में एक ठोस राजनीतिक मुद्दा रखा- पंजाब की ठप पड़ी सरकार, केंद्र सरकार की योजनाओं का अनियमित क्रियान्वयन और आम आदमी पार्टी के भीतर प्रासंगिकता के लिए सिकुड़ता दायरा. जब बैठक आधी रात के करीब समाप्त हुई, तब तक पासा पलट चुका था.

दिल्ली में हमेशा की तरह, संख्याएं शोर से कहीं अधिक निर्णायक साबित हुईं. दो-तिहाई से अधिक दल-बदल के लिए तैयार थे, और दल-बदल विरोधी कानून बाधा से एक पुल में तब्दील हो गया. केजरीवाल का किला धमाके के साथ नहीं गिरा - उसे चुपचाप अंदर से तोड़ दिया गया. राजधानी के इस गुप्त सत्ता संघर्ष में, यह एक विद्रोह से कहीं अधिक आधी रात को की गई एक कार्रवाई थी - तेज, शांत और बेहद प्रभावी.

नए सीडीएस के नाम पर अनुमान का बढ़ता रोमांच

एक तरफ जहां पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के कारण रणनीतिक चर्चाओं में हलचल मची हुई है, वहीं भारत के सैन्य तंत्र में एक शांत लेकिन उतनी ही गहन उथल-पुथल चल रही है: अगला चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ कौन होगा? जनरल अनिल चौहान का विस्तारित कार्यकाल 30 मई, 2026 को समाप्त हो रहा है, ऐसे में यह दौड़ निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुकी है- हालांकि आधिकारिक तौर पर, यह पद सभी की दावेदारी के लिए खुला है. समय को देखते हुए मामला और भी पेचीदा हो गया है. सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी और नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी, दोनों कुछ ही महीनों में सेवानिवृत्त होने वाले हैं, जिससे उनके नाम इस पद के लिए दावेदारी में आ गए हैं. स्वाभाविक रूप से, पैरवी तेज हो गई है, और इस बात पर पैनी नजर रखी जा रही है कि सत्ता का संतुलन कैसे बदलेगा. हालांकि, दिल्ली के सुरक्षा हलकों में चल रही चर्चा से संकेत मिलता है कि परिणाम केवल सेनाओं के भीतर ही सीमित नहीं रह सकता है. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल को इस तरह की नियुक्तियों में एक प्रमुख प्रभावशाली व्यक्ति माना जाता है.

उनके सैन्य सलाहकार, लेफ्टिनेंट जनरल एस. राजा सुब्रमणि, एक गंभीर दावेदार के रूप में उभरे हैं - जो चौहान के इसी पद से सीडीएस तक के सफर को दर्शाते हैं. चौहान और भारत के पहले सीडीएस, दिवंगत जनरल बिपिन रावत, दोनों को डोभाल के रणनीतिक दृष्टिकोण के करीब माना जाता था. हालांकि, किसी सेवानिवृत्त सेना जनरल की एक और नियुक्ति से नौसेना और वायु सेना में असंतोष पैदा हो सकता है, जो लंबे समय से सेना के संस्थागत प्रभुत्व का विरोध करती रही हैं.

आखिरकार, सीडीएस पद का उद्देश्य ही सभी सेवाओं में समन्वय और एकीकरण को बढ़ावा देना था. अब जब पात्रता मानदंडों का दायरा बढ़ाकर सेवारत और सेवानिवृत्त तीन-सितारा अधिकारियों को भी शामिल कर लिया गया है, तो सरकार के पास लचीलापन है. असली परीक्षा यह होगी कि क्या वह इस लचीलेपन का उपयोग संतुलन को मजबूत करने के लिए करती है-या निरंतरता को बनाए रखने के लिए.

क्या भाजपा बंगाल में किसी महिला पर दांव लगाएगी?

पश्चिम बंगाल में भाजपा की शानदार जीत के साथ ही सारा ध्यान जीत से हटकर इस अहम सवाल पर केंद्रित हो गया है कि ममता बनर्जी की जगह कौन लेगा? भाजपा मुख्यालय में यह चर्चा जोरों पर है कि क्या बंगाल को भगवा खेमे से पहली महिला मुख्यमंत्री मिल सकती है? आखिरकार, भाजपा 18 राज्यों में अकेले सत्ता में है. नरेंद्र मोदी ने भाजपा मुख्यालय में पहले ही स्पष्ट संकेत दे दिए हैं, खासकर महिला आरक्षण को बढ़ावा देने के बाद, नारी शक्ति को पार्टी की राजनीति का केंद्रबिंदु बताते हुए.

यह प्रस्ताव देखने में आकर्षक लगता है. एक महिला मुख्यमंत्री विपक्ष के हमलों को कमजोर कर देगी और भाजपा के महिला समर्थक रुख को मजबूती प्रदान करेगी. अग्निमित्रा पॉल और रूपा गांगुली जैसे नामों की चर्चा चल रही है. लेकिन मुकाबला अभी खत्म नहीं हुआ है. नंदीग्राम के दिग्गज नेता सुवेंदु अधिकारी और दिलीप घोष जैसे दिग्गज नेता भी इस दौड़ में शामिल हैं. दूसरी बात यह है कि भाजपा के पास राज्य में कोई मजबूत महिला नेता भी नहीं है.

Web Title: When Sonia Gandhi blocked Rahul's proposal

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