ऊर्जा संकट में भी आत्मविश्वास कायम रहने का क्या है राज ?

By आलोक मेहता | Updated: April 2, 2026 07:42 IST2026-04-02T07:41:47+5:302026-04-02T07:42:20+5:30

2018 में  भारतीय कंपनियों को ऑयलफील्ड में 10 प्रतिशत हिस्सेदारी मिली. यह पहला मौका था जब भारत को खाड़ी में उत्पादन में भागीदारी मिली.

What is the secret to maintaining confidence even during energy crisis | ऊर्जा संकट में भी आत्मविश्वास कायम रहने का क्या है राज ?

ऊर्जा संकट में भी आत्मविश्वास कायम रहने का क्या है राज ?

जर्मनी से एक पत्रकार मित्र ने फोन करके जानना चाहा कि युद्ध और वैश्विक तेल ऊर्जा संकट में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा चिंतित होने के बजाय आत्मविश्वास दिखाने और जनता को भी विचलित न होने के लिए कहने का राज क्या है? वैसे आधिकारिक दावे के लिए मैंने उन्हें सरकारी अधिकारियों से विस्तृत जानकारी लेने को कहा लेकिन उनके आग्रह पर मैंने भारत की ऊर्जा क्षमताओं की कुछ पृष्ठभूमि तथा हाल के वर्षों में तेल, पेट्रोल, गैस आदि के लिए हुई तैयारियों की अपनी जानकारियों को उनसे शेयर किया. इसमें कोई शक नहीं है कि भारत विश्व के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है और अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है.

ऐसे में खाड़ी देश - जैसे संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, ओमान, कुवैत आदि भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण ऊर्जा साझेदार रहे हैं. भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां पिछले कई दशकों से इन देशों के साथ तेल आपूर्ति, खोज  और निवेश के समझौते करती रही हैं.

आज भारत केवल तेल खरीदने वाला देश नहीं, बल्कि खाड़ी देशों के साथ निवेशक, साझेदार और ऊर्जा रणनीतिक सहयोगी बन चुका है. भारत ने पिछले एक दशक में ऊर्जा कूटनीति को नए स्तर पर पहुंचाया है. वहीं अफ्रीका में भारत ने दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा के लिए मजबूत आधार तैयार किया है.  

1970-90 के दशक में भारत और खाड़ी देशों के बीच संबंध मुख्यतः ‘तेल खरीद’ तक सीमित थे. भारत कच्चा तेल खरीदता था, निवेश या उत्पादन में भागीदारी बहुत कम थी. भारतीय कंपनियों की अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति सीमित थी. वर्ष 2000 के बाद भारत ने रणनीति बदली और ऊर्जा सुरक्षा  के लिए विदेशों में तेल क्षेत्रों में हिस्सेदारी लेना शुरू किया. ओएनजीसी विदेश लिमिटेड ने विदेशों में निवेश बढ़ाया.

मोदी सरकार आने के बाद 2014  से 2026 के बीच रणनीतिक साझेदारी का नया दौर शुरू हुआ. अब संबंध केवल खरीद तक सीमित नहीं रहे बल्कि निवेश, भंडारण और गैस के संयुक्त उत्पादन के काम होने लगे. संयुक्त अरब अमीरात के साथ ऐतिहासिक समझौते हुए. 2018 में  भारतीय कंपनियों को ऑयलफील्ड में 10 प्रतिशत हिस्सेदारी मिली. यह पहला मौका था जब भारत को खाड़ी में उत्पादन में भागीदारी मिली. यह समझौता 40 वर्षों के लिए है. भारत और खाड़ी देशों के बीच कुल मिलाकर 20 से अधिक प्रमुख ऊर्जा समझौते हैं.

इन समझौतों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  की भूमिका निर्णायक रही. खाड़ी देशों के साथ राजनीतिक विश्वास बढ़ाया. पिछले एक दशक 2014-2025 में लगभग 35-45 अरब अमेरिकी डॉलर का कुल विदेशी ऊर्जा निवेश हुआ.  अफ्रीका में 20-25 अरब डॉलर, खाड़ी देशों में 10-15 अरब डॉलर और एलएनजी तथा गैस प्रोजेक्ट्स में 10 अरब डॉलर का निवेश हुआ.

वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के वर्तमान दौर में भारत एक संतुलित कूटनीतिक रणनीति अपना रहा है. एक ओर भारत की निजी और सार्वजनिक कंपनियां अमेरिका जैसे विकसित देशों में निवेश बढ़ा रही हैं, वहीं दूसरी ओर रूस के साथ ऊर्जा संबंधों को भी मजबूती से बनाए रखा गया है. हाल ही में रिलायन्स इंडस्ट्रीज  द्वारा अमेरिका में रिफाइनरी  और ऊर्जा क्षेत्र में निवेश की योजनाओं ने इस संतुलन को और स्पष्ट किया है. यह संकेत है कि भारतीय कंपनियां अब केवल घरेलू बाजार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा मूल्य श्रृंखला में प्रवेश कर रही हैं.

Web Title: What is the secret to maintaining confidence even during energy crisis

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