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विश्वनाथ सचदेव का ब्लॉगः विश्वास बहाली से निकलती है समाधान की राह

By विश्वनाथ सचदेव | Updated: November 24, 2021 09:25 IST

उम्मीद की जानी चाहिए कि अब दोनों ओर से इस तरह की कोशिश हो कि विवाद सुलझ जाए। किसानों का काम आंदोलन करना नहीं, खेती करना है, और सरकार का काम भी दमन करना नहीं, जनता के हित में शासन चलाना है।

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किसान-आंदोलन की एक प्रमुख मांग, तीनों कृषि-कानूनों को अपनी चिर-परिचित शैली में वापस लेने की घोषणा कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर देश को चौंका दिया। देश चौंका तो सही, पर यह चौंकना निर्णय को लेकर नहीं, निर्णय की घोषणा करने के तरीके को लेकर था। अचानक टीवी के छोटे पर्दे पर आकर प्रधानमंत्री ने तीनों कानूनों को वापस लेने के निर्णय की घोषणा कर दी। अपनी इस घोषणा में उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात पर खेद है कि देश के ‘कुछ किसानों’ को अपनी बात समझा नहीं पाए। अब आगे इस बात को कैसे समझाएंगे या स्वयं किस तरह से समङोंगे, यह तो आने वाला कल ही बताएगा, पर आज स्थिति यह है कि सरकार संसद के शीतकालीन सत्न में ही कृषि कानूनों को वापस लेने की प्रक्रिया प्रारंभ कर देगी। फसलों के न्यूनतम मूल्य के संदर्भ में भी एक समिति गठित करने की प्रधानमंत्रीने घोषणा कर दी है, पर अपनी मांगों को मनवाने के लिए साल भर तक आंदोलन करने वाले किसान प्रधानमंत्री के इस आश्वासन से संतुष्ट नहीं हैं। फिलहाल उन्होंने भी आंदोलन जारी रखने की घोषणा कर दी है। विवाद कैसे निपटता है, यह देखने की बात होगी पर इतना तो दिख ही रहा है कि इस आंदोलन के चलते बहुत कुछ ऐसा हुआ है जो नहीं होना चाहिए था, और बहुत कुछ ऐसा नहीं हुआ, जो होना चाहिए था।

बहरहाल, साल भर तक चलने वाला यह किसान आंदोलन देश के ही नहीं, दुनियाभर के इतिहास में एक उदाहरण की तरह देखा जाएगा। इतना लंबा अहिंसक आंदोलन अपने आप में एक कीर्तिमान है। लाखों किसानों का योजनाबद्ध और अनुशासित तरीके से आंदोलन चलाना अद्भुत ही कहा जा सकता है। बच्चे, बूढ़े, महिलाएं सब इस आंदोलन में शामिल हुए। इस दौरान आंदोलन की जगहों पर सात सौ से अधिक किसानों की मृत्यु हो गई। किसानों को इस बात का दुख है, पर इस ‘शहादत’ पर वे गर्व भी कर रहे हैं। हिंसा की कुछ छिटपुट घटनाएं भी हुईं, पर उनसे इस आंदोलन की महत्ता कम नहीं होती। प्रधानमंत्रीने अपने राष्ट्र के नाम संदेश में इस बात के लिए देश से क्षमा मांगी है कि उनकी ‘तपस्या’ में कुछ कमी रह गई कि वे किसानों को ‘दीये के उजाले की तरह स्पष्ट बात समझा नहीं पाए’। तपस्या से उनका क्या तात्पर्य था यह वे जानें, पर देखा जाए तो तपस्या उन किसानों ने की है जो सर्दी, गर्मी, बरसात में दिल्ली के दरवाजे पर इस आशा में बैठे रहे हैं कि अपने नागरिकों की बेहाली देखकर शायद सरकार पसीज जाए!

जनतंत्न में जैसे विपक्ष दुश्मन नहीं होता, वैसे ही अपनी मांगों को लेकर आवाज उठाने वाले नागरिक भी सरकार गिराने के लिए ही आंदोलन नहीं करते। अपनी मांगों को मनवाने के लिए आंदोलन कर रहे किसानों को प्रतिपक्ष या शत्रु के रूप में देखा जाना सही नहीं है। फिर, इन किसानों को क्या-क्या नहीं समझा-कहा गया? उन्हें ‘आंदोलनजीवी’ नाम दिया गया, उन्हें ‘परजीवी’ कहा गया। सरकार के समर्थकों ने आंदोलन कर रहे किसानों को ‘खालिस्तानी’ कहकर उन पर देश का विरोधी होने का आरोप लगाया। उन्हें आतंकवादी तक कहा गया। बेहतर होता इस तरह के आरोप न लगते। संभव है आंदोलन करने वालों में कुछ उपद्रवी या देशद्रोही तत्व भी शामिल हो गए हों। उनका अपना एजेंडा हो सकता है, पर ऐसे सीमित तत्वों की आड़ लेकर एक जनतांत्रिक आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश भी तो किसी एजेंडे का परिणाम हो सकती है।

उम्मीद की जानी चाहिए कि अब दोनों ओर से इस तरह की कोशिश हो कि विवाद सुलझ जाए। किसानों का काम आंदोलन करना नहीं, खेती करना है, और सरकार का काम भी दमन करना नहीं, जनता के हित में शासन चलाना है। अब जरूरी है कि दोनों पक्ष ईमानदारी से समस्या के समाधान की दिशा में बढ़ें। उम्मीद की जानी चाहिए कि अब संसद में इस समस्या का समाधान खोजने की कोशिश ईमानदारी से होगी। 

एक बात और। किसानों के इस आंदोलन ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि गांधी का तरीका समस्याओं के समाधान में मददगार हो सकता है। सच पूछा जाए तो देश के किसानों ने इस अहिंसक आंदोलन के माध्यम से न केवल राष्ट्रपिता के बताए मार्ग की महत्ता को रेखांकित किया है, बल्किइस आवश्यकता को भी उजागर किया है कि गांधी को समझने की आज फिर से आवश्यकता है। जिस शांतिपूर्ण तरीके से यह किसान आंदोलन चला है, चल रहा है, वह एक तरह से उन सबके सवालों का उत्तर भी है जो गांधी के बताए रास्ते के औचित्य पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। यह एक संयोग ही है कि आज जहां एक ओर गांधी को फिर से समझने, फिर से परिभाषित करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है, वहीं गांधी के विरोध में भी स्वर उठ रहे हैं। इन स्वर उठाने वालों को यह समझना होगा कि हिंसा, घृणा, धार्मिक विद्वेष आदि मनुष्यता के मित्र नहीं हो सकते।

मनुष्यता का तकाजा है कि किसी का विरोध करने से पहले उसे समझने की ईमानदार कोशिश होनी चाहिए। किसानों का यह अहिंसक सत्याग्रह इस बात को रेखांकित करता है कि जनतांत्रिक मूल्यों में विश्वास हमारी समस्याओं के समाधान का एक कारगर उपाय हो सकता है। विरोधी-स्वर को गलत ठहराने से पहले ठहरकर यह सोचने की आवश्यकता है कि कहीं मैं तो गलत नहीं हूं। मुश्किल होता है अपने आपसे यह सवाल पूछना, पर यही जरूरी है। सत्ता की राजनीति करने वाले इस जरूरत को समझना नहीं चाहते, पर एक बार यदि यह बात समझ आ जाए तो आपसी विश्वास का रास्ता खुल जाता है, सबका विश्वास पाने की मंजिल तक तभी पहुंचा जा सकता है।

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