Vaccine covid coronavirus Pandemic end by June Serum Institute and Bharat Biotech Ltd. Harish Gupta blog | जून महीने तक खत्म हो जाएगी महामारी!, हरीश गुप्ता का ब्लॉग
भारत में महामारी घट रही है और यहां लोगों में पश्चिम की तरह टीकाकरण के प्रति कोई व्यग्रता नहीं है. (file photo)

Highlightsफाइजर, माडर्ना या रूस की स्पुतनिक वी समेत दुनिया की किसी भी फार्मा कंपनी के साथ किसी भी तरह का कोई समझौता नहीं किया है.भारत वयस्कों के लिए दुनिया का पहला सबसे बड़ा  टीकाकरण कार्यक्रम शुरू करने के लिए तैयार है.विश्व स्वास्थ्य संगठन सहित कई अन्य देशों ने टीकों के लिए अरबों डॉलर का वित्त पोषण किया.

यह बात अजीब लग सकती है लेकिन सच है कि मोदी सरकार ने दो कोविड वैक्सीन निर्माताओं (सीरम इंस्टीट्यूट, पुणो और भारत बायोटेक लि., हैदराबाद) के साथ वैक्सीन खरीदने के समझौते पर आखिरी क्षणों में हस्ताक्षर किए.

उसने फाइजर, माडर्ना या रूस की स्पुतनिक वी समेत दुनिया की किसी भी फार्मा कंपनी के साथ किसी भी तरह का कोई समझौता नहीं किया है. फिर भी भारत वयस्कों के लिए दुनिया का पहला सबसे बड़ा  टीकाकरण कार्यक्रम शुरू करने के लिए तैयार है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन सहित कई अन्य देशों ने टीकों के लिए अरबों डॉलर का वित्त पोषण किया. लेकिन मोदी ने अपने वास्तविक गुजराती कौशल को दिखाया और आखिर तक इंतजार किया जिससे विक्रेता हताश हो गए, क्योंकि उन्होंने भंडार जमा कर लिया था. मोदी मुख्यत: इसलिए ऐसा कर सके, क्योंकि भारत में महामारी घट रही है और यहां लोगों में पश्चिम की तरह टीकाकरण के प्रति कोई व्यग्रता नहीं है.

कोविशील्ड का आविष्कार भले ही भारत में न किया गया हो लेकिन इसे ऐसा ही माना जा रहा है क्योंकि सीरम दुनिया को आपूर्ति कर रहा है. हालांकि कई प्रमुख वैज्ञानिकों ने प्रभावकारिता डाटा में छूट के साथ बीबीएल (भारत बायोटेक लि.) की कोवैक्सीन को आपातकालीन मंजूरी दिए जाने पर सवाल उठाया है.

इसमें डॉ. गगनदीप कंग जैसी इम्यूनोलॉजिस्ट और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ  रिसर्च (आईआईएसईआर), पुणे की डॉ. विनीता बाल शामिल हैं. फिर भी मोदी के लिए यह सफर आसान रहा है. पीएमओ में कई लोग मानते हैं कि भारत में 80 करोड़ लोगों को वैक्सीन लगाए बिना ही महामारी मई-जून तक खत्म हो जाएगी. तब शायद वे अपनी बढ़ी दाढ़ी से छुटकारा पा लें!

सरकार कोवैक्सीन के लिए कैसे प्रेरित हुई?

 कोवैक्सीन के पीछे एक दिलचस्प कहानी है. मार्च में जैसे ही देश में महामारी फैली, प्रधानमंत्री कार्यालय ने आईसीएमआर प्रमुख डॉ. बलराम भार्गव की ओर सवाल उछाला - क्या आप वैक्सीन बना सकते हैं? और कब तक? आईसीएमआर और उसके प्रमुख वैज्ञानिक व इम्युनोलॉजिस्ट्स दशकों से अगुवा रहे हैं. लेकिन पीएमओ द्वारा कभी भी उससे ऐसा सवाल नहीं किया गया था.

सच कहा जाए तो आईसीएमआर ने खुद कभी भी किसी वैक्सीन का आविष्कार नहीं किया था. भार्गव अपने नौ सदस्यीय वैक्सीन पैनल के पास गए, जिसका नेतृत्व गगनदीप कंग कर रही थीं. वहां गहन चुप्पी छाई थी. लेकिन पीएमओ बेताब हो रहा था.

मई की शुरुआत की एक खुशनुमा सुबह, डॉ. भार्गव ने आईसीएमआर के वैक्सीन पैनल को भंग कर दिया, क्योंकि प्रधानमंत्री ने वैक्सीन को लेकर सीधे अपने ही अधीन नेशनल टास्क फोर्स का गठन किया था. डॉ. कंग आईसीएमआर छोड़कर वेल्लोर चली गईं. मोदी वैज्ञानिक भले ही न हों लेकिन वे जानते थे कि वैज्ञानिकों के बीच भी राजनीति बहुत है और नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया. कुछ ही दिनों में आईसीएमआर-भारत बायोटेक ने वैक्सीन को लेकर एक समझौते पर हस्ताक्षर किए.

भारत बायोटेक को ही क्यों चुना गया?

इस सवाल का आज तक कोई जवाब उपलब्ध नहीं है कि आईसीएमआर ने वैक्सीन निर्माण के लिए भारत बायोटेक को ही क्यों चुना? इसमें कोई संदेह नहीं कि आईसीएमआर भारत बायोटेक और अन्य फार्मा कंपनियों के साथ मिलकर बरसों से काम करता रहा है और इसके पहले रोटावायरस तथा एच1एन1 टीकों के लिए साङोदारी की है. लेकिन आज तक किसी को भी आईसीएमआर-भारत बायोटेक के बीच समझौते की धाराओं का पता नहीं चल सका है.

सिर्फ इतनी जानकारी है कि आईसीएमआर ने अपने नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ वायरोलॉजी, पुणो में आइसोलेट किए गए कोरोनावायरस स्ट्रेन को वैक्सीन बनाने के लिए मई 2020 में भारत बायोटेक को हस्तांतरित कर दिया. यह भी सर्वविदित है कि डॉ. भार्गव ने भारत बायोटेक द्वारा अगस्त 2020 में ही वैक्सीन तैयार करने की बात कहकर सनसनी मचा दी थी.

उन्होंने इस बारे में एक संक्षिप्त पत्र भी जारी किया था. इस पत्र के सार्वजनिक होने से सरकार को भी शर्मिदगी हुई थी, क्योंकि ऐसा महसूस किया गया कि प्रधानमंत्री  मोदी 15 अगस्त को लाल किले से इसकी घोषणा करना चाहते थे.  भारत बायोटेक 15 अगस्त तक वैक्सीन का निर्माण नहीं कर सका. लेकिन कोवैक्सीन आईसीएमआर का ही उत्पाद है और तीसरे चरण की प्रभावकारिता का डाटा आने के पहले ही इसे सारे नियामकों द्वारा त्वरित मंजूरी प्रदान कर दी गई.

केजरीवाल का बढ़ता कोंकणी प्रेम

अरविंद केजरीवाल ने अपनी नजरें पंजाब, गोवा, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के 2022 में होने वाले चुनावों पर लगा दी हैं. गोवा में बढ़त बनाने के उद्देश्य से उन्होंने नायाब तरीका निकाला और दिल्ली में कोंकणी अकादमी की स्थापना कर दी. इस अकादमी की वहां कोई मांग नहीं थी. लेकिन केजरीवाल के कोंकणी के प्रति आकस्मिक प्रेम को लेकर गोवा में उनके प्रतिद्वंद्वी उनका खूब मजाक उड़ा रहे हैं.

जाहिर है कि कोंकणी भाषा और गोवा की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय राजधानी में आने वाले दिनों में कई सांस्कृतिक आयोजन देखने को मिलेंगे. क्या इससे आम आदमी पार्टी को गोवा में वोट हासिल हो सकेंगे जहां केजरीवाल की पार्टी की सभी सीटों पर जमानत जब्त हो गई थी? आप अंदाजा लगा सकते हैं.

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