हार-जीत और ध्रुवीकरण के दुष्परिणाम का गंभीर सवाल 

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: May 6, 2026 10:41 IST2026-05-06T10:41:15+5:302026-05-06T10:41:21+5:30

बड़ा दिल रखना होगा क्योंकि कोई भी सरकार तकनीकी रूप से किसी दल की नहीं होती बल्कि आम आदमी की होती है.

The serious question of victory and defeat and the consequences of polarization | हार-जीत और ध्रुवीकरण के दुष्परिणाम का गंभीर सवाल 

हार-जीत और ध्रुवीकरण के दुष्परिणाम का गंभीर सवाल 

चुनाव जीतने के बाद प. बंगाल में भाजपा के प्रमुख नेता शुभेंदु अधिकारी की प्रतिक्रिया ने बड़ा गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है. भवानीपुर सीट से वे पहले पीछे चल रहे थे लेकिन अंतत: वे पंद्रह हजार से ज्यादा मतों से जीते और ममता बनर्जी हार गईं. अपनी जीत पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें हिंदुओं ने वोट दिया है, मुसलमानों ने वोट नहीं दिया. वे हिंदुओं के लिए काम करेंगे. उनका यह बयान निश्चय ही लोकतांत्रिक मूल्यों को साझा नहीं करता.

यह बिल्कुल संभव है कि एक भी मुसलमान ने उन्हें  वोट नहीं दिया हो क्योंकि वो उनसे या उनकी पार्टी की नीतियों से सहमत नहीं होंगे. हो सकता है कि बहुत सारे हिंदुओं ने भी उन्हें वोट नहीं दिया हो! शुभेंदु अधिकारी ने सीधे तौर पर यह नहीं कहा है कि वे मुसलमानों के लिए काम नहीं करेंगे लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी नेता को इस तरह का बयान देना चाहिए कि वह एक खास वर्ग के लिए काम करेगा?

लोकतांत्रिक प्रक्रिया ऐसी है कि जीतने वाले प्रत्याशी को जितने लोगों ने वोट दिया हो, हो सकता है उससे ज्यादा लोगों ने विपक्षी उम्मीदवारों को वोट दिया हो. उदाहरण के लिए यदि जीतने वाले प्रत्याशी को 40 प्रतिशत मत मिले और शेष 60 प्रतिशत मत दो उम्मीदवारों में बंट जाए तो जीतने वाला शख्स क्या केवल 40 प्रतिशत लोगों के लिए काम करेगा? ऐसा कैसे संभव है? योजना कोई भी पूरी होगी, उसका लाभ सबको मिलेगा! इसलिए शुभेंदु अधिकारी के बयान को वास्तव में धार्मिक ध्रुवीकरण के नजरिए से देखा जाना चाहिए.

बंगाल चुनाव में धार्मिक ध्रुवीकरण बहुत साफ था. हिंदुओं के बड़े वर्ग को लुभाने में भाजपा कामयाब रही जबकि मुसलमानों का बड़ा हिस्सा ममता के साथ था. लेकिन आंकड़ों का विश्लेषण यह भी बताता है कि पिछले चुनावों में ममता का साथ देने वाले मतदाता कांग्रेस और वामपंथियों की तरफ चले गए. शुभेंदु अधिकारी ने जो कुछ भी कहा है, वह इस बात को दर्शाता है कि प. बंगाल में जमीनी हकीकत क्या है. समाज बिल्कुल दो-फाड़ हो चुका है. एक तरफ हिंदुओं का संगठित तबका है तो दूसरी तरफ मुसलमानों का संगठित हिस्सा है.

ऐसी स्थिति में यह आशंका बनी रहेगी कि माहौल को कुछ शरारती तत्व कभी भी बिगाड़ने की कोशिश कर सकते हैं. भारत के दुश्मन चाहते भी यही हैं. ऐसी स्थिति में नई सरकार को सजग रहना होगा. बड़ा दिल रखना होगा क्योंकि कोई भी सरकार तकनीकी रूप से किसी दल की नहीं होती बल्कि आम आदमी की होती है. प. बंगाल पहले भी बहुत संवेदनशील राज्य माना जाता रहा है और पिछले कुछ वर्षों में तो और भी संवेदनशील हो गया है. इसलिए इस राज्य की शांति को बनाए रखना हम सबकी जिम्मेदारी है. 

Web Title: The serious question of victory and defeat and the consequences of polarization

भारत से जुड़ीहिंदी खबरोंऔर देश दुनिया खबरोंके लिए यहाँ क्लिक करे.यूट्यूब चैनल यहाँ इब करें और देखें हमारा एक्सक्लूसिव वीडियो कंटेंट. सोशल से जुड़ने के लिए हमारा Facebook Pageलाइक करे