शोभना जैन का ब्लॉग: वैश्विक चुनौतियों के बीच भारत के लिए संभावनाएं

By शोभना जैन | Published: May 7, 2022 01:21 PM2022-05-07T13:21:10+5:302022-05-07T13:27:24+5:30

भारत और फ्रांस तहत रक्षा, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष, ऊर्जा, अक्षय ऊर्जा, साइबर सुरक्षा, पर्यावरण जैसे कई क्षेत्रों पर एक साथ मिलकर काम कर रहे हैं।

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शोभना जैन का ब्लॉग: वैश्विक चुनौतियों के बीच भारत के लिए संभावनाएं

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Highlightsरूस-यूक्रेन युद्ध के बीच पीएम मोदी अभी तीन यूरोपिए देशों की यात्रा पर गए है। इस यात्रा पर नॉर्डिक देशों के साथ आर्थिक रिश्तों को मजबूत करने पर जोर दिया जाएगा।पीएम मोदी की यह फ्रांस में पांचवी यात्रा है जहां पर दोनों देश कई क्षेत्रों पर एक साथ काम कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीन यूरोपीय देशों जर्मनी, डेनमार्क और फ्रांस की यात्रा ऐसे अहम वक्त पर हुई है जब रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते यूरोप शीत युद्ध के बाद के अब तक के सबसे बड़े सुरक्षा संकट का सामना कर रहा है. 

पिछले सात दशक से निर्बाध चल रही विश्व व्यवस्था में बदलाव के संकेत नजर आ रहे हैं. ऐसे में भारत के सम्मुख चुनौती है कि भारत रूस के साथ अपने अहम संबंधों को ‘अस्थिर’ न करते हुए, विश्व व्यवस्था में दिख रहे बदलाव के इन संकेतों के बीच यूरोप के साथ अपने संबंधों को और मजबूत करने पर भी ध्यान दे. 

यानी संतुलन बनाने की चुनौतियों के बीच संभावनाओं के अवसरों पर ध्यान देते हुए यूरोपीय देशों के साथ समानता के जो बिंदु हैं, उन्हें और मजबूत किया जाए और दोनों पक्ष अधिक सक्रिय आर्थिक सामरिक सहयोग बढ़ाएं. 

क्यों भारत और यूरोप को एक दूसरे की है जरूरत

जिस तरह से यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक सामरिक, कूटनीतिक स्थिति पर गहरा दीर्घकालिक प्रभाव डाला है और रूस और चीन की नजदीकियां बढ़ी हैं, भारत की यह चिंता स्वाभाविक है कि पश्चिमी देशों का ध्यान चीन से हटकर रूस पर जा टिका है.

दरअसल भारत और यूरोप दोनों को ही एक दूसरे की जरूरत है, दोनों के लिए ही यह दौर संभावनाओं को अवसर में बदलने का दौर बन सकता है चाहे वो सामरिक क्षमताओं के निर्माण के लिए हो या आर्थिक और तकनीकी बदलाव के लिए. 

दरअसल भारत अपने अहम सामरिक साझीदार रूस के साथ अपने आर्थिक सामरिक संबंधों में कटौती करने की अमेरिका और यूरोपीय देशों की बात न मानते हुए अपने राष्ट्रीय हितों के मद्देनजर तटस्थता की नीति का ही पालन कर रहा है. 

पीएम मोदी के दौरे के क्या है मायने

इस दौरे के जरिये भारत बदलते विश्व व्यवस्था के संकेतों और चुनौतियों के बीच यूरोप के साथ सहयोग बढ़ाने के नए अवसरों को आंक रहा है. पीएम मोदी का यह यूरोप दौरा उसी परिप्रेक्ष्य में लिया जा सकता है.

यूक्रेन युद्ध की भयावह छाया में हुए इस दौरे में हालांकि विश्व नेताओं के साथ विमर्श का मुख्य मुद्दा भले ही यह रहा हो लेकिन यह दौरा इस उथल-पुथल भरी विश्व कूटनीति में यूरोपीय देशों के साथ रिश्ते बढ़ाने के लिए खासा अहम रहा है. इन देशों के नेताओं के साथ हुई बातचीत में पीएम मोदी ने यूक्रेन युद्ध को लेकर भारत की चिंताओं के साथ उसके पक्ष को रखा वहीं यूरोपीय देशों ने रूस को लेकर अपनी चिंताएं रखीं. 

जैसा कि पीएम मोदी ने यात्रा के पहले पड़ाव में जर्मनी के चांसलर ओलाफ शॉल्ज से कहा भी ‘युद्ध में कोई भी विजयी नहीं होगा, सभी का नुकसान होगा, भारत हमेशा शांति का पक्षधर रहा है.’ उन्होंने तुरंत युद्धविराम पर जोर देते हुए कहा कि विवाद को सुलझाने के लिए बातचीत ही एकमात्र विकल्प है. जर्मनी यूरोप में भारत का बेहद अहम साझीदार है.

नॉर्डिक देशों की यात्रा के पीछे क्या है भारत का उद्देश्य

अगर पीएम मोदी की नॉर्डिक देशों की यात्रा की बात करें तो भारत पिछले कुछ वर्षों से डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, नॉर्वे और स्वीडन के साथ अपने आर्थिक रिश्ते मजबूत करने पर बल दे रहा है, साथ ही दोनों पक्षों के बीच सामरिक साझीदारी भी बढ़ रही है, दोनों ही भारत प्रशांत क्षेत्र में संघर्ष की किसी आशंका को लेकर समान रूप से चिंतित हैं. 

इस यात्रा के दौरान डेनमार्क में आयोजित दूसरे भारत नॉर्डिक शिखर बैठक में इन देशों के प्रधानमंत्रियों ने रूसी फौजों द्वारा यूक्रेन पर अवैध तथा बिना किसी उकसावे के किए गए हमले की तीखी आलोचना दोहराई. 

दरअसल नॉर्डिक देशों की रूस को लेकर अपनी चिंताएं हैं, दो देशों की सीमाएं रूस से जुड़ी हैं. डेनमार्क, आइसलैंड और नॉर्वे जहां यूरोपीय देशों के सुरक्षा गठबंधन नाटो के संस्थापक सदस्य रहे हैं वहीं नई सुरक्षा चुनौतियों की आशंका से अब स्वीडन और फिनलैंड भी अपना तटस्थ देश का दर्जा त्याग कर नाटो का सदस्य बनने की कतार में हैं. 

सम्मेलन में कोरोना महामारी के बाद आर्थिक बदहाली, जलवायु परिवर्तन, ब्लू इकोनॉमी और इसके विभिन्न पहलू, अक्षय ऊर्जा के अलावा प्रौद्योगिकी और निवेश संबंध, स्वास्थ्य क्षेत्र के अलावा भारत में जल निकायों के निर्माण पर बात हुई.

पीएम की यह फ्रांस में पांचवी यात्रा है

पिछले कुछ वर्षों से भारत के अहम रक्षा साझीदार के रूप में उभर रहे फ्रांस की प्रधानमंत्री मोदी की यह पांचवीं यात्रा रही, मोदी ऐसे समय पेरिस पहुंचे, जब फ्रांस यूरोपीय संघ की अध्यक्षता कर रहा है और यूक्रेन युद्ध में वह और विशेष तौर पर राष्ट्रपति मेक्रों की भूमिका खासी प्रभावी रही है. 

दोनों नेताओं ने यूक्रेन-रूस युद्ध के कारण उपजे संकट से निपटने पर चर्चा की. साथ ही रक्षा, प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष और ऊर्जा क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने और मिलकर काम करने पर सहमति जताई. 

आतंक निरोधी अभियानों के साथ कई क्षेत्रों पर दोनों देश कर रहे एक साथ काम

वर्ष 1998 से दोनों देशों के बीच शुरू हुई सुदृढ़ सामरिक साझीदारी और व्यापक रूप ले चुकी है, जिसके तहत रक्षा, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष, ऊर्जा, अक्षय ऊर्जा, साइबर सुरक्षा, पर्यावरण जैसे क्षेत्रों में उभयपक्षीय सहयोग के साथ ही दोनों देश आतंक निरोधी अभियानों में भी आपसी सहयोग से काम कर रहे हैं. 

पीएम मोदी की इन तीन यूरोपीय देशों की यात्रा से दोनों पक्षों को यूक्रेन युद्ध पर एक दूसरे का नजरिया बेहतर तरीके से समझने का मौका तो मिला ही है, साथ ही पश्चिमी देशों के लिए भारत के साथ सहयोग और सहमति के बिंदु बढ़ाने का अवसर भी बना है.
 

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