ब्लॉग: भारतीय शिक्षा में आज क्यों है नवाचार को अपनाने की जरूरत

By गिरीश्वर मिश्र | Published: November 10, 2021 10:15 AM2021-11-10T10:15:42+5:302021-11-10T10:16:32+5:30

शिक्षा का जो ढांचा अंग्रेज छोड़कर गए और जिसे ज्यों का त्यों अपना लिया गया उसे देख कर यही लगता है कि सिर्फ सत्ता का हस्तांतरण हुआ, साहब बहादुर बदल गए बाकी सारी चीजें वही रहीं.

Girishwar Misra blog: need to embrace innovation in Indian education system | ब्लॉग: भारतीय शिक्षा में आज क्यों है नवाचार को अपनाने की जरूरत

ब्लॉग: भारतीय शिक्षा में आज क्यों है नवाचार को अपनाने की जरूरत

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आज सूचना और ज्ञान की बढ़ती महत्ता को पहचानते हुए वर्तमान युग का नाम ही ‘ज्ञान-युग’ रख दिया गया है. जीवन के हर क्षेत्र में डिजिटल प्रक्रिया और कृत्रिम बुद्धि (आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस) का बोलबाला हो रहा है. रोबोट बहुत सारे काम यहां तक कि जटिल सर्जरी आदि करने में भी सहायक हो रहा है. 

ज्ञान का डंका बज रहा है और सुख की तलाश में ज्ञान बड़े पैमाने पर व्यापक और जटिल ढंग से  शामिल होता जा रहा है. पर ज्ञान का यह दूसरा संभ्रांत छोर है. उसके एक छोर पर ज्ञानहीन अनपढ़ों की दुनिया है.

भारत में इस किस्म का ‘डिजिटल डिवाइड’ आज सामाजिक-आर्थिक भेदभाव का बड़ा कारण बन रहा है. अंग्रेजों ने शिक्षा की विषयवस्तु, और पद्धति सब में बदलाव किया और वर्चस्व के चलते उसे मुख्य धारा में ला खड़ा  किया. ज्ञान की दिशा, ज्ञान का संदर्भ, ज्ञान की प्रामाणिकता के आधार और संबोध्य सब के सब गैर-भारतीय होते गए. 
हम सब के लिए एक पश्चिमी सांचा ढाल दिया गया जिसमें अपने को फिट करना ही हमारा काम हो गया. आज आजादी के पचहत्तर साल बीतने को आए लेकिन शिक्षा का आयोजन कैसे हो, इस प्रश्न का उत्तर पश्चिमी शिक्षा और ज्ञान की सैद्धांतिकी और अनुप्रयोग पर ही निर्भर करता है. ऐसा करते हुए हम मानसिक रूप से पश्चिमी होते चले गए.

पश्चिमीकरण की यह प्रक्रिया इस छद्म ढंग से हुई कि पश्चिमी ज्ञान वैश्विक या सार्वभौमिक सत्य के रूप में प्रस्तुत हुआ और उसी तरह से अंगीकृत किया गया. इस प्रक्रिया में जो कुछ पश्चिम के अनुकूल था, उसे स्वीकार किया गया और जो उसके अनुरूप नहीं रहा उसे त्याग दिया गया. हमारे सोच-विचार की कोटियां, व्याख्याएं और सिद्धांत सभी आयातित होते रहे. 

ऐसे में यहां पर विकसित हो रहा ज्ञान मौलिक न होकर एक तरह की छायाप्रति ही बना रहा जिसकी प्रामाणिकता मूल के साथ उसकी अनुरूपता के आधार पर निश्चित की जाती है. नयेपन  की जगह पुनराख्यान को महत्व दिया जाने लगा. ऐसे बहुत कम क्षण ही देखने को मिले जब ज्ञान की दृष्टि से नवोन्मेष के दर्शन होते हों. 

पश्चिम की ज्ञान यात्रा का अनुगमन करने में ही समय बीत जाता है. ज्ञान का खेल और खेल के नियम सभी उन्हीं के. राजनीतिक स्वाधीनता के बावजूद ज्ञान के और शक्ति के शिकंजे से निकलना सरल नहीं है क्योंकि हम एक ऐसी व्यवस्था से बंधे रहे जो सृजन के बदले यथास्थिति के पक्ष में थी. इसलिए नवाचार इस मानसिक जकड़न से उबरने के लिए जरूरी है.

शिक्षा का जो ढांचा अंग्रेज छोड़कर गए और जिसे ज्यों का त्यों अपना लिया गया उसे देख कर यही लगता है कि सिर्फ सत्ता का हस्तांतरण हुआ, साहब बहादुर बदल गए बाकी सारी चीजें वही रहीं. शिक्षा नीति के नाम पर कवायद होती रही और थोड़े बहुत हेरफेर होते रहे पर उनका भी उत्स विदेश में ही था. इस बार 2020 में एक शिक्षा नीति का मसौदा आया जिसे ‘भारत केंद्रित’ कहा गया. 

इसमें संरचना, प्रक्रिया और विषयवस्तु को लेकर बड़े गंभीर परिवर्तन के संकल्प प्रस्तुत किए गए जिनको देख कर लचीली और प्रतिभा को अवसर देने वाली एक उत्साहवर्धक व्यवस्था दी गई. इसमें मातृभाषा को शिक्षा का माध्यम रखने पर भी बल दिया गया है.

उस मसौदे के क्रियान्वयन की प्रक्रिया प्रगति में है. विभिन्न संस्थाएं इस हेतु तैयारी कर रही हैं. आशा की जाती है कि  भविष्य में शीघ्र ही शिक्षा नीति के क्रि यान्वयन की रूपरेखा सामने आएगी.
हमें याद रखना होगा कि शिक्षा एक व्यवस्था है जो अन्य व्यवस्थाओं से प्रभावित होती है और प्रभावित करती है क्योंकि शिक्षा का आयोजन और नियोजन स्वायत्त या निरपेक्ष न होकर अन्य व्यवस्थाओं के सापेक्ष है और उन पर निर्भर है. 

शिक्षा की स्वायत्तता स्वयं शिक्षा के लिए वांछित है पर शिक्षा का नियोजन कर रहे राजनीतिक दल या सरकार की मंशा यदि कुछ और है तो शिक्षा परतंत्र रहेगी और एक उपकरण के रूप में ही प्रयुक्त होती रहेगी. पर शिक्षा बेहतर समाज बनाने का अवसर जरूर है. हम जैसा समाज बनाना चाहते हैं वैसी ही शिक्षा भी देनी होगी. शिक्षा चर्या का परिवेश तकनीकी प्रगति के दौर में बहुत बदल गया है. 

बच्चों के संज्ञानात्मक अनुभव तेजी से बदल रहे हैं और कौशलों को भी नए सिरे से पहचानने की जरूरत है. स्वामी विवेकानंद, गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर और महात्मा गांधी जैसे महापुरुषों ने शिक्षा के मार्ग का अपने जीवन और कर्म द्वारा सोदाहरण निदर्शन दिया था और अभी भी उनका जिया जीवन शिक्षा के पराक्र म का उत्कृष्ट उदाहरण है. आज भी प्रयोग हो रहे हैं और वैकल्पिक शिक्षा के अनेक प्रयास जारी हैं. शिक्षा के अभिप्राय के प्रति जागरूकता लाना जरूरी है. तभी शिक्षा की प्रक्रिया को स्वाभाविक विकास और सृजन की ओर उन्मुख बनाना संभव हो सकेगा.

Web Title: Girishwar Misra blog: need to embrace innovation in Indian education system

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