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राजेश बादल का ब्लॉग: हार के बाद भी विपक्ष का बिखरा होना शुभ संकेत नहीं!

By राजेश बादल | Updated: June 25, 2019 06:14 IST

जनादेश आए एक महीना हो चुका है और इस दरम्यान विपक्ष लगातार कोमा में नजर आ रहा है.माना जा सकता है कि इस तरह की पराजय के लिए कोई दल तैयार नहीं था, लेकिन शिखर से लुढ़ककर गहरी खाई में गिरने का सबसे निचला बिंदु भी यह नहीं है.

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सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव परिणाम यदि एक दल को स्पष्ट बहुमत देकर राजनीतिक अस्थिरता की आशंका समाप्त करते हैं तो दूसरी ओर प्रतिपक्ष का निर्बल और कांतिहीन चेहरा भी लोकतंत्र को तनिक धुंधला बना देता है. जनादेश आए एक महीना हो चुका है और इस दरम्यान विपक्ष लगातार कोमा में नजर आ रहा है.

माना जा सकता है कि इस तरह की पराजय के लिए कोई दल तैयार नहीं था, लेकिन शिखर से लुढ़ककर गहरी खाई में गिरने का सबसे निचला बिंदु भी यह नहीं है. हार से उबरकर देश की खातिर दौड़ में शामिल होना ही विपक्ष का राजनीतिक धर्म है. इसमें जितनी देर होगी, प्रतिपक्ष अपना और मुल्क का नुकसान ही करेगा.

हिंदुस्तान का मतदाता उनसे इस करारी शिकस्त के कारणों को जानने का हक रखता है. क्या बीते महीने में वे इसकी पड़ताल कर पाए हैं? शायद नहीं. अगर उन्होंने यह मंथन किया होता तो अब तक अपनी कमजोरियों से निजात पाने का सिलसिला भी शुरू हो गया होता. 

समीक्षा में विलम्ब 

कांग्रेस को इस राष्ट्र की सबसे पुरानी और विराट पार्टी होने के नाते सभी प्रादेशिक इकाइयों के साथ परिणाम की समीक्षा का दौर अब तक पूरा कर लेना चाहिए था. उनके पुनर्गठन का काम जितनी देर से होगा, पार्टी के लिए अगले चुनाव के लिए तैयार होने में उतनी ही मुश्किलें पेश आएंगी. याद रखना होगा कि इस साल भी कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं.

इनमें ताल ठोंक कर जिस चतुरंगिणी सेना के साथ कांग्रेस को खड़ा होना चाहिए, फिलहाल ऐसा कुछ नहीं दिखाई दे रहा है. लुंजपुंज सेहत के साथ कांग्रेस भाजपा के आक्रामक अभियान का मुकाबला कम-से-कम महाराष्ट्र में तो नहीं कर सकती. मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री ही प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. बिना पूर्णकालिक अध्यक्ष के कांग्रेस संगठन अंशकालिक और कामचलाऊ अंदाज में काम कर रहा है. न तो सरकारें अच्छी चल रही हैं और न संगठन ही सक्रिय हो रहा है.

अगले विधानसभा और लोकसभा चुनाव के पहले जिला, तहसील और गांव स्तर तक पार्टी की इकाइयों में प्राण फूंकने का काम आसान नहीं है. रिक्रूटमेंट अभियान के जरिए दल के कार्यकर्ता नहीं चुने जा सकते. यह बात आलाकमान को समझनी पड़ेगी. यदि स्थानीय कार्यकर्ता महसूस करता है कि शिखर नेतृत्व पराजय के सदमे से नहीं उबर रहा तो वह पहले ही क्यों न अपनी चूड़ियां फोड़ दे?

लोकतंत्र में किसी भी जिम्मेदार पार्टी को यह अधिकार नहीं है कि वह अपने विशाल नेटवर्क को अकाल मौत मरने के लिए छोड़ दे. खास तौर पर ऐसी पार्टी, जिसने पैंतालीस बरस राज किया हो. कांग्रेस के प्रादेशिक क्षत्रपों और द्वितीय पंक्ति के नेताओं को राष्ट्रीय नेतृत्व को समझाना पड़ेगा. यदि उन्होंने ऐसा नहीं किया तो फिर आत्मघाती गोल होने से कोई रोक नहीं पाएगा.

कांग्रेस की सहयोगी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को भी निर्णायक कदम उठाने की जरूरत है. शरद पवार के अलग पार्टी बनाने का मकसद ही राजनीतिक फिजा में विलुप्त हो गया है. यदि पच्चीस साल बाद भी आधे महाराष्ट्र में उन्हें सिकुड़ा रहना था तो फिर कांग्रेस में ही बने रहने में क्या बुराई थी. अब तक तो पार्टी अध्यक्ष या प्रधानमंत्री का नंबर लग ही जाता. यही हाल ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस का है.

बेशक उन्होंने अपने दम पर बंगाल की सत्ता पाई थी, मगर 2019 का हिंदुस्तान उनसे अपने आप में बदलाव की अपेक्षा करता है. जिस तलवार से उन्होंने सीपीएम का मुकाबला जीता था, उसमें अब जंग लग चुकी है. आइंदा भाजपा से संघर्ष जीतने के लिए उन्हें एकला चलो रे की नीति त्यागनी ही पड़ेगी. सच है कि एक बार संयुक्त परिवार में बंटवारा हो जाए तो फिर वापस बिना दरार वाला संयुक्त कुनबा बनना नामुमकिन है.

मगर साइकिल पर आगे या पीछे बैठकर साथ चलने की संभावना तो बनी रहती है. ममता को ध्यान रखना होगा कि अगर उन्होंने वक्त रहते नियति की स्लेट पर लिखी इबारत नहीं पढ़ी तो किला ढहाने में भाजपा को कोई कड़ी मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी. 

उत्तर प्रदेश के दोनों दलों-समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का तो कहना ही क्या. हारें या सत्ता में रहें, सोच और कार्यशैली में बदलाव नहीं आता. आत्ममुग्धता और अक्खड़पन उनका स्थायी भाव बन गया है. वे समाज की बात करते हैं लेकिन व्यवहार सामंतों की तरह करते हैं. दोनों दल मानते हैं कि उनके सत्ता संसार में मतदाता का राष्ट्रीय धर्म और कर्तव्य है कि उन्हें वोट दे.

आधुनिक भारत की आवश्यकता के हिसाब से मानसिकता में परिवर्तन के लिए वे तैयार नहीं हैं. इसी कारण उनकी कुपोषित देह का विकास भी पच्चीस बरस बाद बौना ही है. वे उत्तर प्रदेश से ऊपर उठने की सोचते ही नहीं. कमोबेश यही स्थिति तेलुगूदेशम और टीआरएस जैसी पार्टियों की है.

वामपंथी दल तो पहले ही अपनी वजहों से इस देश की मुख्यधारा से विलुप्त हो चुके हैं. राष्ट्रीय पार्टियां क्षेत्रीय दलों की इस मानसिक विकलांगता का लाभ उठाती रही है. क्षेत्रीय दल भी उनके पिछलग्गू बनकर सत्ता की मलाई खाने के लोभ पर काबू नहीं रख पाते. प्रतिपक्षी पार्टियों की यह दुर्दशा किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं है. उनका पुनर्जीवन अपने लिए नहीं, इस देश के लोकतंत्र के लिए जरूरी है.  

टॅग्स :महागठबंधननरेंद्र मोदीअखिलेश यादवमायावती
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