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संपादकीयः चीन की नापाक हरकतों से सतर्क रहने की जरूरत

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: December 14, 2022 15:51 IST

1962 के युद्ध में चीन ने भारत के बड़े भू-भाग को हड़प रखा है। हमारे साथ शांति का राग अलापते हुए वह भारत में अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम सहित कई इलाकों पर बुरी नजर रखे हुए है। 1962 के युद्ध के बाद शांति के वादे को भी चीन ने तोड़ा था। 1967 में उसने नाथुला क्षेत्र से घुसपैठ की मगर वीर भारतीय सैनिकों के आगे उसकी एक नहीं चली।

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चीन ने नौ दिसंबर को अरुणाचल प्रदेश की सीमा के पास यांग्त्से में गलवान को दोहराने की नापाक कोशिश की लेकिन बहादुर भारतीय सैनिकों के सामने उसे मुंह की खानी पड़ी। आधी रात के बाद कायराना तरीके से चीनी सैनिकों ने भारतीय सीमा में घुसपैठ की कोशिश की मगर उन्हें भारतीय जांबाजों के कड़े प्रतिरोध के बाद पीछे हटना पड़ा। 15 जून 2020 को गलवान में भी चीनी सैनिकों ने भारतीय जमीन पर कब्जा करने का प्रयास किया था। मातृभूमि की रक्षा करते हुए भारत ने अपने 20 जवानों को खोया था लेकिन उससे कहीं ज्यादा संख्या में चीनी सैनिक ढेर हुए थे। गलवान की झड़प के बाद दोनों देशों के बीच आपसी बातचीत से मसले हल करने पर सहमति हुई थी। कई दौर की बातचीत के बाद चीन पीछे हटा लेकिन नौ दिसंबर को उसने विश्वासघात किया। चीन की इस हरकत से एक बार फिर साबित हो गया कि उस पर कभी भरोसा नहीं किया जा सकता। 

1962 के युद्ध में चीन ने भारत के बड़े भू-भाग को हड़प रखा है। हमारे साथ शांति का राग अलापते हुए वह भारत में अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम सहित कई इलाकों पर बुरी नजर रखे हुए है। 1962 के युद्ध के बाद शांति के वादे को भी चीन ने तोड़ा था। 1967 में उसने नाथुला क्षेत्र से घुसपैठ की मगर वीर भारतीय सैनिकों के आगे उसकी एक नहीं चली। 1967 में चीन को अपनी हिमाकत के कारण तीन सौ सैनिक गंवाने पड़े थे। 1987 में भी उसने घुसपैठ की कोशिश की मगर फिर उसे शर्मसार होना पड़ा था। चीन की साम्राज्यवादी चालों से सारी दुनिया वाकिफ है और कोई उस पर भरोसा नहीं करता। विश्व कूटनीति में चीन अलग-थलग पड़ता जा रहा है। कुछ मुट्ठी भर देशों को छोड़ दिया जाए तो चीन का दुनिया में कोई सच्चा साथी नहीं है। रूस कूटनीतिक तथा सामरिक मकसद से चीन का साथ दे रहा है। इसके अलावा विश्वमंच पर भारत के बढ़ते प्रभाव से भी चीन बौखलाया हुआ है। 

भारत का जी-20 का अध्यक्ष बनना चीन को फूटी आंख नहीं सुहा रहा है। श्रीलंका, बांग्लादेश जैसे जिन देशों को उसने कर्ज के बोझ तले दबाकर अपनी ओर करने की कोशिश की थी, वही अब उसे आंख दिखाने लगे हैं। घरेलू मोर्चे पर चीन भारी उथल-पुथल से गुजर रहा है। उसकी अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है। मंदी के खतरे से उबरने का उसे रास्ता नहीं सूझ रहा है और कोरोना महामारी ने वहां फिर से विकराल रूप धारण कर लिया है। इस महामारी से निपटने में राष्ट्रपति शी जिनपिंग की सरकार की विफलता से जनआक्रोश भड़क उठा है। चीन में सरकार के विरुद्ध लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं। शी जिनपिंग की सरकार सेना का सहारा लेकर दमन चक्र चला रही है, मगर जनता का आक्रोश शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। घरेलू तथा बाहरी मोर्चों पर लगातार विफलता से तिलमिलाई चीनी सरकार मूल मुद्दों से अपनी जनता का ध्यान हटाना चाहती है। इसीलिए उसने नौ दिसंबर को भारत की सीमा में घुसपैठ करने की नाकाम साजिश रची। 

चीन अपनी तिलमिलाहट में यह भूल रहा है कि 1962 और आज की स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर है। चीन किसी भी स्थिति में भारत की एक इंच जमीन पर भी कब्जा करने की नापाक कोशिश न करे क्योंकि भारत अब एक सैन्य महाशक्ति के रूप में स्थापित हो चुका है। चीन के हर हथियार का जवाब उसके पास है। कूटनीतिक रूप से भारत पर चीन किसी प्रकार का दबाव डाल नहीं सकता क्योंकि दुनिया भारत पर बहुत भरोसा करती है। चीन की हर कूटनीतिक साजिश को नापाक करने में भारत के साथ दुनिया का मजबूत समर्थन मौजूद है। जहां तक सैन्य ताकत का सवाल है, उसमें भी भारत कहीं कमजोर साबित नहीं होता। इसीलिए चीन को भारत के खिलाफ किसी भी तरह की साजिश रचने से बाज आना चाहिए। जहां तक भारत का सवाल है, गलवान की घटना के बाद हमारा रवैया कठोर एवं सतर्कतापूर्ण जरूर हो गया है लेकिन चीन जिस तरह से बार-बार विश्वासघात करता है, उससे भारत को उसके खिलाफ अपनी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना होगा। हमें पाकिस्तान के मुकाबले चीन से ज्यादा खतरा है। गलवान के बाद नौ दिसंबर की उसकी हरकत से भी यह तथ्य साबित हुआ है। भविष्य में चीन बौखलाहट में अपनी साजिशें तेज कर दे तो आश्चर्य नहीं किंतु एक बात तय है कि हर बार उसे मुंह की खानी पड़ेगी। 

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