Bharat Band reminds zionist conflict | ज़ियोनिस्ट संघर्ष की याद दिलाता भारत-बंद

Highlightsजियोनिस्ट आंदोलन का उद्देश्य यहूदियों के लिए एक अलग और संप्रभु राष्ट्र के निर्माण का थाठीक इसी प्रकार की सोच यहूदियों की जर्मनी में नाज़ी सरकार को लेकर होने लगी थी और उन्होंने बाद में नाज़ी सरकार से परेशान होकर अपना एक अलग रास्ता चुना

एसी/एसटी एक्ट को लेकर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय को लेकर भारत के तमाम दलित और आदिवासी संगठनो द्वारा बुलाया गया “भारत-बंद” निश्चित रूप से ऐतिहासिक साबित हुआ। शुरुआत में लग रहा था कि इस आह्वान का कोई विशेष असर नहीं होगा और ये भारतीय राजनीति को भी ज्यादा प्रभावित नहीं करेगा और महज़ एक सामान्य आंदोलन कि तरह इतिहास के पन्नों में कहीं खो जाएगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। 2 अप्रैल को न सिर्फ पूरा भारत बंद रहा बल्कि लाखों लोगों ने इस आंदोलन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इतनी संख्या में लोगों का सड़कों पर आना और सक्रिय भागीदारी निभाना दिमाग में कई प्रश्न खड़े करता है। क्या वजह रही कि बिना किसी बड़े प्रचार-प्रसार तंत्र के (सिर्फ सोशल मीडिया के सहारे) इतनी तादात में लोग सड़कों पर उतर आए? और तो और इस आंदोलन को सफल बनाने के लिए किसी मुख्याधरा के मीडिया ने साथ नहीं दिया जैसा कि अन्ना हजारे, बाबा रामदेव या अन्य नेताओं के आंदोलन के समय देखा गया था। विपक्षी दलों ने भी कोई सार्थक भूमिका नहीं निभाई।

रूसी क्रांतिकारी लेनिन ने कहा था कि क्रांति की शुरुआत विचारों से होती है और शायद यह विचार ही इस हजारों साल से शोषित-पीड़ित तबके को सड़कों पर ले आया।इस समाज के लोगों को शायद सामाजिक न्याय और समानता की परिभाषा समझ आने लगी है और ये लोग अब विचारो के माध्यम से अपने ऊपर हो रहे अत्याचर, छुआछूत और शोषण को समझने लगे हैं। मेरे हिसाब से महज़ एससी/एसटी एक्ट के मसले की वजह से इतने लोग नहीं आये वरन दलितों पर लगातार बढ़ रहे अत्याचर भी मुख्य वजह रही है। दूसरी महत्तवपूर्ण चीज़ जो इस आंदोलन में देखने को मिली वो यह थी कि आम तौर पर दलित समाज में जो उप-जातियाँ देखने को मिलती हैं वो कहीं नज़र नहीं आई। सभी लोग एक पहचान(दलित) के रूप में इसका हिस्सा थे।

वैसे तो किसी भी दो घटनाओं की तुलना करना पूर्णता न्यायपूर्वक नहीं होता है लेकिन फिर भी यह आंदोलन मुझे दुनिया के दूसरे हिस्से (मध्य-एशिया) के यहूदियों द्वारा किए गए जिओनिस्ट आंदोलन की याद दिलाता है। यह अलग बात है कि जियोनिस्ट आंदोलन का उद्देश्य यहूदियों के लिए एक अलग और संप्रभु राष्ट्र के निर्माण का था (इस आंदोलन का उद्देश्य यह नहीं है) लेकिन इसमें कुछ जियोनिस्ट आंदोलन जैसे लक्षण देखे जा सकते है। विश्व में यहूदी समाज भी विभिन्न प्रकार के भेद भाव से जुझा है, आसमान व्यव्हार उनके साथ भी बहुत हुआ था, हेय दृष्टि से उन्हें भी देखा जाता रहा है, अपराधियों कि तरह व्यव्हार उनके साथ आम बात होती थी और हिटलर द्वारा किया गया यहूदियों का नरसंहार तो सर्व विदित है।

इसी प्रकार के भेदभाव और नरसंहार कि वजह से उन लोगों ने एक राष्ट्र कि मांग रखी थी। इसके लिए उन्होंने अपने बीच में से सभी प्रकार के मतभेद व असमानता हटा दी थी और सभी ने एक होकर नए राष्ट्र की मांग रखी और वे अपना नया राष्ट्र (इजराइल) बनाने में सफल भी हुए। आज भी इजराइल में विश्व के विभिन्न देशों से आये हुए यहूदी रहते हैं लेकिन उनके बीच में यह मतभेद नहीं है कि मैं अमरीकी यहूदी हूँ, रूसी यहूदी हूँ, यूरोपीय यहूदी हूँ या अफ़्रीकी यहूदी। उनका मत है कि वे सभी एक हैं और उनमें भाषा, रंग आदि का कोई भेदभाव नहीं है। इसी क्रम में 2 अप्रैल को हुए दलित आन्दोलंन में भी भारतीय दलित समाज आपसी मतभेद को भूलकर एक मंच पर आया और दलित समाज का जो थोड़ा उच्च और कुलीन वर्ग का तबका जो अभी तक साथ नहीं था, वो भी दिखाई दिया। इसके अलावा महिलाएं, बच्चे, बूढ़े कमजोर आदि सभी ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया।

वर्षों से सभी लोगों को जोड़ने और मिलाने का जो प्रयास चला आ रहा था, उसका रंग कहीं न कहीं अब जा कर दिखाई दिया है। तीसरी ख़ास बात जो इस आंदोलन में देखने को मिली वो था आम लोगों का जज़्बा। लोगों के मन से कहीं ना कहीं ये बात नज़र आ रही थी कि अब हम तब तक शांत नहीं बैठेंगे या आराम नहीं करेंगे जब तक हम अपने अधिकारों को प्राप्त नहीं कर लेते। ये बात जियोनिस्ट आंदोलन के पिता थियोडोर हर्ज़्ल के एक वक्तव्य से मिलती प्रतीत होती है। उन्होंने कहा था की "पहले उन्हें हमारे जमीन के टुकड़े पर सम्प्रभुता देने दो फिर हम आराम करेंगे”। कुछ ऐसी ही बात शायद अब भारत के दलित सोचने लगे हैं की जब तक हम समानता और सामाजिक न्याय को प्राप्त नहीं कर लेते तबटक हम आराम नहीं करेंगे।

साथ ही साथ मुझे लगता है कि इस आंदोलन के दौरान  पुलिस तथा अन्य संगठनो द्वारा आंदोलनकरियों पर किया गया हमला आग में घी डालने का काम करेगी क्यों कि इससे पहले एक बड़ी संख्या में दलितों का सरकार और प्रशासन पर भरोसा था। लोगों के इस विश्वास में भारी में कमी आयी है और ये बात घर करने लगी है कि सरकार हमारी मांगों और समस्याओ को लेकर गंभीर नहीं है और वह हमारे अधिकारों को छीनना चाहती है। अब तक सरकार के जो दलित समाज में सच्चे समर्थक थे वो भी इस बात को कहीं न कहीं स्वीकार करने लगे हैं।

ठीक इसी प्रकार की सोच यहूदियों की जर्मनी में नाज़ी सरकार को लेकर होने लगी थी और उन्होंने बाद में नाज़ी सरकार से परेशान होकर अपना एक अलग रास्ता चुना और इजराइल राष्ट्र निर्माण को मुकम्मल अंजाम तक पहुंचाया। हालांकि भारतीय दलित समाज के सामने नाजी सरकार जैसी बड़ी समस्या नहीं है। इस प्रकार यहूदियों कि तरह ही इस समाज में भी एकता के शुरुवाती लक्षण दिखाई दे रहे हैं, जज्बा पैदा हो रहा है,नए विचार उपज रहे हैं। लेकिन ये देखना दिलचस्प होगा कि क्या ये लोग आपसी जातियों के भेदभाव को मिटाकर एकता के सूत्र में बंधकर अपने अधिकारों, सामाजिक समानता और न्याय की लड़ाई को मुकम्मल अंजाम तक पहुंचा पाते हैं या नहीं।

(यह ब्लॉग जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के शोधार्थ‌ी छात्र विजय कुमार गोठवाल का है।)


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