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वेदप्रताप वैदिक का ब्लॉग: प्रदूषित दिल्ली अब भगवान भरोसे

By वेद प्रताप वैदिक | Updated: November 26, 2021 10:50 IST

भारत के मुकाबले यूरोप-अमेरिका में वाहन ज्यादा चलते हैं। वहां कल-कारखाने भी बहुत ज्यादा हैं, फिर भी उनका प्रदूषण-अंक 50 और 100 के बीच ही रहता है। यदि हमारी सरकारें भी प्रदूषण के स्थायी हल की कोशिश करें तो भारत की स्थिति उनसे भी बेहतर हो सकती है।

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दिल्ली में प्रदूषण का हाल इतना बुरा है कि इसे दुनिया का सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर भी कहा जा सकता है, हालांकि यह खिताब अंतरराष्ट्रीय प्रदूषण मापक संस्था ने पाकिस्तान के लाहौर को दे रखा है। दिल्ली की जहरीली हवा पर हमारा सर्वोच्च न्यायालय कई बार काफी सख्त टिप्पणियां कर चुका है लेकिन केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार की नींद अभी तक नहीं खुली है।

इस दिल्ली में दो-दो सरकारें हैं लेकिन दिल्ली का प्रदूषण अन्य बड़े शहरों के मुकाबले दुगुना है। राजनीतिक प्रदूषण जब दिल्ली में बढ़ता है तो लोग उसकी ज्यादा परवाह नहीं करते बल्कि लोग उसका रस लेते हैं लेकिन यह जलवायु-प्रदूषण तो जितना जनता के लिए बुरा है, उससे भी ज्यादा नेताओं के लिए बुरा है, क्योंकि नेता अपने कार्यकर्ताओं से मिले-जुले बिना रह नहीं सकते और भीड-भड़क्के के बिना उनका काम नहीं चलता।

सर्वोच्च न्यायालय के जजों ने कहा है कि हमारी सरकारें प्रदूषण से निपटने में बड़ी लापरवाही कर रही हैं। वे भगवान भरोसे बैठी रहती हैं। इसीलिए प्रदूषण का स्तर दिल्ली में सबसे ज्यादा है। दिल्ली में आज प्रदूषण-अंक 500 और उससे भी ऊपर दौड़ रहा है जबकि कल सर्वोच्च न्यायालय में सरकारी वकील दुहाई दे रहे थे कि दिल्ली में प्रदूषण घट रहा है, क्योंकि तेज हवा के कारण कुछ घंटों के लिए वह 250 के आस-पास पहुंच गया था।

पराली के कारण प्रदूषण लगभग 30 प्रतिशत हो जाता है जबकि कुछ सरकारी सूत्र कहते रहते हैं कि पराली के कारण वह सिर्फ 2 प्रतिशत होता है। अगर यह सही भी है तो पहले की तरह बाहर से आनेवाले ट्रकों पर इस साल प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया गया? कारों के सम-विषम नंबरों के आधार पर उनके यातायात और परिवहन को क्यों नहीं रोका गया? आम आदमी मुखपट्टी तो बांधे रह सकता है लेकिन अपने घरों में प्रदूषण-नियंत्रण यंत्र वह कहां से लाकर रख सकता है? 

नोटबंदी और तालाबंदी ने उसका हाल इतना खस्ता कर दिया है कि उसे भरपेट रोटी भी नसीब नहीं है तो वह प्रदूषित हवा से खुद को कैसे बचा सकता है? अदालत ने तो यह भी कहा है कि दिल्ली पर कुछ दिनों के लिए दुबारा तालाबंदी क्यों नहीं थोपी गई? सरकार की तरफ से पेश सफाई में उसके वकील ने अदालत के सामने कई आंकड़े पेश करके यह बताने की कोशिश की कि सरकार ने पुराने धुंआफेंक वाहनों, जहरीले ईंधन से चलने वाले उद्योगों और अंधाधुंध भवन-निर्माण कार्यों पर तरह-तरह के जुर्माने लगाने में कोई कोताही नहीं की है। उसने करोड़ों रुपये का जुर्माना ठोंका है।

भारत के मुकाबले यूरोप और अमेरिका के शहरों में वाहन ज्यादा चलते हैं। वहां कल-कारखाने भी बहुत ज्यादा हैं, फिर भी उनका प्रदूषण-अंक 50 और 100 के बीच ही रहता है। यदि हमारी सरकारें भी प्रदूषण के स्थायी हल की कोशिश करें तो भारत की स्थिति उनसे भी बेहतर हो सकती है।

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