जीवनदायी जल के दूषित होने की समस्या से जूझता देश
By पंकज चतुर्वेदी | Updated: January 16, 2026 05:51 IST2026-01-16T05:51:42+5:302026-01-16T05:51:42+5:30
केंद्र सरकार की 2015 में शुरू की गई अटल मिशन या अमृत-1 योजना में पाइप डालने और टंकी खड़े करने पर सन् 2021 तक 72656 करोड़ रुपए खर्च हुए और उसके बाद अमृत-2 में भी भारी-भरकम व्यय हो रहा है,

सांकेतिक फोटो
इंदौर के एक मुहल्ले भागीरथपुर में करीब दो दर्जन मौतों के बाद गुजरात की राजधानी गांधी नगर के सेक्टर 24, 26, 28 और आदिवाड़ा क्षेत्रों में दूषित पानी पीने से कई सौ लोगों को पीलिया और टाइफाइड होने से कोहराम मचा है. अधिकांश बीमार बच्चे हैं और अस्पताल में हैं. इसी दौरान अब देशभर से घर में आ रहे नल के जल के असुरक्षित होने के समाचारों का अंबार है. दुर्भाग्य है कि केंद्र सरकार की 2015 में शुरू की गई अटल मिशन या अमृत-1 योजना में पाइप डालने और टंकी खड़े करने पर सन् 2021 तक 72656 करोड़ रुपए खर्च हुए और उसके बाद अमृत-2 में भी भारी-भरकम व्यय हो रहा है,
लेकिन तैयार संरचनाओं के रखरखाव, गुणवत्ता निर्धारण पर सभी जगह लापरवाही देखी गई. नेशनल सैंपल सर्वे आफिस(एनएसएसओ) की 76वीं रिपोर्ट बताती है कि देश में 82 करोड़ लोगों को उनकी जरूरत के मुताबिक पानी मिल नहीं पा रहा है. देश के महज 21.4 फीसदी लोगों को ही घर तक सुरक्षित जल उपलब्ध है. सबसे दुखद है कि नदी-तालाब जैसे भूतल जल का 70 प्रतिशत बुरी तरह प्रदूषित है.
सरकार स्वीकार कर रही है कि 78 फीसदी ग्रामीण और 59 प्रतिशत शहरी घरों तक स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है. सारे देश के शहरी इलाकों में नल से आ रहे पानी के दूषित होने के लगभग एक जैसे कारण हैं. सबसे पहला कारण तो जल का स्रोत ही है. जिस नदी, तालाब या भूजल से पानी की आपूर्ति हो रही है, वे ही बुरी तरह बीमार हैं और उस पानी के शोधन के संयंत्र उससे अधिक रोगग्रस्त हैं.
गांव-कस्बे तक भूजल पर निर्भरता है और यह सभी जानते हैं कि धरती के गर्भ से पानी खींचना भले सरल हो, यदि वह दूषित है तो उसका निराकरण आसान नहीं है. पहले से दूषित स्रोत से घर तक पानी के पहुंचने के रास्ते में सबसे बड़े पड़ाव ‘बड़ी पानी की टंकी’ या फिर ‘जलाशय’ खुद बीमार रहते हैं. दिल्ली में वजीराबाद और चंद्रावल जैसे जलाशयों की दशकों से सफाई नहीं हुई और उसमें कई फुट गाद है.
छोटी गलियों वाले मुहल्लों में सीवर निकासी और जल आपूर्ति की पाइप लाइन का आजू-बाजू में होना आम बात है. फिर वहां फोन-इंटरनेट प्रदाता कंपनी या फिर गैस वाली कंपनियां उसी संकरे इलाके में खुदाई कर अपनी लाइन बिछाती रहती हैं. ठेकों से होने वाले इन कामों में यह कोई परवाह नहीं करता कि पानी या सीवर की सरकारी लाइन को कहीं नुकसान तो नहीं हो रहा.
पर्यावरण मंत्रालय और केंद्रीय एजेंसी ’एकीकृत प्रबंधन सूचना प्रणाली’ (आईएमआईएस) के मुताबिक पूरे देश में 70736 बस्तियां फ्लोराइड, आर्सेनिक, लौह तत्व और नाइट्रेट सहित अन्य लवण एवं भारी धातुओं के मिश्रण वाले दूषित जल से प्रभावित हैं. इस पानी की उपलब्धता के दायरे में 47.41 करोड़ आबादी आ गई है.
यह कड़वा सच है कि भारत इस समय तेजी से शहरीकरण की तरफ भाग रहा है और अधिकांश शहरीकरण अनियोजित है. बहुत से शहरों में स्मार्ट सिटी के नाम पर भी कई करोड़ रु. खर्च हो चुके हैं. हाल की घटनाओं ने सारे देश को चेतावनी दे दी है कि जब तक ‘जमीन के ऊपर’ की सफाई ‘जमीन के नीचे’ की सुरक्षा के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चलेगी, तब तक ‘स्वच्छता या स्मार्ट’ के ये पदक अधूरे ही रहेंगे.