higher education change priority | उच्च शिक्षा क्षेत्र की बदलती प्राथमिकताएं
उच्च शिक्षा क्षेत्र की बदलती प्राथमिकताएं

डॉ. एस.एस. मंठा

एक और शैक्षणिक सत्र शुरू हो चुका है। आज के छात्र वास्तव में क्या चाहते हैं? पारिस्थितिकी तंत्र उन्हें क्या दे सकता है? एक नियोक्ता उनमें क्या देखता है? एक तेज और हमेशा बदलने वाले रोजगार परिदृश्य में स्नातक स्तर की पढ़ाई के चार में से तीन साल ऐसी चीजों को सीखने में निकल जाते हैं जो प्रचलन में नहीं हैं, सिवाय उन चीजों के जो पूरक विषय के रूप में सिखाई जाती हैं और विश्लेषणात्मक तर्क क्षमता में सुधार करती हैं। परिदृश्य ऐसा है कॉलेज जाने वाले को पता ही नहीं होता कि तीन या चार साल बाद वह रोजगार के किस क्षेत्र में फिट होगा या कैसा कौशल हासिल करने की उसे जरूरत है।

शिक्षाविदों का यह कहना गलत नहीं है कि छात्र ज्ञान हासिल करने और एक अच्छा नागरिक बनने के लिए कॉलेज जाते हैं, लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि स्नातक होने के बाद छात्र एक प्रतिष्ठित और सार्थक रोजगार हासिल करने के आकांक्षी होते हैं। लेकिन आज का पारिस्थितिकी तंत्र क्या छात्रों की इस आकांक्षा को पूरा कर रहा है? हर चुनौती को एक  अवसर में रूपांतरित किया जाना चाहिए। लेकिन क्या इस चुनौती को  दोनों पक्षों की जीत में रूपांतरित किया जा सकता है?

उच्च शिक्षा कई मोर्चो पर चुनौती बन कर उभर रही है। उन लोगों के लिए भी जो अकादमिक रूप से प्रतिभाशाली हैं और उन लोगों  के लिए भी जो कम प्रतिभाशाली हैं। उच्च शिक्षा को बीच में छोड़ने वालों और अन्य विकल्प खोजने वालों के लिए इसकी लागत एक प्रमुख कारक है। यह हमें प्रदर्शन को परिभाषित करने की ओर ले जाता है। क्या शिक्षा हमें अच्छे प्लेसमेंट की ओर ले जाती है? क्या यह हमारे मूल्यों में वृद्धि करती है या युवाओं के मन में अच्छे विचारों को बिठाती है? यह महत्वपूर्ण सवाल हैं जिनके जवाब उच्च शिक्षा के कर्ता-धर्ताओं को अवश्य देने चाहिए। व्यवहार में, उच्च शिक्षा के भीतर का यथार्थ इसके बाहर के लोगों की उम्मीदों से मेल नहीं खाता है। इस बेमेल की वजह से और अधिक निराशा पैदा होती है। उच्च शिक्षा के बाहर, कुछ लोगों का मानना है कि कॉलेज जितने इनोवेटिव होंगे, परिणाम में उतना ही सुधार होगा। नवाचार अगर किसी वस्तु का नाम हो तो उसे किसी भी कीमत पर किया जा सकता है। लेकिन नवाचार की इस इच्छा के बावजूद, केंद्र और राज्य सरकारों का फंड आवंटित करने का फामरूला बहुत पारंपरिक और घिसा-पिटा होता है।

15 साल पहले, नौकरी के लिए साक्षात्कार में किसी स्नातक से उसकी डिग्री, उसके ग्रेड और उसकी पाठय़ेतर गतिविधियों की प्रकृति के बारे में पूछा जाता था। आज इनके अतिरिक्त नई मांगें तेजी से बढ़ती जा रही हैं, जैसे क्या आपके पास विदेशी अनुभव है? संस्थान में शामिल होने पर आप उसमें मूल्य वृद्धि कैसे कर सकते हैं? क्या आपके पास डाटा के साथ काम करने का अनुभव है? क्या परिवर्तनों का सामना करने के लिए आप पर्याप्त रूप से चुस्त हैं? इस प्रकार नियोक्ता अब आपकी उन योग्यताओं के बारे में जानना चाहते हैं जो कि डिग्रियों के पार है। 

एक अमेरिकी शोधकर्ता कार्लिन बोरिसेंको ने कुछ साल पहले अपनी एक किताब में कहा था कि उच्च शिक्षा के कर्ता-धर्ताओं को कई महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने एक सव्रेक्षण का हवाला दिया जिसके अनुसार 24 प्रतिशत पूर्व छात्रों का कहना था कि उनकी कॉलेज की शिक्षा की लागत अपने मूल्य से अधिक थी। शायद उनका संकेत कॉलेज की डिग्री में निवेश के प्रतिफल की ओर था जो उन्हें उम्मीद के अनुरूप हासिल नहीं हो रहा था। बोरिसेंको ने यह भी बताया कि कंपनियों के अधिकारी अब स्नातकोत्तर उत्तीर्ण छात्रों पर पहले की अपेक्षा ज्यादा ध्यान देते हैं, चाहे उसे रोजगार दर से मापा जाए या वेतन के स्तर पर। इसके अलावा छात्र और उनके परिवार कॉलेज की डिग्री में अपने निवेश पर तत्काल वित्तीय लाभ पाने की उम्मीद रखते हैं। हालांकि यह सव्रेक्षण अमेरिकी संदर्भ में है, लेकिन यह भारत की वर्तमान स्थिति का भी सच्चा प्रतिबिंब है, जहां 90 प्रतिशत तकनीकी शिक्षा और 65 प्रतिशत उच्च शिक्षा निजी हाथों में है।

एक बड़ा परिवर्तन पाठय़क्रम में किया जाना जरूरी है, जहां लिबरल आर्ट्स और सामाजिक पहलुओं को महत्व दिया जाए। तकनीकी शिक्षा से निश्चित रूप से रोजगार मिलता है, लेकिन यह एकआयामी है। नियोक्ता की दृष्टि से आज कई कौशल आवश्यक हैं। रोजगार के लिए आज किस तरह के कौशल की आवश्यकता है? प्रारंभिक स्तर की नौकरियां आज ऐसी दुनिया में गायब हो रही हैं जहां आटोमेशन फल-फूल रहा है। एक पिरामिडनुमा संरचना, जहां प्रारंभिक स्तर की नौकरियां अवसरों की आधारशिला के समान हों, उनका गायब होना गंभीर क्षति का कारण बन सकता है। इसलिए मध्यम स्तर के कौशल को अधिक संवर्धित किया जाना चाहिए। 

भविष्य में रिज्यूम से क्या कोई फर्क पड़ेगा? संस्थान तेजी से उम्मीदवारों को इस आधार पर परखने की ओर बढ़ रहे हैं कि उनके पास कौशल क्या-क्या है, न कि उनके रिज्यूम में क्या लिखा है। भविष्य में उम्मीदवारों का ऑन-साइट असेसमेंट बढ़ने की संभावना है। उच्च शिक्षा क्षेत्र के सामने जैसी चुनौतियां आज हैं वैसी पहले कभी नहीं देखी गई हैं। संस्थानों के कर्ता-धर्ता समस्याओं, खासकर आर्थिक समस्याओं के समाधान के लिए उच्च शिक्षा की तरफ देख रहे हैं।


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