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भरत झुनझुनवाला का ब्लॉग: पूंजी का पलायन रोके रिजर्व बैंक

By भरत झुनझुनवाला | Updated: March 7, 2022 16:42 IST

सरकार को चाहिए कि रिजर्व बैंक की कमेटी की रिपोर्ट को अमान्य करते हुए भ्रष्टाचार पर रोक लगाए, सरकारी खपत को घटाए और मुक्त व्यापार को अपनाने के स्थान पर आयात कर बढ़ाए। तभी अपने देश से पूंजी का पलायन कम होगा और देश की विकास दर बढ़ेगी।

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रिजर्व बैंक की कमेटी ने संस्तुति की है कि देश को पूंजी के मुक्त आवागमन की छूट देनी चाहिए। यानी विदेशी निवेशक भारत में स्वच्छंदता से आ सकें और भारतीय निवेशक अपनी पूंजी को स्वच्छंदता से भारत से बाहर ले जाकर निवेश कर सकें, ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए. कमेटी का कहना है इसके चार लाभ हैं। 

पहला यह कि देश में पूंजी की उपलब्धता बढ़ जाएगी। यह सही है कि इससे विदेशी पूंजी का भारत में आना सरल हो जाएगा क्योंकि जो विदेशी निवेशक भारत में निवेश करेंगे उनके लिए समय क्रम में अपनी पूंजी को निकाल कर अपने देश वापस ले जाना आसान हो जाएगा, लेकिन यह दोधारी तलवार है। यदि विदेशी निवेशकों के लिए भारत में पूंजी लाना आसान हो जाएगा तो भारतीयों के लिए भी अपनी पूंजी को बाहर ले जाना आसान हो जाएगा।

रिजर्व बैंक के ही आंकड़े बताते हैं कि पिछले 3 वर्षो में हमारा पूंजी खाता ऋणात्मक रहा है यानी जितनी विदेशी पूंजी अपने देश में आई है उससे ज्यादा पूंजी अपने देश से बाहर गई है, इससे प्रमाणित होता है कि पूंजी का मुक्त आवागमन विपरीत दिशा में ज्यादा चल रहा है। जैसे दो टंकियों के बीच में एक वॉल लगा हो तो पानी उस तरफ ज्यादा जाएगा जहां पानी का स्तर कम होगा।

इसी प्रकार विदेशी और भारतीय पूंजी के बीच में वॉल को खोल दें तो किस तरफ पूंजी का बहाव होगा यह इस पर निर्भर करेगा कि पूंजी का आकर्षण किस तरफ अधिक है। कमेटी का दूसरा कथन है कि पूंजी के मुक्त आवागमन से अपने देश में पूंजी की लागत कम हो जाएगी और ब्याज दर कम हो जाएगी, लेकिन रिजर्व बैंक के ही आंकड़े इसके विपरीत खड़े हैं जो बता रहे हैं हमारा पूंजी खाता ऋणात्मक है यानी पूंजी बाहर जा रही है और जिसके कारण अपने देश में पूंजी का मूल्य बढ़ रहा है।

कमेटी ने तीसरा तर्क दिया है कि पूंजी के मुक्त आवागमन से भारतीय कंपनियों द्वारा लिए जाने वाले लोन का विविधीकरण हो जाएगा, जैसे किसी कंपनी को यदि फैक्ट्री लगानी हो तो कुछ पूंजी वह भारतीय बैंक से लेंगे, कुछ विदेशी बैंक से लेंगे कुछ विदेशी निदेशकों से लेंगे। इस प्रकार उनके ऊपर जो लोन का भार है वह किसी एक स्रोत पर निर्भर होने के स्थान पर विविध स्रोतों पर बंट जाएगा और ज्यादा टिकाऊ होगा। 

यह बात सही है। कई कंपनियों ने हाल में विदेशी पूंजी का लोन लिया भी है, लेकिन जितना उन्होंने लिया है उससे ज्यादा बाहर भी गया है इसलिए यह विविधीकरण कंपनियों के लिए लाभप्रद रहा हो सकता है लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था को लाभ हुआ हो ऐसा नहीं दिखता है। कमेटी के अनुसार चौथा लाभ भारतीय निवेशकों के लिए निवेश का विविधीकरण है। भारतीय निवेशक विदेशी प्रॉपर्टी एवं शेयर बाजार के साथ-साथ भारतीय प्रॉपर्टी एवं शेयर बाजार में निवेश कर सकेंगे, लेकिन पुन: यह लाभ निवेशक विशेष को होगा।

यह देश का लाभ नहीं है क्योंकि जब भारतीय निवेशक अपनी पूंजी का विदेशों में निवेश करते हैं तो भारत की पूंजी बाहर जाती है और भारत की अर्थव्यवस्था कमजोर होती है। इन कारणों से मेरी दृष्टि से कमेटी के दिए गए तर्क मान्य नहीं हैं। विशेष बात यह है कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने कहा है कि आपदा के समय विकासशील देशों को पूंजी के मुक्त आवागमन पर रोक लगानी चाहिए. उन्होंने कोरिया और पेरू द्वारा कोविड संकट के दौरान ऐसे प्रतिबंध लगाने का स्वागत किया है।

हमें भी इस दिशा पर विचार करना चाहिए। वर्तमान में हमारे सामने एक और संकट है कि अभी तक अमेरिकी फेडरल रिजर्व बोर्ड ने ब्याज दर शून्य के लगभग कर रखी थी। निवेशकों के लिए लाभप्रद था कि अमेरिका में लोन लेते और भारत में निवेश करते, लेकिन अब फेडरल रिजर्व बोर्ड ने संकेत दिए हैं कि वे शीघ्र ही ब्याज दरों में वृद्धि करेंगे। 

यदि ऐसा होता है तो निवेशकों के लिए अपनी पूंजी को भारत से निकालकर अमेरिका ले जाना ज्यादा लाभप्रद हो जाएगा क्योंकि अमेरिका में निवेश को ज्यादा स्थाई और टिकाऊ माना जाता है, इसलिए हमको विचार करना चाहिए कि आखिर हमारी देश से पूंजी का पलायन हो क्यों रहा है। 

सरकार को चाहिए कि रिजर्व बैंक की कमेटी की रिपोर्ट को अमान्य करते हुए भ्रष्टाचार पर रोक लगाए, सरकारी खपत को घटाए और मुक्त व्यापार को अपनाने के स्थान पर आयात कर बढ़ाए। तभी अपने देश से पूंजी का पलायन कम होगा और देश की विकास दर बढ़ेगी।

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