Sahir Ludhianvi Birthday Special: his famous poems and life journey | मूर्तियां तोड़ने के इस दौर में साहिर लुधियानवी एक ही सवाल पूछते, 'जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहां हैं?'

त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति ढहाई गई। उसके बाद तमिलनाडु में पेरियार की, कोलकाता में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की, उत्तर प्रदेश में भीमराव अंबेडकर और आज केरल में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रतिमा को नुकसान पहुंचाया गया। काश, आज गीतकार साहिर हमारे बीच जिंदा होते तो विचारधारा की लड़ाई में धूर्तता पर उतर आए इस समाज की आंख में आंख डालकर पूछते, 'जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहां हैं?' आज ही गीतकार साहिर लुधियानवी का जन्मदिन है। साहिर की शायरी यथार्थ के बेहद करीब है। उन्होंने मुफलिसी, अन्याय और अत्याचार पर भी उतने ही अधिकार से लिखा जितना प्यार पर।

जरा मुल्क के रहबरों को बुलाओ
ये कूचे ये गलियां ये मंजर दिखाओ
जिन्हें नाज है हिंद पर उनको लाओ
जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहां हैं...?

साहिर का शाब्दिक अर्थ होता है जादू। उनकी शायरी सचमुच एक करिश्मा है। साहिर का रचना संसार यथार्थ के बेहद करीब है। उनका ये शेर पढ़कर लगता है कोई जीवन का दर्शन लिख दिया गया हो।

तार्रुफ रोग बन जाए तो उसको भूलना बेहतर, 
ताल्लुक बोझ बन जाए तो उसको तोड़ना अच्छा।

वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन, 
उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा।।

एक और नमूना पढ़िए...

ये दुनिया दो-रंगी है 

एक तरफ़ से रेशम ओढ़े एक तरफ़ से नंगी है 
एक तरफ़ अंधी दौलत की पागल ऐश-परस्ती 
एक तरफ़ जिस्मों की क़ीमत रोटी से भी सस्ती

एक तरफ़ है सोनागाची एक तरफ़ चौरंगी है 
ये दुनिया दो रंगी है 

प्यार पर साहिर की सोच सबसे जुदा है। प्यार की पराकाष्ठा पर जाकर वो लिखते हैं, 'चलो एकबार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों।' प्रेमी जोड़ों की मुलाकात के वक्त मन को उद्गारों को साहिर ने ये शब्द दिए हैं। नायक कहता है, 'अभी ना जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नहीं।' नायिका जवाब देती है, 'अगर मैं रुक गई अभी, तो जा न पाऊंगी कभी, यही कहोगे तुम सदा कि दिल अभी नहीं भरा।' कभी-कभी फिल्म के उस अमर गीत की जितनी तारीफ करें कम होगा। 

'कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
कि ये बदन ये निगाहें मेरी अमानत हैं
ये गेसुओं की घनी छांव है मेरी खातिर
ये होठ और ये बाहें मेरी अमानत हैं।'

साहिर लुधियानवी का सफरनामाः-

- अब्दुल हयी यानी साहिर 8 मार्च 1921 को एक रईस खानदान में पैदा हुए थे। बचपन से ही वो अपने मां-पिता से अलग मुफलिसी में गुजर करते थे। 

- साहिर लुधियानवी 1939 में गवर्नमेंट कॉलेज में पढ़ते थे। उन्हें अमृता प्रीतम से प्रेम हो गया। अमृता भी उनकी शायरी की कायल थीं। अमृता के घरवालों को यह बात पसंद नहीं थी और उन्हीं के कहने उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया।

- अपने संघर्ष के दिनों में साहिर लगातार शायरी लिखते रहे। 1943 में उनकी पहली किताब तल्खियां प्रकाशित हुई।

- साहिर लाहौर से मुंबई पहुंचे और फिल्मों के लिए लिखना शुरू कर दिया। बतौर गीतकार उनकी पहली फिल्म थी आजादी की राह पर।

- साहिर ने बॉलीवुड के गीतों को नई ऊंचाइयां दी हैं। 1963 में ताजमहल फिल्म के लिए उन्हें फिल्म फेयर अवार्ड मिला। कभी-कभी फिल्म के लिए उन्हें साल 1976 में दूसरा फिल्म फेयर अवार्ड मिला।

- 8 मार्च 2013 को साहिर के 92वें जन्मदिन पर सम्मान में स्टाम्प जारी किया गया। 

- 25 अक्टूबर, 1980 को साहिर लुधियानवी का निधन हो गया।


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