हिटलर के खिलाफ ‘कान्स’ और बेजोड़ चेतन आनंद, सत्यजित राय, रविशंकर
By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: May 5, 2026 07:13 IST2026-05-05T07:12:01+5:302026-05-05T07:13:59+5:30
अंदरूनी बुराई को खत्म करने के प्रयास जारी हैं और महिला निर्देशकों के लिए काफी जगह बनाई गई है. तमाम खामियों के बावजूद कान्स में वह दिखाया जा सकता है, जो ऑस्कर में कभी नहीं दिखाया जा सकेगा.

हिटलर के खिलाफ ‘कान्स’ और बेजोड़ चेतन आनंद, सत्यजित राय, रविशंकर
सुनील सोनी
दोनों में एक दशक का अंतराल था. 1946 और 1956. चेतन आनंद ने आजादी के पहले ‘नीचा नगर’ बनाई थी, जिसे भारतीय फिल्मोद्योग ने तिरस्कृत कर दिया. विश्वविजय का सपना देखनेवाले हिटलर और मुसोलिनी जैसे फासीवादी तानाशाहों ने सिनेमा का राष्ट्रवादी, सांप्रदायिक इस्तेमाल शुरू किया और वेनिस अंतरराष्ट्रीय फिल्मोत्सव जैसे सम्मानित समारोहों में प्रोपेगंडा फिल्मों को पुरस्कार दिया जाने लगा, तो फ्रांस के कला जगत में इसके खिलाफ लहर खड़ी हुई.
यूं कला जगत में खलबली तभी मच गई थी, जब 1937 में मुसोलिनी ने फ्रांसीसी शांतिवादी फिल्म ‘ला ग्रांडे इल्यूजन’ को न जीतने देने का ऐलान किया था. लेकिन, 1938 में मुसोलिनी और हिटलर ने जूरी के फैसलों को पलटते हुए सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार मुसोलिनी के बेटे की देखरेख में बनी इतालवी युद्ध फिल्म ‘लुसियानो सेरा, पायलट’ को दे दिया, जबकि सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म का पुरस्कार हिटलर की खास लेनी रीफेन्श्टाल के वृत्तचित्र ‘ओलंपिया’ को दे दिया गया. जूरी ने इस्तीफा दे दिया.
फ्रांसीसी लेखक फिलिप एरलैंगर और अमेरिकी पत्रकार रॉबर्ट फेवर डि ब्रेट ने मिलकर कान्स अंतरराष्ट्रीय फिल्मोत्सव की नींव रखी, जहां सिर्फ कला हो, न कि राजनीतिक दबाव. फ्रांसीसी कलाविद व संस्कृति मंत्री ज्यां जे की मंजूरी से पहली सितंबर 1939 को पहला कांस शुरू हुआ और हिटलर ने पोलैंड पर हमला कर विश्वयुद्ध की शुरुआत कर दी. एकमात्र फिल्म ‘द हंचबैक ऑफ नोत्रे दम’ के प्रदर्शन के साथ ही अगले छह सालों के लिए यह फिल्मोत्सव स्थगित हो गया. युद्ध, सेंसरशिप और फासीवाद से मुक्ति की चाह लिए 1946 में पहला कान्स फिल्मोत्सव हुआ.
19 देशों की फिल्मों में परतंत्र भारत की ‘नीचा नगर’ ने ‘ग्रां प्री’ जीतकर वह नाम कमाया कि आखिरी वायसराय और फिल्मों के शौकीन लॉर्ड माउंटबेटन ने भावी प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को बुलाकर उनके साथ यह फिल्म देखी. ‘नीचा नगर’ ने देश की आजादी से पहले ही शोषण, असमानता, भेदभाव के खिलाफ आजादी की घोषणा कर दी थी.
प्रगतिशील कलाकारों, लेखकों, विचारकों के समूह ‘इप्टा’ के तीन सदस्यों, निर्देशक चेतन आनंद, पटकथा लेखक हयातुल्ला अंसारी और ख्वाजा अहमद अब्बास ने मक्सिम गोर्की के 1902 के नाटक ‘द लोअर डेप्थ्स’ का फिल्मी रूपांतरण भारतीय संदर्भ में किया था. ‘नीचा नगर’ की कहानी को देखें, तो अब भी बदला कुछ नहीं है. एक दबंग गरीबों की बस्ती का पानी रोक देता है और जब गंदा पानी पीने से लोग बीमार पड़ रहे हैं, मर रहे हैं, तो खैराती अस्पताल खोलकर मसीहा बन जाता है. फिल्मोद्योग ने यह बहाना बनाकर इसे रिलीज करने से मना कर दिया कि इसमें कोई गाने नहीं हैं.
लेकिन, पं. रविशंकर ने फिल्म में इतना मार्मिक संगीत रचा कि कान्स भौंचक हो गया. संयोग ही है कि 1956 में जब सत्यजित रे ने ‘पथेर पांचाली’ को रचा, तो संगीतकार पं. रविशंकर ही थे और कान्स ने ही उसे सर्वश्रेष्ठ मानवीय दस्तावेज के लिए पाम डि’ओर से नवाजा. इस फिल्म में भी गाने नहीं थे, पर बंगाल फिल्मोद्योग ने उसे नहीं नकारा और कई हफ्ते तक कोलकाता के सिनेमाघर भरे रहे.
कान्स में वैभव और कला साथ-साथ चलते रहे हैं. पहले दशक में ग्रेस केली, केरी ग्रांट, जीना लोलोब्रीजीदा ने हॉलीवुड की चमक बिखेरी, जो अब दुनियाभर के सिने सितारों की चमक बन गई है. 1959 में ‘मार्शे डू फिल्म’ के जरिये व्यापार जुड़ा, तो इस फिल्मोत्सव में अब हर साल सिनेजगत के 15000 लोग आते हैं, 4000 फिल्में और सिने परियोजनाएं बनती हैं, अरबों के सौदे तय होते हैं. हालांकि अब भी मूलमंत्र कला ही है.
1960 के दशक में फ्रांसुआ त्रूफो, ज्यां-ल्यूक गोदार जैसे नए सिनेमा के वाहकों ने इसी मंच से घोषणा की कि फिल्मकार की व्यक्तिगत दृष्टि ही सिनेमा है. 1968 में छात्र क्रांति के बीच दोनों ने कार्लोस सौरा की फिल्म का प्रदर्शन रुकवा दिया. एक बार फिर जूरी ने इस्तीफा दिया और 1972 में फिल्मोत्सव में फिल्मों का चयन सरकारों के बजाय स्वतंत्र समिति करने लगी. नतीजतन आंद्रेई तारकोवस्की समेत कई जैसे निर्देशकों की फिल्में, जो उनके देशों में प्रतिबंधित थीं, कान्स में दिखाई जा सकीं.
1983 में ग्लैमर के तड़के के रूप में 24 लाल कालीन की सीढ़ियां जुड़ीं और 1994 में क्वेंटिन टैरंटिनो की ‘पल्प फिक्शन’ ने 200 करोड़ कमाकर बताया कि कला फिल्में भी व्यापार कर सकती हैं. भारत के साथ ही चीन, ईरान, जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान से आई फिल्मों ने तहलका मचा दिया.
2017 में ओटीटी के खिलाफ सिनेमाघर मालिकों ने विद्रोह किया, तो प्रतियोगिता के लिए थिएटर में अनिवार्य प्रदर्शन का नियम बना. 2018 में ‘मी टू’ से पता चला कि कभी राजनीतिक दमन के खिलाफ बना कला का यह महोत्सव ‘शोषण का अड्डा’ बन गया है. अंदरूनी बुराई को खत्म करने के प्रयास जारी हैं और महिला निर्देशकों के लिए काफी जगह बनाई गई है. तमाम खामियों के बावजूद कान्स में वह दिखाया जा सकता है, जो ऑस्कर में कभी नहीं दिखाया जा सकेगा. यही वजह है कि 2024 में पायल कपाड़िया की ‘ऑल वी इमैजिन एज लाइट’ ने पाम डि’ओर जीता.