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महाभारत: अर्जुन की एक नहीं दो बार हुई थी मृत्यु! जानिए इस घटना से जुड़ी पूरी कहानी

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: June 21, 2019 14:07 IST

इस युद्ध में बभ्रुवाहन भारी पड़े और ऐसा तीखा तीर अपने पिता पर चलाया जिससे अर्जुन अपनी जान गंवा बैठे। ब्रभुवाहन भी बेहोश हो गये। इसके बाद चिंत्रागदा भी युद्ध भूमि पहुंच गईं और विलाप करने लगी।

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ठळक मुद्देदुनिया के सबसे महान धनुर्धर में गिने जाते हैं अर्जुनमहाभारत में कौरव-पांडवों के युद्ध के बाद अपने ही पुत्र के हाथों मारे गये थे अर्जुन

महाभारत के युद्ध के बाद अर्जुन और अन्य पांडु पुत्रों के स्वर्ग की यात्रा के दौरान मृत्यु की कहानी तो सभी जानते हैं। हालांकि, क्या आप जानते हैं कि इस घटना से पहले ही एक बार और अर्जुन की मृत्यु हो चुकी थी। बाद में वे फिर से जीवित हुए। जानिए, इस घटना से पूरी कहानी....

दरअसल, महाभारत की लड़ाई के बाद भगवान श्रीकृष्ण और महर्षि वेदव्यास के सुझाव पर पांडवों ने अश्वमेघ यज्ञ करने का विचार किया। यज्ञ की शुरुआत हुई और युधिष्ठिर ने अर्जुन को रक्षक बनाकर घोड़ा छोड़ा। इस यज्ञ की परंपरा के अनुसार घोड़ा जहां-जहां जाता है, वह राज्य और वहां के राजा को अधीनता स्वीकार करनी पड़ती है। जबकि विरोध करने वाले राजा को लड़ाई लड़नी होती है। पांडवों के इस यज्ञ के दौरान भी ऐसा ही कुछ हुआ।

कई राजाओं ने पांडवों की अधीनता स्वीकर की जबकि कई राज्यों ने मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किये। यज्ञ का घोड़ा ऐसे ही घूमते-घूमते मणिपुर पहुंच गया। इस समय मणिपुर के राजा बभ्रुवाहन थे। बभ्रुवाहन दरअसल मणिपुर की राजकुमारी चित्रांगदा और अर्जुन के पुत्र थे। बभ्रुवाहन को जब इस विषय में मालूम हुआ कि उनके पिता आ रहे हैं तो वे उनके स्वागत के लिए नगर के द्वार पर पहुंच गये।

अर्जुन का अपने पुत्र बभ्रुवाहन से हुआ युद्ध

बभ्रुवाहन को नगर के बाहर देखकर अर्जुन ने कहा कि वे घोड़े की रक्षा करते हुए यहां पहुंचे हैं। इसलिए बभ्रुवाहन को युद्ध करना होगा। साथ ही अर्जुन ने कहा, 'बभ्रुवाहन, तुम मेरे बेटे हो। यह क्षत्रिय धर्म है कि तुम घोड़े को पकड़ो और विरोध करो। इस तरह दुश्मन का स्वागत करना तुम्हें शोभा नहीं देता। अगर तुम में हिम्मत है तो इस घोड़े को पकड़ो और युद्ध करो।'

इसी समय  अर्जुन की एक और पत्नी और नागकन्या उलूपी भी यहां पहुंच गईं और बभ्रुवाहन को युद्ध के लिए उकसाने लगीं। इसके बाद अर्जुन और बभ्रुवाहन के बीच भयंकर युद्ध हुआ।

इस युद्ध में बभ्रुवाहन भारी पड़े और ऐसा तीखा तीर अपने पिता पर चलाया जिससे अर्जुन अपनी जान गंवा बैठे। ब्रभुवाहन भी बेहोश हो गये। अपने पिता और पुत्र के इस हालत को जानकर राजकुमारी चित्रांगदा भी युद्ध भूमि में पहुंच गईं और विलाप करने लगीं। यह देख उलूपी का ह्रृद्य पसीज गया। इस बीच ब्रभुवाहन को होश आ गया। वे भी अपने पिता की मृत्यु से दुखी थी। आखिरकार उलूपी ने अर्जुन को जिंदा करने का फैसला किया। 

उलूपी ने एक संजीवन मणि ब्रभुवाहन को दिया और इसे अर्जुन की छाती से स्पर्श करने को कहा। ब्रभुवाहन ने ऐसा ही किया। आखिरकार अर्जुन जीवित हो उठे। बाद में उलूपी ने बताया कि उन्होंने वसु (एक देवता) के श्राप से अर्जुन को बचाने के लिए यह माया रची थी। उलूपी ने बताया कि महाभारत के युद्ध में छल से भीष्म को मारने के कारण वसु अर्जुन से नाखुश थे और उन्हें श्राप देना चाहते थे।

उलूपी को जब यह मालूम हुआ तो उन्होंने यह बात अपने पिता को बताई। इसके बाद उलूपी की पिता ने वसुओं के पास जाकर ऐसा न करने की प्रार्थना की। तब वसुओं ने कहा अर्जुन का पुत्र बभ्रुवाहन अगर अपने बाणों से पिता का वध कर देगा तो अर्जुन को उनके पाप से छुटकारा मिल जाएगा। उलूपी ने बताया कि इसी वजह से उन्होंने ऐसी माया रची जिससे ब्रभुवाहन और अर्जुन का आमना-सामना हो। यह सुनकर अर्जुन प्रसन्न हुए और वह बभ्रुवाहन को अश्वमेध यज्ञ में आने का निमंत्रण देकर आगे बढ़ गये।

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