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Balaram Jayanti 2020: बलराम जयंती आज, जानिए क्यों कहते हैं इसे 'हलछठ' व्रत भी

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: August 9, 2020 13:17 IST

बलराम जयंती के बाद अष्टमी तिथि को जन्माष्टमी मनाई जाती है। यह त्योहार भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के तौर पर मनाया जाता है। इस बार श्रीकृषण का 5247वां जन्म महोत्सव मनाया जाएगा।

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ठळक मुद्देजन्माष्टमी के पहले मनाई जाती है बलराम जयंती, शेषनाग के अवतार थे बलरामबलराम जयंती को बलदेव छठ, ललई छठ या हलछठ व्रत के नाम से भी जाना जाता है

द्वापरयुग में जन्में श्रीकृष्ण के बड़े भाई और शेषनाग के अवतार बलरामजी की आज जयंती है। बलराम जयंती हर साल भद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाई जाती है। इस बार बलराम जयंती 9 अगस्त को मनाई जा रही है। बलराम जयंती को कई क्षेत्रों में 'हलषष्ठी' और 'हलछठ' के नाम से भी जाना जाता है।

बलराम जयंती का त्योहार महिलाओं के लिए काफी खास माना जाता है। मान्यता है कि जो महिला इस दिन विधि विधान के साथ व्रत करती हैं उन्हें न केवल संतान सुख की प्राप्ति होती है बल्कि उसकी उम्र भी काफी लंबी होती है। कई जगहों पर इसे बलदेव छठ या ललई छठ के नाम से भी जाना जाता है।

Balaram Jayanti 2020: बलराम जयंती पर हलों और बैलों की पूजा

बलराम जयंती के दिन ब्रज और मथुरा के क्षेत्रों में विशेष आयोजन और उत्सव होते हैं। कई घरों और किसानों के यहां इस दिन बैल और हल की पूजा का विशेष महत्व है। ऐसा इसलिए क्योंकि बलराम का मुख्य शस्त्र हल बताया गया है। इस दिन महिलाओं द्वारा केवल तालाब में उगे हुए फलों या चावलों को खाकर व्रत करने का विधान है। दरअसल, मान्यता है कि इस दिन बिना हल चले धरती से पैदा हुई चीजों को खाना चाहिए।

बलराम जयंती के बाद अष्टमी तिथि को जन्माष्टमी मनाई जाती है। यह त्योहार भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के तौर पर मनाया जाता है। इस बार श्रीकृषण का 5247वां जन्म महोत्सव मनाया जाएगा।

Balaram Jayanti 2020: बलराम जयंती से जुड़ी कथा

शेषनाग ही त्रेतायुग में भगवान राम के छोटे भाई लक्ष्मण के रूप में जन्मे थे। ऐसे में शेषनाग ने अगले जन्म में बड़ा भाई बनने की इच्छा जताई। श्रीकृष्ण ने यह सुनकर उन्हें वरदान दिया कि वे द्वापर में बड़े भाई के रूप में जन्म लेंगे।

बलराम अपनी शक्ति के लिए भी जाने जाते हैं। उनके जन्म से जुड़ी एक कथा के अनुसार बलराम मां देवकी के सातवें गर्भ थे। अगर वे जन्म लेते तो कंस उन्हें भी मारने का प्रयास करता। ऐसे में देवकी और वासुदेव ने उन्हें सुरक्षित करने के लिए तप किया। इसके बाद देवकी का यह सातवां संतान वासुदेव की पहली पत्नी के गर्भ में चला गया और बलराम का जन्म सुरक्षित रहा।

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