भारतीय सरकार और फ्रांसीसी कंपनी दसॉल्ट के बीच हुई राफेल विमानों की खरीदारी को लेकर हुई डील, पिछली डील की तुलना में करीब 40 फीसदी ज्यादा रकम में हुई है। भारतीय सरकार ने हालिया सौदा ग्लोबल टेंडर के तहत साल 2016 में 36 फाइटर विमान खरीदने का किया है। जबकि फ्रांसीसी कंपनी दसॉल्ट ने साल 2012 में भारतीय सरकार से 126 मीडियम मल्टी-रोल कॉम्बेट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) खरीदने का ऑफर 40 फीसदी कम पैसों में कर चुकी थी।

इसका खुलासा रक्षा मंत्रालय के दो वरिष्ठ अधिकारियों की फाइल से हुआ है। वे दोनों साल 2012 से ही दसॉल्ट के साथ हुए विमानों के सौदे में प्रमुख भूमिकओं में हैं। इन्होंने ने ही दसॉल्ट के साथ विमानों की कीमतों को लेकर मोल-भाव भी किया है।

वे अभी मंत्रालय से जुड़े हुए हैं। ब‌िजनेस स्टैंडर्ड ने इन्हीं अधिकारियों की कुछ फाइलों के हवाले से एक खबर प्रकाशित की है। इसमें बताया गया है कि दसॉल्ट की तरफ ऑफर की गई पिछली कीमतों की तुलना में भारतीय सरकार ने नये सौदे करीब 40 फीसदी ज्यादा कीमतों में की है।

जानकारी के अनुसार फ्रांसीसी कंपनी ने 126 एयरक्राफ्ट की कीमत करीब 19.5 बिल‌ियन यूरो रखी है। इस लिहाज से दसॉल्ट ने एक एयरक्राफ्ट की कीमत औसतन 155 मिलियन यूरो रखी है। इसमें विमान की कीमत, ट्रांसफर तकनीक, उसका देशीकरणकरना, उसे भारतीय परिस्‍थ‌ियों के अनुरूप यहां के हिसाब से ढालना, उससे संबंधित हथियार, स्पेयर और रखरखाव गारंटी भी शामिल है।

यूपी सरकार के वक्त करीब 1,000 करोड़ प्रति राफेल विमान के सौदे का था ऑफर

दसॉल्ट ने 30 जनवरी 2012 को राफेल विमानों के सौदे के लिए ऑफर दिया था। तब यह सौदा 127,000 करोड़ का था। तब एक राफेल विमान की कीमत करीब 1,000 करोड़ थी। तब एक्सचेंज रेट पर यूरो और रुपये का अनुपात 65:14 थी।

155 मिलियन यूरो के बजाए मोदी सरकार ने 217 मिलियन में खरीदे राफेल

लेकिन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की नरेंद्र मोदी सरकार ने साल 2016 में दसॉल्ट के साथ नई डील की। इस डील के तहत भारत सरकार ने कुल 36 विमानों का सौदा किया। इसके लिए कुल 7.8 बिलियन यूरो का सौदा किया गया। इस लिहाज से प्रति विमान औसतन 217 मिलियन यूरो आते हैं। यह पिछले सौदे की तुलना मे करीब 40 फीसदी ज्यादा हैं।

किस आधार पर राफेल विमान सौदे में 20% तक कम पैसे खर्च होने की बात कर रही हैं रक्षा मंत्री?

ऐसे में यह साफ नहीं है कि ‌किन आंकड़ों के आधार पर वित्त मंत्री अरुण जेटली और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण व वायुसेना के कुछ अधिकारी राफेल विमान डील को लेकर ऐसे दावे कर रहे हैं कि साल 2016 में की गई डील में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के मनमोहन सिंह सरकार के समय की गई डील की तुलना में नौ से 20 फीसदी तक कम है।

यह दावा करने वाले ज्यादातर लोगों का कहना है कि 36 राफेल विमानों के सौदे को लेकर 7.8 बिलियन यूरो के सौदे में स्पेयर, हथ‌ियार और बॉडी-पार्ट्स की गारंटी आदि शामिल है। लेकिन यह तो पहले वाले सौदे में था।

राफेल विमानों के निर्माण में मजदूरी के पैसों तक हुई थी बात

साल 2012 के राफेल विमान डील को लेकर फ्रांस की तरफ हुए ऑफर में एमएमआरसीए के साथ यह अनुबंध हुआ था कि 18 राफेल विमान पूरी तरह से फ्रांस में ही तैयार किए जाएंगे। लेकिन बाकी के 108 विमानों को तैयार करने की जिम्मेदारी हिन्दुस्तान एयरोनॉटिकल लिमिटेड (एचएएल) को होगी। इसके ‌लिए दसॉल्ट, थेल्स एंड स्नेक्मा और कुछ अन्य फ्रांससी वेंडर सामान उपलब्‍ध कराएंगे। जबकि बनाने के दौरान की मजदूरी की पैसा भी राफेल विमानों के सौदे में ही शामिल था।

जबकि साल 2012 के सौदे को और गहराई से देखें तो उसमें 18 विमान फ्रांस से उड़ने की हालत में होने के बाद भारत लाने थे। ऐसे इनकी कीमत और कम हो जाती है। जबकि हालिया सौदे सभी विमान यही बनाए जाने हैं।

विमानों के दूसरे देश में बनने और भारत में बनने का ये होता है अंतर

चूंकि साल 2012 का राफेल विमान सौदा पूरा ही नहीं हो पाया, इसलिए राफेल के फ्रांस में बनने और भारत में बनने में आने वाली कीमतों के अंतर का कोई मौजूदा आंकड़ा नहीं है। लेकिन अगर एचएएल द्वारा ही विमानों के बनाने के खर्चे का आकलन किया जाए तो सुखोई 30एमकेआई एक उदाहरण हो सकता है। यह विमान रूस में करीब 300 करोड़ प्रति विमान बने थे। लेकिन बाद में जब इसी वहां से सामान लाकर यहां एचएएल ने बनाया तो 450 करोड़ प्रति विमान कीमत आई। यह करीब 50 फीसदी ज्यादा थी।

कब और क्यों पीएम नरेंद्र मोदी ने किया नया सौदा

यूपीए की मनमोहन सरकार के दौरान फ्रांसीसी कंपनी के साथ हुई 126 विमानों की 19.5 बिलियन यूरो वाली डील 10 अप्रैल 2015 तक वैध थी। लेकिन पीएम नरेंद्र मोदी ने फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांसवा होलांद से सरकार से सरकार के बीच राफेल डील करने की निवेदन किया। पिछली डील दसॉल्ट से भारतीय सरकार के बीच थी। लेकिन पीएम मोदी फ्रांस के राष्ट्रपति से पुरानी डील को रद्द कर सरकार से सरकार के बीच एक नई डील कर 36 पूरी तरह से तैयार राफेल विमान देने की विनती की।

लेकिन तब दसॉल्ट के उच्चाधिकारियों ने यह कहकर ऐसा करने से मना कर दिया कि उन्होंने डील के बाद से पैसों में कोई बदलाव नहीं किए हैं। ऐसे में वह डील से बाहर जाकर 18 के बजाए 36 पूरी तरह तैयार एयरक्राफ्ट नहीं दे पाएंगे।

इसके बाद मोदी सरकार और कंपनी के बीच कुछ और बातें बिगड़ीं। इसके बाद 23 सितंबर 2016 को मोदी सरकार ने फ्रांस की सरकार से "सरकार से सरकार" की डील की। इसके तहत 36 विमानों का सौदा किया गया। जबकि अब भारतीय वायुसेना एक 110 मीडियम फाइटर एयरक्राफ्ट लेने के लिए एक नई डील की तैयारी में है। लेकिन इसमें भी कमोबेश उन्हीं वेंडर के साथ दोबारा डील होने के आसार हैं।

राहुल गांधी ने संसद में बताई थी कीमत, 1600 करोड़ प्रति विमान

उल्लेखनीय है कि अंतिम मॉनसून संसद सत्र में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग से पहले अपने अ‌भिभाषण में नरेंद्र मोदी सरकार पर राफेल विमान डील में भारी भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था जिस विमान की खरीदारी यूपीए सरकार के दौरान 500 करोड़ में की जाने वाली थी, मोदी सरकार ने उसे 1600 करोड़ में खरीद लिया। हालांकि बाद में राहुल गांधी ने अपनी रैलियों में यूपीए सरकार के दौरान राफेल विमान की कीमतों को 500 से 1000 करोड़ रुपये के बीच बताते रहे हैं।

English summary :
Rafale deal big revelation: Deal between the Indian government and the French aircraft manufacturer company Dassault Aviation on purchasing of Rafale aircraft has been done at around 40% more price than the previous deal. The Indian government has bought 36 fighter aircraft in the year 2016 under the deal Global Tender. While French aircraft manufacturer Dassault had offered 40% less money to buy 126 Medium Multi-Role Combat Aircraft (MMRCA) from the Indian government in 2012.


Web Title: Rafale Deal Controversay: Modi govt pays 40% more than Dassault's earlier offer on Rafale aircraft cost 
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