Lok Sabha Election 2019: Kannauj lok sabha seat history, political analysis samajwadi party BJP | कन्नौज लोकसभा सीट: इत्र नगरी में समाजवाद का लिटमस टेस्ट, जानिए इस सीट पर किसका पलड़ा भारी
Lok Sabha Election 2019: Kannauj lok sabha seat history, political analysis samajwadi party BJP

Highlights 2012 में अखिलेश को उत्तर प्रदेश का ताज मिला तो उनकी पत्नी डिंपल को कन्नौज की सीटभाजपा ने इस बार भी अपने 2014 के प्रत्याशी रहे सुब्रत पाठक पर भरोसा जताया है।

कन्नौज का इत्र अपनी खुशबू के लिए देश-दुनिया में विख्यात है और बात राजनीतिक हो तो देश के सियासी मानचित्र में यहां की माटी दशकों से समाजवादियों को अपनी खुशबू से सराबोर करती आयी है । प्रयोगधर्मिता के लिहाज से समाजवाद के पैरोकारों ने कन्नौज में 50 साल के दौरान तमाम 'प्रयोग' कर डाले और कामयाबी भी हासिल की। 

जानकारों की मानें तो समाजवादी पार्टी की कमान उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के हाथ में आने के बाद ना सिर्फ समाजवाद को नयी परिभाषा मिली बल्कि उसकी चाल, चरित्र और चिन्तन में भी बदलाव आया और अब इस लोकसभा चुनाव में 'अखिलेश के 'नव समाजवाद' का 'लिटमस टेस्ट' होगा।

कन्नौज से हुई अखिलेश यादव की राजनीतिक जीवन की शुरुआत 

कन्नौज के राजनीतिक क्रियाकलाप, चाहे लोकसभा चुनाव हों या विधानसभा के चुनाव या फिर निकाय के ही चुनाव क्यों ना हों, पर चार दशक से अधिक समय से काम कर रहे प्रभाकर पाठक ने 'पीटीआई-भाषा' से बातचीत में कहा, ''अखिलेश ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत कन्नौज से ही की थी और बीते दो दशक से वह निरंतर कन्नौज की नुमाइंदगी किसी ना किसी रूप में करते रहे।'' 

पाठक ने कहा, ''इतिहास देखें तो भारत के आजाद होने के बाद पूरे देश की सियासत कांग्रेस के हाथ में रही लेकिन कन्नौज अपने आप में एक अपवाद था। उसने बहुत जल्द ही समाजवाद को आत्मसात कर लिया और यही कारण रहा कि समाजवाद के प्रखर पुरूष डा. राम मनोहर लोहिया ने समाजवाद के बीज कन्नौज में बो दिये। खुद उन्होंने 1963 में लोकसभा चुनाव जीता।
 
जानिए कन्नौज लोकसभा सीट का इतिहास

उस समय कन्नौज फर्रूखाबाद लोकसभा सीट का हिस्सा हुआ करता था और 1967 में जब पहली बार कन्नौज लोकसभा सीट बनी तो लोहिया ने आम चुनाव में कन्नौज से ही दोबारा चुनाव जीता और उस दौर में कांग्रेस को तगड़ा झटका दिया।'' कांग्रेस की स्थानीय नेता उषा दुबे ने फोन पर 'पीटीआई-भाषा' से कहा, ''लोहिया ने कन्नौज की धरती पर समाजवाद का जो बीज बोया, वह पल्लवित होकर वृक्ष बना और समाजवादियों के लिए बरसों बरस फलदायी भी रहा।'' 

उन्होंने कहा, ''बात कांग्रेस की करें तो 1971 में एस एन मिश्रा और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने 1984 में यहां से कांग्रेस प्रत्याशी के तौर पर विजय पताका फहरायी और शीला तो केन्द्र में मंत्री भी बनीं।'' पाठक के अनुसार, मिश्रा और शीला के दौर के बाद कांग्रेस के लिए कन्नौज की धरा 'सियासी बंजर' साबित हुई और अब तो कांग्रेस यहां से प्रत्याशी उतारने में भी हिचकती है। हालांकि, भाजपा किसान मोर्चा के नेता सुनील कुमार शास्त्री का दावा है कि जिस तरह समाजवादियों ने यहां जातिवाद का जहर बोया है, उसका खामियाजा इस बार उन्हें चुनाव में भुगतना होगा।

बीजेपी ने सुब्रत पाठक पर दोबारा जताया भरोसा 

भाजपा ने इस बार भी अपने 2014 के प्रत्याशी रहे सुब्रत पाठक पर भरोसा जताया है। पाठक पिछली बार अखिलेश की पत्नी सपा प्रत्याशी डिम्पल यादव से 20 हजार से भी कम वोटों से हारे थे, जो इस बार बदली हुई परिस्थितियों में उनके 'असेट’ (पूंजी) के रूप में देखा जा रहा है। शास्त्री ने बताया कि ऐसा नहीं है कि कन्नौज में कमल नहीं खिला। चंद्रभूषण सिंह ने 1996 में भाजपा के टिकट पर यहां से चुनाव जीता था। उससे पहले संघ की पृष्ठभूमि से आये राम प्रकाश त्रिपाठी जनता पार्टी के टिकट पर 1977 में लोकसभा सांसद बने। 

पांच विधानसबा सीटों में से चार पर बीजेपी का कब्जा

वहीं 2017 के विधानसभा चुनाव में संसदीय क्षेत्र की पांच विधानसभा सीटों में से चार पर भाजपा ने कब्जा किया। पाठक ने बताया कि 1998 के चुनाव में कन्नौज पूरी तरह समाजवाद की खुश्बू से तर-ब-तर हो गया और मुलायम सिंह यादव का प्रदीप यादव को समाजवाद का चेहरा बनाकर पेश करना सही साबित हुआ। इसके बाद 1999 में एक रणनीति के तहत मुलायम खुद कन्नौज से प्रत्याशी बने और फिर उत्तराधिकार के रूप में यह सीट अपने बेटे अखिलेश को दे दी। 

डिंपल यादव को कन्नौज की सीट 

अपने राजनीतिक सफर की शुरूआत पर निकले अखिलेश को कन्नौज से बेहतर और कोई विकल्प नहीं मिल सकता था।  अखिलेश ने 2012 में उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने तक लगातार तीन बार इस संसदीय सीट का प्रतिनिधित्व किया। 2012 में अखिलेश को उत्तर प्रदेश का ताज मिला तो उनकी पत्नी डिंपल को कन्नौज की सीट। अखिलेश ने यहां से डिंपल को सांसद बनवाकर इस सीट पर समाजवाद की नयी इबारत लिख दी। कांग्रेस नेता उषा दुबे का कहना है कि 2014 के बाद कन्नौज की राजनीति में बड़े बदलाव आए हैं और अब उनके लिए जीत की राह आसान नहीं होगी।

क्या कहते हैं जातिगत समीकरण

वहीं, कन्नौज में सपा का झंडा बुलंद करते रहे पार्टी के राष्ट्रीय सचिव प्रजापति अनिल आर्य दावा करते हैं कि इस क्षेत्र में इतने विकास कार्य हुए हैं कि जनता किसी और को वोट देने के बारे में नहीं सोचेगी। पाठक ने कन्नौज का जातिगत मानचित्र खींचते हुए बताया कि यहां लगभग 35 फीसदी मुस्लिम, 16 फीसदी यादव और 15 फीसदी ब्राहमण तथा 10 फीसदी अन्य पिछड़े वर्ग के मतदाताओं के अलावा सात फीसदी क्षत्रीय वोटर हैं। ''बिहार की तर्ज पर यहां पर भी 'माई' (एम यानी मुस्लिम और वाई यानी यादव) फार्मूला चलता रहा है। लेकिन इनके बावजूद इस बार परिणाम चौंकाने वाले भी हो सकते हैं। 


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