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आर्थिक समीक्षाः सालाना 55-60 लाख रोजगार सृजन की आवश्यकता, 10 प्रमुख बातें

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: July 4, 2019 20:50 IST

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की ओर से बृहस्पतिवार को पेश आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि भारत को अगले एक दशक तक सालाना 55-60 लाख रोजगार के सृजन की आवश्यकता है। इसमें श्रम बल की भागीदारी का अनुपात 60 प्रतिशत होना चाहिए।

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ठळक मुद्देश्रम बल की भागीदारी के अनुपात से तात्पर्य श्रम योग्य (16-64वर्ष की) आबादी के रोजगार में लगे होने या रोजगार की तलाश में होने से है।रोजगार के मोर्चे पर भी सरकार को पिछले एक साल में कामयाबी मिली है। EPFO के मुताबिक फॉर्मल सेक्टर में रोजगार के अवसर बढ़े हैं। स्वच्छ भारत मिशन के तहत देश के करीब 93.1 फीसदी घरों में शौचालय की सुविधा करा दी गई है।

श्रम कानून में सुधारों से रोजगार सृजन में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिल सकती है, जैसा कि अन्य राज्यों की तुलना में राजस्थान में देखने को मिला। वित्त वर्ष 2018-19 की आर्थिक समीक्षा में यह कहा गया है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की ओर से बृहस्पतिवार को पेश आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि भारत को अगले एक दशक तक सालाना 55-60 लाख रोजगार के सृजन की आवश्यकता है। इसमें श्रम बल की भागीदारी का अनुपात 60 प्रतिशत होना चाहिए।

श्रम बल की भागीदारी के अनुपात से तात्पर्य श्रम योग्य (16-64वर्ष की) आबादी के रोजगार में लगे होने या रोजगार की तलाश में होने से है। सर्वेक्षण में कहा गया है, ''श्रम कानून संबंधी पाबंदियों को विनियमित करने से बड़ी संख्‍या में और ज्यादा रोजगारों का सृजन हो सकता है, जैसा कि अन्‍य राज्‍यों से तुलना करने पर राजस्‍थान में हाल ही में किए गए बदलावों के परिणामस्‍वरूप देखने को मिला है।''

आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि वर्ष 2007 से वर्ष 2014 तक राज्‍यों द्वारा किसी भी प्रमुख श्रम सुधार की दिशा में कदम नहीं उठाया गया है। वर्ष 2014 में राजस्‍थान पहला ऐसा राज्‍य था जिसने प्रमुख अधिनियमों में श्रम सुधारों को लागू किया। इसके बाद अनेक राज्‍यों ने राजस्‍थान का अनुसरण किया।

समीक्षा में कहा गया है, ''विनिर्माण क्षेत्र की कंपनियों के श्रम, पूंजी एवं उत्‍पादकता संबंधी संकेतकों के बीच तुलना करने पर यह स्‍पष्‍ट हो जाता है कि लचीले श्रम कानून औद्योगिक विकास एवं रोजगार सृजन के लिए और अधिक अनुकूल माहौल बनाते हैं।

जो राज्‍य अपने श्रम कानूनों के मामले में अड़ियल रुख अपना रहे हैं वे सभी मामलों में नुकसान उठा रहे हैं और वे पर्याप्‍त रोजगार सृजित करने में असमर्थ हैं तथा वे अपने यहां पर्याप्‍त पूंजी आकर्षित नहीं कर सकते हैं।''

उसमें कहा गया है कि श्रम बहुल उद्योगों और ज्‍यादा लचीले बाजारों की ओर उन्‍मुख हो चुके राज्‍यों के संयंत्र उन राज्‍यों के समकक्ष संयंत्रों की तुलना में औसतन 25.4 प्रतिशत ज्‍यादा उत्‍पादक हैं जो अब भी जटिल श्रम कानून को अपना रहे हैं। 

आर्थिक सर्वे की 10 बड़ी बातें 

1. NPAs के मामलों में सरकार को बड़ी कामयाबी मिली है, मार्च 2018 में NPA 11.5 फीसदी था, जो दिसंबर 2018 में घटकर 10.1 फीसदी हो गया।

2. फिक्स्ड इन्वेस्टमेंट में बढ़ोतरी हुई है, 2016-17 में जहां फिक्स्ड इन्वेस्टमेंट 8.3 फीसदी था, जो 2018-19 में बढ़कर 10 फीसदी पहुंच गई।

3. रोजगार के मोर्चे पर भी सरकार को पिछले एक साल में कामयाबी मिली है। EPFO के मुताबिक फॉर्मल सेक्टर में रोजगार के अवसर बढ़े हैं। फरवरी 2018 में 4.87 लाख लोगों को रोजगार मिला था, जो मार्च 2019 में बढ़कर 8.15 लाख तक पहुंच गया।

5. फिलहाल चालू खाता घाटा सकल घरेलू उत्पाद का 2.1 प्रतिशत है, जो कि राहत की बात है।

6. राजकोषीय घाटा जो साल 2017-18 में 3.5 प्रतिशत था, वो घटकर साल 2018-19 में 3.4 प्रतिशत रह गया।

7. स्वच्छ भारत मिशन के तहत देश के करीब 93.1 फीसदी घरों में शौचालय की सुविधा करा दी गई है।

8. मोदी सरकार में हर रोज रोड बनाने का दायरा बढ़ा है, जहां साल 2014-15 में 12 किलोमीटर हर रोज सड़क निर्माण होता था, जो 2018-19 में बढ़कर हर रोज 30 किलोमीटर हो गया है।

9. स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च जो साल 2014-15 में 1.2 प्रतिशत था, उसे 2018-19 में बढ़ाकर 1.5 प्रतिशत कर दिया गया है।

10. वहीं शिक्षा पर सरकारी खर्च जो साल 2014-15 में 2.8 प्रतिशत था, वो 2018-19 में बढ़कर 3 प्रतिशत हो गया।

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