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BLOG: आम चुनाव की सियासत शुरू, नजरिया उर्दू प्रेस का

By लोकमत समाचार हिंदी ब्यूरो | Updated: June 29, 2018 05:32 IST

 कश्मीर में राज्यपाल शासन लग गया है।  ‘रोजनामा राष्ट्रीय सहारा’ नई दिल्ली ने लिखा है, अब ये बात बिल्कुल स्पष्ट हो गई है कि जम्मू-कश्मीर की गठबंधन सरकार से भाजपा का समर्थन वापस लेने का फैसला दरअसल 2019 के आम चुनाव के मद्देनजर किया गया था। 

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नई दिल्ली. 29 जून (राजश्री यादव): उर्दू मीडिया का मानना है कि साढ़े तीन साल पहले जम्मू-कश्मीर में सांङो की जो हांडी चढ़ी थी वो फूट गई है।  भाजपा ने जम्मू-कश्मीर हुकूमत से हिमायत वापस लेकर आगामी लोकसभा चुनाव की सियासत शुरू कर दी है।  कश्मीर में राज्यपाल शासन लग गया है।  ‘रोजनामा राष्ट्रीय सहारा’ नई दिल्ली ने लिखा है, अब ये बात बिल्कुल स्पष्ट हो गई है कि जम्मू-कश्मीर की गठबंधन सरकार से भाजपा का समर्थन वापस लेने का फैसला दरअसल 2019 के आम चुनाव के मद्देनजर किया गया था। 

 जिस तरह से भाजपा ये इल्जाम लगा रही है कि राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती जम्मू और लद्दाख इलाके से सौतेला व्यवहार कर रही थीं, इसका महबूबा मुफ्ती ने जोरदार खंडन किया है।  इस सिलसिले में महबूबा का कहना है कि अगर कोई मतभेद था तो इस सिलसिले में कभी पहले आवाज क्यों नहीं उठाई गई।  उन्होंने ये बात भी दो-टूक शब्दों  में कही है कि हर फैसले में भाजपा की रजामंदी थी।  उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 को बरकरार रखने, पाकिस्तान और हुर्रियत से बातचीत करने, पत्थरबाजों के खिलाफ केस वापस लेने का फैसला एकतरफा नहीं था बल्कि उसमें भाजपा की सहमति शामिल थी।  

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दरअसल, इस वक्त भाजपा को अपने मंत्रियों की कार्यप्रणाली का जायजा लेना चाहिए, जो जम्मू की तरक्की के जिम्मेदार थे।  अगर जम्मू में विकास के कोई काम नहीं हुए तो इसके लिए उसे अपने मंत्रियों का कसूर समझना चाहिए था।  महबूबा ने अपनी सरकार में मंत्री रहे वरिष्ठ भाजपा नेता लालसिंह को निशाना बनाया।  जिस तरह से ‘राइजिंग कश्मीर’ के संपादक शुजात बुखारी के कत्ल के बाद भाजपा नेता ने कश्मीर के पत्रकारों को धमकाया।  इस सिलसिले में महबूबा ने पूछा कि भाजपा उनके खिलाफ क्या कार्रवाई करने जा रही 

भाजपा और पीडीपी के बीच मतभेद उसी दिन से पैदा होने शुरू हो गए थे जब भाजपा के एक मंत्री ने कठुआ में एक मासूम बच्ची की आबरूरेजी के बाद मुलजिमों का समर्थन करना शुरू कर दिया था।  लेकिन महबूबा मुफ्ती के सख्त रवैय्या अपनाने के बाद भाजपा के दो मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा था।  अब जिस तरह से शुजात बुखारी के कत्ल के मामले में भाजपा सांसद ने अपने नजरिए का इजहार किया है, उससे ये स्पष्ट होता है कि भाजपा की क्या सोच है। हैदराबाद से प्रकाशित ‘दि एतमाद उर्दू डेली’ ने लिखा है, मोदी हुकूमत जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव करीब आते जा रहे हैं, अपनी गलतियों और खामियों पर पर्दा डालकर अवाम के सामने एक कामयाब तस्वीर के साथ आने की पूरी कोशिश कर रही है।  आर्थिक  मोर्चे पर उसने जो संगीन गलतियां की हैं, खास तौर से नोटबंदी जैसे फैसलों के कारण, उसकी भरपाई मुमकिन नहीं है। 

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 इसलिए ओहदेदारों पर दबाव डाला जा रहा है कि वो मुल्क की आर्थिक हालत की एक अच्छी तस्वीर पेश करें।  ये दबाव कितना संगीन है इसका अंदाजा मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन के इस्तीफे से लगाया जा सकता है।  जिन्होंने अपनी मियाद मुकम्मल होने से पहले ही पारिवारिक वजह बताकर पद से इस्तीफा देना बेहतर समझा।  अगर सुब्रमण्यन वाकई पारिवारिक कारणों से अमेरिका जा रहे हैं तो उन्होंने वहां तालीमी मैदान में अपना करियर बरकरार रखने की बात     क्यों की?

सऊदी अरब द्वारा अपने कानून में ऐतिहासिक सुधार करते हुए महिलाओं के वाहन चलाने पर लगे प्रतिबंध को समाप्त कर दिए जाने पर खुशी का इजहार करते हुए ‘रोजनामा औरंगाबाद टाइम्स’ औरंगाबाद ने लिखा है, शहजादा मोहम्मद बिन सुलेमान की जानिब से तैयार किए विजन 2030 से पहले कई तब्दीलियां आएंगी और पूरी उम्मीद है कि भविष्य में सऊदी महिलाओं को महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने का अवसर मिलेगा।  सऊदी अरब  में 24 जून 2018 को लाई गई तब्दीली को अब्राहम लिंकन द्वारा 1863 में लाई गई तब्दीली से ताबीर किया जा रहा है, जिसने अमेरिका की तारीख में बड़ी तब्दीली लाई थी।  

इसमें कोई संदेह नहीं कि सऊदी अरब के लिए आने वाले दिनों में महिलाओं की शक्ल में एक बड़ी वर्क फोर्स तैयार हो जाएगी।  सऊदी अरब की महिलाओं ने वैसे भी इस दिन को ऐतिहासिक करार दिया है।  क्योंकि अब तक इन महिलाओं पर लगाई गई पाबंदियों को उनके साथ सौतेले व्यवहार के रूप में देखा जाता था।  बहरहाल, इस तब्दीली के जरिए एक रूढ़िवादी देश में आधुनिकता लाने का सेहरा शहजादा मोहम्मद बिन सुलेमान को जाता है। और अंत में, तुम्हारी तहजीब अपने खंजर से आप ही खुदकुशी करेगी/ जो शाखे  नाजुक पर आशियाना बनेगा नापायेदार होगा।       

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