होमगार्ड जवान दिनेश गौडे की मौत, वन विभाग रिपोर्ट बकवास, फॉरेंसिक मेडिसिन विभाग के प्रभारी घोड़िरेकर ने कहा-शरीर पर चोट के निशान और सींग की चोट
By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: May 11, 2026 12:11 IST2026-05-11T12:09:14+5:302026-05-11T12:11:44+5:30
वन विभाग के पास चिकित्सा-कानूनी विशेषज्ञों से परामर्श किए बिना पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर निष्कर्ष निकालने का कोई अधिकार नहीं है।

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पणजी: गोवा में फॉरेंसिक विशेषज्ञों ने एक होमगार्ड जवान की मौत के मामले में वन विभाग के दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। विशेषज्ञों ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर वन विभाग द्वारा की गई व्याख्या को "पूरी तरह गलत" और "अवैज्ञानिक" करार दिया है। दक्षिण गोवा जिला अस्पताल में फॉरेंसिक मेडिसिन विभाग के प्रभारी डॉ. मधु एस. जी. घोड़िरेकर ने रविवार शाम जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि वन विभाग के पास चिकित्सा-कानूनी विशेषज्ञों से परामर्श किए बिना पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर निष्कर्ष निकालने का कोई अधिकार नहीं है।
फॉरेंसिक विभाग ने स्पष्ट किया कि शरीर पर चोट के निशान और आंतरिक क्षति "सींग की चोट" जैसे थे, जो कि "गौर (भारतीय बायसन)" के हो सकते हैं, लेकिन वन विभाग के अधिकारी स्वतंत्र रूप से रिपोर्ट का निष्कर्ष निकालने के लिए अधिकृत नहीं थे। बेथोडा गांव के निवासी होमगार्ड जवान दिनेश गौडे (48) का शव सात मई को पोंडा के एक वन क्षेत्र में मिला था।
शुरुआती तौर पर इसे जंगली भैंसे का हमला माना गया था। हालांकि, बाद में चोटों की प्रकृति देखते हुए वन विभाग ने दक्षिण गोवा के पुलिस अधीक्षक (एसपी) को पत्र लिखकर मामले की जांच करने का आग्रह किया था। वन विभाग ने इस बात की ओर इशारा किया कि घटनास्थल पर गौर (भारतीय बायसन) की मौजूदगी या आवाजाही के कोई संकेत जैसे खुरों (पैरों) के निशान, गोबर या बाल आदि नहीं मिले हैं।
विभाग ने यह भी गौर किया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दर्ज चोटों का स्वरूप आमतौर पर जंगली भैंसे के हमले में लगने वाली चोटों की प्रकृति से मेल नहीं खाता है। वन अधिकारियों के अनुसार, शरीर पर किसी कुंद वस्तु या सतह से लगी चोट और शरीर के कई हिस्सों में गंभीर चोट के निशानों का न होना, जंगली भैंसे के हमले की बात पर संदेह पैदा करता है।
इस मामले पर वन मंत्री विश्वजीत राणे ने रविवार को पत्रकारों से कहा कि फिलहाल किसी भी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर, फॉरेंसिक विभाग ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट और आधिकारिक पत्राचार के सोशल मीडिया पर प्रसारित होने पर गहरी चिंता व्यक्त की है। विभाग ने इसे "आपराधिक जांच प्रक्रिया का गंभीर उल्लंघन" बताया है।
विज्ञप्ति में कहा गया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट पुलिस के अलावा किसी को जारी नहीं की गई थी और जांच अधिकारी ने भी इसे केवल वन विभाग के साथ साझा किया था। फॉरेंसिक विभाग ने मांग की है कि पुलिस जांच जारी रहने के दौरान इन गोपनीय दस्तावेजों के चुनिंदा तरीके से लीक होने के मामले की जांच की जाए।