US Iran Israel War: जंग जाहिर है कि एकतरफा नहीं हो सकती. इसलिए मध्य पूर्व में भड़क रही जंग के लिए भी किसी एक पक्ष को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन शांति वार्ताओं के बीच ईरान पर हमले की शुरुआत निश्चय ही अमेरिका और इजराइल ने की. कभी जनसंहारक हथियारों का हव्वा खड़ा कर इराक पर हमला करनेवाले अमेरिका के अब इस तर्क पर विश्वास कर पाना आसान नहीं कि ईरान उस पर हमला करने ही वाला था. राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को मौत के घाट उतार कर इराक को लगभग बर्बाद कर दिया गया, लेकिन जनसंहारक हथियार आज तक नहीं मिले.
28 फरवरी को पहले ही हमले में सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई समेत 40 प्रमुख लोगों को मार दिया गया, लेकिन ईरान के उन्नत परमाणु कार्यक्रम के प्रमाण अभी तक नहीं मिले हैं. जाहिर है, राजनीति की तरह कूटनीति में भी माहौल बनाने के लिए बहुत कुछ कह दिया जाता है, जिसका सच से कोई वास्ता नहीं होता.
इजराइल के खुफिया सूचना तंत्र की बदौलत खामेनेई समेत शीर्ष नेतृत्व के 40 सदस्यों को पहले ही दिन मार गिराए जाने के बाद अमेरिका को लगा होगा कि ईरान में कठपुतली सरकार बनवाना बस एक-दो दिन का काम है, लेकिन 11 दिन से जारी जंग और विश्व पर उसके व्यापक असर से साफ है कि वह आकलन गलत था.
आर्थिक और सैन्य महाशक्ति अमेरिका से जीत की गलतफहमी ईरान को नहीं होगी, लेकिन उसकी संप्रभुता एवं अस्तित्व रक्षा की जंग लंबी चल सकती है. कम आबादी के बावजूद इजराइल की उन्नत रक्षा तकनीक और सामर्थ्य किसी से छिपी नहीं है, लेकिन दोनों मिल कर भी ईरान पर काबू पाना तो दूर, उसके जवाबी हमलों से बच तक नहीं पा रहे.
18-20 लाख रुपए की लागतवाले ईरानी ड्रोन को मार गिराने के लिए अमेरिका को 35-37 करोड़ रु. की मिसाइल चलानी पड़ रही है. अमेरिका का औसत युद्ध खर्च आठ हजार करोड़ रुपए प्रतिदिन आ रहा है. युद्ध के अन्य असर अलग हैं. जंग जितनी लंबी चलेगी, आर्थिक रूप से भी अमेरिका को भारी पड़ेगी.
कभी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प कहते हैं कि जंग चार-पांच हफ्ते चल सकती है तो कभी जल्द समाप्त होने की भविष्यवाणी कर कच्चे तेल की कीमतों में लगी आग बुझाने की कोशिश करते हैं. उधर ईरान छह महीने की तैयारी की बात कह रहा है. हालांकि ऐसी जंग के बीच मृतकों की सही संख्या बता पाना मुश्किल होता है.
फिर भी मान लें कि ईरानी बहुत ज्यादा संख्या में मारे जा रहे हैं, तो भी नहीं भूलना चाहिए कि अपने सैनिकों की सुरक्षा को लेकर अमेरिका ज्यादा संवेदनशील माना जाता है. जंग जारी रही और जमीन पर भी उतरी तो ताबूत में स्वदेश लौटनेवाले अमेरिकी सैनिकों की संख्या बढ़ेगी ही.
इजराइल की जंग में अवांछित अग्रणी भूमिका के विरोध में जारी प्रदर्शन अपने सैनिकों की मौत से न सिर्फ और भड़केंगे, बल्कि ट्रम्प को उसकी भारी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ेगी. ज्यादा पुरानी घटना नहीं है, जब ट्रम्प ने फोर्स वन भेज कर वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को सपत्नीक उठवा लिया और खुद को वहां का कार्यवाहक राष्ट्रपति भी सोशल मीडिया पर लिखना शुरू कर दिया.
खामेनेई के खात्मे के बाद उन्होंने यह कहने में भी संकोच नहीं किया कि उत्तराधिकारी चुनने का अधिकार उन्हें मिलना चाहिए. किसी दूसरे देश का नेतृत्व खुद चुनने की सोच तानाशाही का मुंह बोलता प्रमाण ही है, लेकिन विश्व समुदाय मौन रहा. फिर भी जो हुआ, वह सबके सामने है.
ट्रम्प की धमकियों के बावजूद ईरान ने खामेनेई के बेटे मोजतबा को ही अपना नया सर्वोच्च नेता चुना और मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले भी बदस्तूर जारी हैं. बेशक इससे मध्य पूर्व के इस्लामी देश ईरान के विरुद्ध हो जाएंगे, लेकिन वे तो पहले से ही अमेरिका का सैन्य अड्डा बने हुए हैं.
वैसे खेद जताते हुए भी ईरान ने स्पष्ट कर दिया कि अगर वे उस पर हमलों के लिए लांचिंग पैड बनेंगे तो जवाबी हमले जारी रह सकते हैं. जाहिर है, इन देशों में अमेरिका ने सैन्य ठिकाने बनाए ही लांचिंग पैड की तरह इस्तेमाल के लिए हैं. हां, अब इन देशों की सुरक्षा का दबाव अमेरिका पर अवश्य बढ़ रहा है.
चीन और रूस द्वारा ईरान की मदद के अमेरिकी दावों का सच पता कर पाना आसान नहीं, लेकिन अगर अप्रत्यक्ष रूप से भी ऐसा हुआ तो जंग लंबी खिंचना तय है. ईरान ने जिस तरह चीन और रूस के अलावा शेष विश्व के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग बंद कर दिया है, उसके दो संदेश साफ हैं: एक, चीन और रूस के प्रति उसका मित्रताभाव.
जाहिर है, ऐसी रियायत न मिलना भारत की कूटनीति पर सवाल भी खड़े करता है. दूसरा, इससे अन्य देशों की ऊर्जा चुनौतियां बढ़ेंगी, जो अमेरिका पर जंग समाप्ति का दबाव बना सकते हैं. 11 दिन की जंग में ही कई देशों में पेट्रोल-डीजल और गैस की किल्लत तथा आसमान छूती कीमतें भविष्य के गंभीर संकट का संकेत हैं.
विश्व भर की ऊर्जा जरूरतों की लगभग एक-चौथाई आपूर्ति होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग से ही होती है, जिस पर ईरान का नियंत्रण है. खुद कभी भी किसी भी देश पर हमला करना अपना अधिकार समझनेवाले ट्रम्प अंतर्राष्ट्रीय जल मार्ग पर किसी का अधिकार न होने का तर्क देते हुए ईरान को और भी बीस गुना ज्यादा ताकत से हमले की धमकियां तो दे रहे हैं, पर उनका असर होने की उम्मीद नहीं दिखती.
इराक और अफगानिस्तान समेत कई देशों में अमेरिकी सैन्य आक्रमण में भागीदार बननेवाले नाटो सदस्य देश इस बार ईरान पर हमले में साथ नहीं हैं. कुछ देशों ने तो अमेरिका को अपने सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल तक नहीं करने दिया. इसे विश्व व्यवस्था में अमेरिका के अलग-थलग पड़ने का संकेत भी माना जा रहा है.
बेशक अहमन्यता और साम्राज्यवाद अमेरिकी चरित्र का हिस्सा रहा है, लेकिन ट्रम्प जिस तरह दुनिया को खुलेआम धमका रहे हैं, उसे दरअसल वैश्विक व्यवस्था के लिए ही खतरे के संकेत के रूप में देखा जा रहा है. इसलिए यह युद्ध चाहे-अनचाहे नई वैश्विक व्यवस्था की भूमिका भी लिखने जा रहा है.
शायद यही कारण है कि भारत समेत कुछ देश जल्दबाजी में अपने पत्ते नहीं खोलना चाहते. विश्व के सबसे पुराने लोकतंत्र तथा आर्थिक एवं सैन्य महाशक्ति अमेरिका की हैसियत डोनाल्ड ट्रम्प के दूसरे राष्ट्रपति काल के बाद भी बरकरार रह पाएगी-इस पर अब संदेह और सवाल गहराने लगे हैं.