जिसकी लाठी, उसकी भैंस वाला युग फिर आ रहा है ?
By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: January 23, 2026 07:11 IST2026-01-23T07:11:10+5:302026-01-23T07:11:13+5:30
साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाएं फिर से उभर रही हैं.

जिसकी लाठी, उसकी भैंस वाला युग फिर आ रहा है ?
सदियों पहले दुनिया में जब राजवंशों का जमाना था, ज्यादातर राजा इस कोशिश में लगे रहते थे कि वे दूसरे राजा के आधिपत्य वाले इलाकों पर कब्जा कर लें और अपने साम्राज्य का विस्तार करते रहें. भारत के इतिहास में इस तरह के उदाहरण बहुतायत से भरे पड़े हैं. दुनिया के दूसरे देशों के इतिहास में भी ऐसे ढेर सारे उदाहरण मौजूद हैं. यदि गांव के स्तर पर देखें तो एक जमींदार होता था जिसकी बातों का बड़ा वजन होता था.
वह जो कह दे, वही कानून. तो ऐसे ही संदर्भों की व्याख्या के लिए एक कहावत बन गई कि जिसकी लाठी, उसकी भैंस! यानी जिसके पास ताकत है, संपत्ति उसी की है. एक हिटलर को लगा कि दुनिया को उसके हिसाब से चलना चाहिए तो मामला विश्व युद्ध तक जा पहुंचा. उस समय अमेरिका ने जापान पर एटम बम फोड़ कर जंग को खत्म कर दिया. अब अमेरिका को लगने लगा कि दुनिया को उसके हिसाब से चलना चाहिए तो सोवियत संघ मैदान में उतर आया कि नहीं, दुनिया को हमारे हिसाब से चलना चाहिए! कुछ गुटनिरपेक्ष देशों ने रास्ता निकाला कि हम अलग चलेंगे.
अब मैदान में अमेरिका के साथ चीन भी है जो चाहता है कि दुनिया उसके हिसाब से चले. इन सबके बीच जो अंतरराष्ट्रीय कानून बने थे, उनकी धज्जियां उड़ रही हैं. यूनाइटेड नेशन पर पहले आरोप लगता था कि वह अमेरिका के हाथ की कठपुतली है लेकिन अब तो कठपुतली होने का आरोप भी चस्पा नहीं किया जा सकता क्योंकि हकीकत में उसके नाखून टूट चुके हैं.
आप सोचिए कि दुनिया भर में न जाने कितनी जंगें चल रही हैं लेकिन यूनाइटेड नेशन कुछ नहीं कर पा रहा है. इधर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का रवैया ऐसा है कि खुद के कहे को ही कानून मान कर चल रहे हैं. तो सवाल यह उठता है कि क्या दुनिया में फिर वह वक्त आ रहा है जब जिसकी लाठी उसकी भैंस की कहावत ही चरितार्थ होती रहेगी?
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने गहरी चिंता का इजहार भी किया है. कार्नी ने कहा है कि दुनिया में अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था टूट रही है. इमैनुएल मैक्रों ने तो इससे भी आगे बढ़ कर यहां तक कह दिया है कि मौजूदा दौर में सबसे ताकतवर लोगों का कानून ही मायने रखता है. साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाएं फिर से उभर रही हैं.
जब हम इस स्थिति को देखते हैं, तो यह स्पष्ट रूप से बेहद चिंताजनक समय है, क्योंकि हम उस ढांचे को नष्ट कर रहे हैं, जिसके जरिए हम हालात को सुधार सकते थे और अपनी साझा चुनौतियों का समाधान कर सकते थे. जो चिंता कार्नी और मैक्रों ने व्यक्त की है, वही चिंता इस वक्त विकासशील दुनिया के ज्यादातर देश महसूस कर रहे हैं. वैश्विक ताकतें लाठी के बल पर दूसरों की भैंस को अपने कब्जे में ले रही हैं. पता नहीं, ये हालात कैसे सुधरेंगे!