अवध में पांच दिन पहले शुरू हो जाती है होली

By कृष्ण प्रताप सिंह | Updated: March 2, 2026 06:53 IST2026-03-02T06:50:33+5:302026-03-02T06:53:33+5:30

शौक-ए-दीदार फरमाने वाले तो कई बार यह देखकर दांतों तले उंगली दबा लेते हैं कि ब्रज के बरसाना में जाकर ये रंग लट्ठमार हो जाते हैं तो अवध पहुंचकर गंगा-जमुनी और वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर महाश्मशानी.

Holi starts five days earlier in Awadh | अवध में पांच दिन पहले शुरू हो जाती है होली

अवध में पांच दिन पहले शुरू हो जाती है होली

इस बहुलतावादी देश में, जैसे कई दूसरे त्यौहारों के, वैसे ही होली और उससे जुड़ी ठिठोलियों के भी अनेक रंग हैं. कुछ परम्परा, आस्था व भक्ति से सने हुए तो कुछ खालिस हास-परिहास, उल्लास और शोखियों के. कोई चाहे तो इन्हें ‘भंग के रंग और तरंग’ वाले भी कह ले. शौक-ए-दीदार फरमाने वाले तो कई बार यह देखकर दांतों तले उंगली दबा लेते हैं कि ब्रज के बरसाना में जाकर ये रंग लट्ठमार हो जाते हैं तो अवध पहुंचकर गंगा-जमुनी और वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर महाश्मशानी.

अवध की बात करें तो भगवान राम की राजधानी अयोध्या में होली का हुड़दंग पांच दिन पहले रंगभरी एकादशी के उत्सव से ही आरंभ हो जाता है. इस अवसर पर नागा साधु हनुमानगढ़ी में विराजमान हनुमंतलला के साथ होली खेलते, फिर उनके निशान के साथ अयोध्या की पंचकोसी परिक्रमा पर निकल जाते हैं.

यह परिक्रमा सारे मठों-मंदिरों के रंगोत्सव में शामिल होने का निमंत्रण होती है. फिर तो सारा संत समाज सड़कों पर निकल आता है और सारे भेदभाव भूलकर पांच दिन रंगों के साथ भंग आदि की तरंग में भी डूबता-उतराता रहता है.
यों, अवध में होली के रंगों की गिनती तब तक पूरी नहीं होती, जब तक उनमें उसकी गंगा-जमुनी तहजीब की रंगत शामिल न की जाए. नवाबों द्वारा पोषित और अपने अनूठेपन के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध इस तहजीब का जादू ही कुछ ऐसा है.

क्या गांव-क्या शहर, क्या गली-क्या मोहल्ले और क्या चौराहे, जलती होलिकाएं और रंगे-पुते चेहरों वाले हुड़दंग मचाते हुरियारे किसी को किसी भी बिना पर होली से बेगानगी बरतने का मौका नहीं देते.

इस तहजीब की नींव अवध के तीसरे नवाब शुजाउद्दौला ने अपनी तत्कालीन राजधानी फैजाबाद में रखी थी. 26 जनवरी, 1775 को उन्होंने फैजाबाद में ही अंतिम सांस भी ली. यों तो उन्हें कई ऐबों के लिए भी जाना जाता है, लेकिन मजहबी संकीर्णताएं उन्हें छूते भी डरती थीं. 1775 में उनके पुत्र आसफउद्दौला ने राजधानी फैजाबाद से लखनऊ स्थानांतरित की, तो भी इस तहजीब का दामन नहीं छोड़ा. वे अपने सारे दरबारियों के साथ फूलों के रंग से होली खेला करते थे. यह परंपरा आगे चलकर आखिरी नवाब वाजिद अली शाह के काल तक मजबूत बनी रही.

यह सही है कि अब वक्त की मार ने उस होली के कई रंगों को बदरंग करके रख दिया है, लेकिन लखनऊ में आज भी हुरियारे होली खेलते हुए मुस्लिम इलाकों से गुजरते हैं तो वहां उन पर इत्र छिड़का जाता और मुंह मीठा कराकर स्वागत किया जाता है.  

Web Title: Holi starts five days earlier in Awadh

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