रेप के मामलों में कब दूर होगी संवेदनहीनता?
By कृष्ण प्रताप सिंह | Updated: February 21, 2026 05:26 IST2026-02-21T05:26:33+5:302026-02-21T05:26:33+5:30
फैसला पलटते हुए न्यायालय ने इस दोटूक टिप्पणी से भी परहेज नहीं किया था कि इस तरह की असंवेदनशीलता बरतकर बलात्कार पीड़िताओं को पूर्ण न्याय प्रदान नहीं किया जा सकता.

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पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने स्वत: संज्ञान लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 17 मार्च, 2025 के बलात्कार संबंधी संवेदनहीन फैसले (जिसमें कहा गया था कि किसी तय लड़की के निजी अंगों को पकड़ना या पायजामे का नाड़ा तोड़ना ‘बलात्कार की कोशिश’ नहीं बल्कि ‘बलात्कार की तैयारी’ है) को पलट दिया तो उम्मीद बलवती हुई थी कि अब न्यायालय ऐसे मामलों में अपेक्षाकृत ज्यादा सतर्क रुख अपनाएंगे.
कारण यह कि फैसला पलटते हुए न्यायालय ने इस दोटूक टिप्पणी से भी परहेज नहीं किया था कि इस तरह की असंवेदनशीलता बरतकर बलात्कार पीड़िताओं को पूर्ण न्याय प्रदान नहीं किया जा सकता. उसने यह कहकर फैसले की तीखी आलोचना भी की थी कि उसमें आपराधिक कानून के स्थापित सिद्धांतों का गलत इस्तेमाल तो किया ही गया है,
जरूरी न्यायिक संवेदनशीलता (जो ऐसे फैसलों के लिए सर्वथा अपरिहार्य है) भी नहीं बरती गई है. तिस पर उसमें की गई कई टिप्पणियां इस सीमा तक अमानवीय हैं कि वे न सिर्फ पीड़िताओं पर भयावह प्रभाव डाल सकती हैं बल्कि शिकायत वापस लेने का दबाव भी डाल सकती हैं. लेकिन अफसोस कि इस उम्मीद को नाउम्मीद होते जरा भी देर नहीं लगी,
क्योंकि छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने भी इलाहाबाद हाईकोर्ट की तर्ज पर ही एक मामले में फैसला सुना दिया कि दुष्कर्म सिद्ध करने के लिए ‘पेनिट्रेशन’ अनिवार्य है, स्खलन या निजी अंगों का संपर्क पूर्ण बलात्कार के बजाय बलात्कार की कोशिश ही माना जाएगा. इस फैसले से यह बात पूरी तरह साफ हो गई है कि देश में बलात्कार पीड़िताओं की यथासमय समुचित इंसाफ पाने की लड़ाई अभी भी बहुत लम्बी और बहुत कठिन है क्योंकि इस सिलसिले में सर्वोच्च न्यायालय न्यायालयों से जिस संवेदनशीलता की अपेक्षा कर रहा है, उसकी राह के बहुत से कांटे अभी भी बुहारे जाने बाकी हैं.
एक मामले में कर्नाटक उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश अपने फैसले में इस निष्कर्ष तक जा पहुंचे थे कि किसी भारतीय नारी के लिए बलात्कार के बाद सो जाना अशोभनीय है, क्योंकि भारतीय महिलाएं ऐसी स्थिति में अलग तरह से प्रतिक्रिया देती हैं. और तो और, अभी दो साल पहले ऐसे ही एक मामले में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने किशोरियों को अपनी यौन इच्छाओं पर नियंत्रण रखने की सलाह दे डाली थी,
जिसे बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज करने योग्य पाया था. लेकिन न्यायाधीशों की सीमा यह है कि वे दोनों पक्षों को सुनकर कानून के प्रावधानों के अनुसार फैसले ही सुनाते हैं, कानून नहीं बनाते. ऐसे में वे कर भी क्या सकते हैं, अगर संबंधित कानूनों में ऐसे प्रावधान हैं या उनकी भाषा ऐसी है,
जिनके संवेदनहीन अर्थ निकाले जा सकते और बलात्कारियों के पक्ष में पीड़िता के लिए इंसाफ की राह रोकने वाली व्याख्या की जा सकती है. इस लिहाज से देखें तो किसी न किसी रूप में इसकी कुछ न कुछ जिम्मेदारी संबंधित कानून या उनका ड्राफ्ट बनाने वालों पर भी आती है.