यह खबर अपने आप में बड़ी विचित्र है कि 13 लाख हिंदुस्तानियों के डेबिट और क्रेडिट कार्ड ‘डार्क वेब’ की एक साइट पर बिकने के लिए उपलब्ध हैं. जाहिर सी बात है कि इन्हें साइबर अपराधी ही खरीदेंगे और ठगी करेंगे या साइबर डाका डालेंगे. यह कोई पहली बार नहीं है जब ऐसा हुआ है.
पिछले साल ही खबर आई थी कि हिंदुस्तानियों के कोई 32 लाख डेबिट/क्रेडिट कार्ड को अपराधियों ने हैक कर लिया था. इन कार्ड धारकों का कितने का नुकसान हुआ यह अभी तक ठीक-ठीक पता नहीं चल पाया है. हां, नॉर्टन साइबर सिक्योरिटी इनसाइट रिपोर्ट में यह जरूर कहा गया है कि 2017 में साइबर क्राइम के शिकार भारतीयों ने 18.5 अरब डॉलर गंवाए.
यह रिपोर्ट बताती है कि भारत में जितने लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं, उनमें से हर पांच में से दो व्यक्ति किसी न किसी तरह के साइबर हमले का शिकार जरूर होते हैं. उन्हें पता तब चलता है जब नुकसान हो चुका होता है. भारत में नुकसान की भरपाई अमूमन नहीं हो पाती. इसके दो कारण हैं. एक तो साइबर अपराध से सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था नहीं है, जांच पड़ताल में तीव्रता नहीं है और दूसरी बात अभी भी बीमा के प्रति ज्यादा जागरूकता नहीं है. बीमा क्षेत्र में भी कुछ ही कंपनियां हैं जो यह सेवा दे रही हैं.
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि भारत में कुल साइबर बीमा कारोबार अमेरिका की तुलना में केवल 1.6 प्रतिशत है. ज्यादातर पॉलिसी कंपनियों या संस्थानों द्वारा ली जाती हैं. व्यक्तिगत रूप से कम ही लोग पॉलिसी लेते हैं. ये पॉलिसी मुख्य रूप से वसूली, फिशिंग, ईमेल स्पूफिंग और अनधिकृत ऑनलाइन ट्रॉन्जेक्शन से हुए नुकसान की भरपाई करती है.अमेरिका और यूरोप के विकसित देशों में सुरक्षा की स्थिति ज्यादा बेहतर नजर आती है.
मेरे सुपुत्र देवेंद्र जब अमेरिका में पढ़ाई के बाद नौकरी कर रहे थे, तब उनके बैंक अकाउंट से साइबर अपराधियों ने पूरी राशि निकाल ली थी. उन्होंने वहां बैंक में शिकायत की और तेजी से जांच पड़ताल हुई. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि 8 दिनों के भीतर सारा पैसा अकाउंट में वापस आ गया था. हमारे देश में आज भी यह स्थिति नहीं बन सकी है. हालांकि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने कई एडवाइजरी जारी कर रखी है लेकिन दुर्भाग्य से लोगों के बीच जागरूकता ही नहीं है.
हाल ही में लोगों को एक एसएमएस प्राप्त हुआ जिसमें कहा गया था कि प्रॉविडेंट फंड में 80 हजार रुपए की वृद्धि की जा रही है. सूची में अपना नाम चेक करें. लोगों ने जब साइट खोली तो वहां पैन कार्ड का नंबर मांगा जा रहा था. जाहिर है जिन्होंने सतर्कता नहीं बरती होगी, वे इसके शिकार हुए होंगे. बैंकों के नाम पर फिशिंग के मैसेज और फोन तो आते ही रहते हैं और आश्चर्यजनक है कि लोग फंस भी जाते हैं!
दरअसल दुनिया जिस तेजी से डिजिटल हो रही है, उसी तेजी से साइबर अटैक के खतरे भी बढ़ते जा रहे हैं. आपका डाटा बहुत महत्वपूर्ण है, जिसे चुराया जा रहा है. इसका दुरुपयोग कब और कैसे किया जाएगा, यह समझना बड़ा मुश्किल काम है.
आईटी कंपनी सिस्को ने कुछ दिन पहले ही एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि साल 2018-19 में भारत में बैंकिंग, फाइनेंस और इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्न में काम कर रही कंपनियों पर साइबर अटैक काफी संख्या में हुए और औसतन हर कंपनी को करीब 35 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ.
मगर मेरा मानना है कि साइबर सुरक्षा पर यदि पुख्ता तरीके से ध्यान दिया जाए तो इससे निपटा जा सकता है. इसी साल सितंबर में साइबर अपराध जांच और साइबर फोरेंसिक पर पहला राष्ट्रीय सम्मेलन नई दिल्ली में सीबीआई मुख्यालय में आयोजित किया गया था. उम्मीद करें कि जल्दी कोई ऐसी व्यवस्था हो कि भारत साइबर अपराधियों पर नकेल कस सके.
भारत के लिए ज्यादा सतर्क होने की जरूरत इसलिए है क्योंकि पूरी दुनिया में हम इंटरनेट का उपयोग करने के मामले में दूसरे नंबर पर हैं. दुनिया भर में 3.8 अरब लोग इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं जिसमें 12 फीसदी हम भारतीय हैं. यहां तक कि 8 प्रतिशत के साथ अमेरिका भी हमसे पीछे है. 21 प्रतिशत के साथ चीन पहले नंबर पर है. हमारे यहां पैसों के लेनदेन के लिए अब बहुत सारे एप्प इस्तेमाल किए जा रहे हैं.
ऐसे में बैंकों पर साइबर अटैक का खतरा हमेशा बना रहता है. आधार डाटा लीक होने की घटनाएं भी बहुत हुई हैं. दरअसल जिन कंपनियों को हम अपना डाटा देते हैं उन्हें भी सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था करनी चाहिए. फेसबुक से डाटा लीक होने की कहानी सबको पता है. ब्रिटिश एयरवेज पर तो इसके लिए करीब 22.9 करोड़ डॉलर का जुर्माना भी लगा था. हैकर्स रोज नई तकनीक ईजाद कर रहे हैं. हमें उनसे ज्यादा तेजी और सतर्कता दिखानी होगी. मुङो लगता है कि साइबर अपराध किसी भी सूरत में आतंकवाद से कम नहीं है. आतंकी लोगों की जान लेते हैं. साइबर अपराधी आर्थिक तौर पर जान ले लेते हैं.
और ये खबर भी चिंताजनक है कि इजराइली सॉफ्टवेयर के माध्यम से भारतीय राजनेताओं, व्यवसायियों, मीडिया हाउस, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और मानवाधिकार से जुड़े लोगों की जासूसी की जा रही है. कांग्रेस ने रविवार को आरोप लगाया कि पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी का फोन भी हैक किया गया. राकांपा नेता प्रफुल्ल पटेल भी इसका शिकार हुए हैं. सवाल पैदा होता है कि जासूसी करवा कौन रहा है. इस सवाल का जवाब मिलना ही चाहिए.
सवालों के जवाब नहीं मिलते तो कई शंकाएं पैदा होती हैं और ऐसी शंका पैदा होने की स्थिति क्यों बनी इस पर भी विचार होना चाहिए. सरकार को पूरी सख्ती से ऐसे साइबर अपराधियों की नकेल कसनी चाहिए ताकि किसी भी भारतवासी को यह डर न रहे कि उसकी निजी जानकारियों पर डाका डल सकता है. सरकार को अपनी जिम्मेदारी का एहसास लोगों को कराना चाहिए.