दुनिया में धमाके, संसद में राजनीतिक दांव-पेंच!, प्रियंका के सामने असम की चुनौती?

By हरीश गुप्ता | Updated: March 5, 2026 06:38 IST2026-03-05T06:38:17+5:302026-03-05T06:38:17+5:30

एनडीए के पास 293 सीटें हैं, जिसमें से भाजपा के पास 240 सीटें हैं. इंडिया गठबंधन और तृणमूल के पास मिलाकर कुल 233 सीटें हैं.

usa iran donald trump Explosions in world political maneuvering Parliament Priyanka faces the challenge of Assam blog harish gupta | दुनिया में धमाके, संसद में राजनीतिक दांव-पेंच!, प्रियंका के सामने असम की चुनौती?

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Highlightsतृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस का साथ देने से इनकार कर दिया और तर्क दिया कि अध्यक्ष को और समय दिया जाना चाहिए था.सत्रह सांसद दोनों गठबंधनों से बाहर हैं, जिनमें एआईएमआईएम, बीआरएस और वाईएसआर कांग्रेस के सदस्य शामिल हैं. भाजपा विपक्ष की दरारों को और चौड़ा करने का प्रयास कर रही है.

दुनिया भले ही युद्ध के बीच फंसी हो, लेकिन भारतीय संसद के लिए सब कुछ सामान्य ही रहेगा जब 9 मार्च को बजट सत्र का दूसरा चरण शुरू होगा और इस बार लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर राजनीतिक रूप से गरमागरम बहस होगी. हालांकि इस प्रस्ताव के विफल होने की पूरी संभावना है, लेकिन असली कहानी विपक्ष के भीतर की दरारों में छिपी है. अविश्वास प्रस्ताव ने गहरे मतभेदों को उजागर कर दिया है. तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस का साथ देने से इनकार कर दिया और तर्क दिया कि अध्यक्ष को और समय दिया जाना चाहिए था.

समाजवादी पार्टी के भीतर भी कुछ आपत्तियां थीं, हालांकि उसके सांसदों ने अविश्वास प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिए. आम आदमी पार्टी अपनी ही धुन में है. आंकड़े सरकार के पक्ष में हैं. एनडीए के पास 293 सीटें हैं, जिसमें से भाजपा के पास 240 सीटें हैं. इंडिया गठबंधन और तृणमूल के पास मिलाकर कुल 233 सीटें हैं.

सत्रह सांसद दोनों गठबंधनों से बाहर हैं, जिनमें एआईएमआईएम, बीआरएस और वाईएसआर कांग्रेस के सदस्य शामिल हैं. सरकार केवल अपने बहुमत पर निर्भर रहने के बजाय इन छोटे दलों को लुभाने की कोशिश कर रही है. हाल के राजनीतिक मंचों पर कांग्रेस और क्षेत्रीय सहयोगियों के बीच स्पष्ट तनाव से उत्साहित होकर, भाजपा विपक्ष की दरारों को और चौड़ा करने का प्रयास कर रही है.

विशेषकर तृणमूल और संभवतः सपा और शिवसेना (यूबीटी) के मतदान से दूर रहने से विपक्ष का समर्थन 200 से भी काफी नीचे गिर सकता है. देखा जाए तो, इस प्रस्ताव से स्पीकर पर शायद कोई खास असर न पड़े, लेकिन इससे विपक्ष की एकता और कमजोर हो सकती है. इंडिया गठबंधन के अन्य सहयोगी दल भी इस प्रस्ताव पर मतदान के पक्ष में नहीं हैं. किसी भी तरह की शर्मिंदगी से बचने के लिए नई रणनीति तैयार की जा रही है.

प्रियंका के सामने असम की चुनौती

क्या प्रियंका गांधी वाड्रा बिना किसी लाग-लपेट के मिली प्रतिक्रियाओं को चुनावी ताकत में बदल सकती हैं? चुनाव वाले असम में स्क्रीनिंग कमेटी की अध्यक्ष के रूप में उनकी हालिया यात्रा कोई सामान्य दौरा नहीं थी. यह एक राजनीतिक प्राथमिकता निर्धारण रणनीति थी. विधायकों और जिला प्रमुखों के साथ हुई व्यक्तिगत बैठकों में, जो अपनी बेबाकी के लिए अभूतपूर्व थीं,

जमीनी स्तर के नेताओं को खुलकर अपनी बात कहने का मौका मिला. टिकट वितरण की होड़, स्वार्थी क्षेत्रीय क्षत्रप, असफल गठबंधन वार्ताएं और पूर्व पीसीसी प्रमुख भूपेन कुमार बोरा का निराशाजनक इस्तीफा कोई भी मुद्दा अनछुआ नहीं रहा. उपचुनाव और पंचायत चुनावों में मिली हार के बाद माहौल निराशाजनक था.

उन्होंने दिखावे की बजाय जमीनी हकीकत को चुना. जिलास्तरीय परामर्श, विभिन्न वर्गों के साथ संपर्क और प्रत्यक्ष जांच प्रक्रिया से संकेत मिलता है कि वे समस्या की जड़ तक जाना चाहती हैं और उसका समाधान भी स्वयं करना चाहती हैं. राजनीतिक रूप से उन्होंने बाजी पलट दी.

जब मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने पीसीसी प्रमुख गौरव गोगोई को निशाना बनाया, तो उन्होंने इन हमलों को ‘सम्मान का प्रतीक’ बताया और पीछे हटने के बजाय दृढ़ता का परिचय दिया. सांस्कृतिक व्यक्तित्व जुबिन गर्ग के स्मारक पर उनकी यात्रा ने एक भावनात्मक जुड़ाव पैदा किया.

क्या नए सिरे से उभरा मनोबल संगठनात्मक अस्थिरता पर काबू पा सकता है? क्या कांग्रेस बिना आंतरिक कलह के गठबंधन बना सकती है? उन्होंने आते ही जोरदार काम शुरू कर दिया है. असम में उनकी जीत का फैसला उनके भाषणों पर नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत और एकता पर निर्भर करेगा.

प्रदूषण की आड़ में बयानबाजी

जब योगी आदित्यनाथ ने दिल्ली को ‘गैस चेंबर’ कहा, तो यह सिर्फ प्रदूषण के बारे में ही नहीं था, जिसने हवा को जहरीला बना रखा है, बल्कि राजनीति के बारे में भी था. भाजपा समर्थित सरकार द्वारा शासित राष्ट्रीय राजधानी पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के इस हमले ने पार्टी के भीतर हलचल मचा दी है. सार्वजनिक रूप से, आलाकमान ने चुप्पी साध रखी है.

निजी तौर पर, हर शब्द को रिकॉर्ड में दर्ज किया जाता है. एक ऐसी पार्टी में जो महत्वाकांक्षाओं पर कड़ी नजर रखती है, वहां हर टिप्पणी मायने रखती है. योगी आदित्यनाथ सिर्फ आलोचना तक ही सीमित नहीं रहे. उन्होंने दिल्ली के दम घोंटने वाले वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) की तुलना गोरखपुर के ‘संतुलित विकास’ मॉडल से की,

जिसमें स्वच्छ हवा, पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी और यहां तक कि दैवीय आशीर्वाद का भी हवाला दिया. इसका अंतर्निहित संदेश स्पष्ट था: स्वस्थ वातावरण में शासन करना. यह बिल्कुल उसी तरह का प्रचार लग रहा था, जैसे नरेंद्र मोदी ने कभी गुजरात मॉडल का प्रचार किया था. क्या यह महज पर्यावरण संबंधी चिंता है? या मोदी के बाद के युग को लेकर एक खामोश रणनीति की तैयारी?

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने स्वीकार किया कि इस टिप्पणी से कई लोग असमंजस में पड़ गए. इसके तुरंत बाद आम आदमी पार्टी ने तीखी प्रतिक्रिया दी और संजय सिंह ने पूछा कि क्या योगी यह भूल गए हैं कि दिल्ली को कौन चला रहा है?

संसद ने इस पर बहस करने पर सहमति भी जताई थी-लेकिन व्यवधानों के कारण मामला दब गया. हालांकि, योगी आदित्यनाथ की टिप्पणी ने एक बात सुनिश्चित कर दी है: दिल्ली जहां धुंध से जूझ रही है, वहीं भाजपा अटकलों से लड़ रही है. राजनीति में, कभी-कभी सबसे तीखा प्रदूषण बयानबाजी में ही छिपा होता है.

जश्न से भी अधिक मुखर मौन

जब विशेष अदालत ने शराब मामले को खारिज कर दिया, तो आम आदमी पार्टी जश्न मनाने लगी. अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगियों के लिए यह जीत का दिन था. लेकिन इस उल्लास के बीच एक आवाज गायब थी - राघव चड्ढा की. कभी पार्टी के मुखर नेता रहे चड्ढा ने रहस्यमयी चुप्पी साध रखी है.

न कोई विजयी पोस्ट, न कोई तीखा बयान, न ही आम आदमी पार्टी के गले से बोझ हटाने वाले इस फैसले का कोई प्रत्यक्ष समर्थन. पूछे जाने पर मनीष सिसोदिया ने इसे टालते हुए कहा, ‘आज नहीं.’ इससे रहस्य और गहरा गया. चड्ढा की दूरियां कोई आजकल में नहीं शुरू हुई हैं. पंजाब का प्रभार छीन लिया गया, पंजाब भवन स्थित उनका कार्यालय बंद कर दिया गया,

सुरक्षा हटा ली गई, कपूरथला हाउस तक उनकी पहुंच खत्म कर दी गई - ये संकेत स्पष्ट हैं. पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि केजरीवाल को उन पर भरोसा नहीं रहा. राज्यसभा सीट खोने के डर से पार्टी उन्हें बाहर निकालने की बजाय उन्हें अपने हाल पर छोड़ देना ही बेहतर समझ रही है. इस बीच, चड्ढा सोच-समझकर कदम उठाते हैं -

हाल ही में उन्होंने ई-कॉमर्स ऐप द्वारा 10 मिनट की डिलीवरी पर केंद्र सरकार द्वारा लगाए गए प्रतिबंध की सराहना की और विपक्षी सांसद के लिए असामान्य लगने वाले गर्मजोशी भरे शब्दों में सरकार को धन्यवाद दिया. क्या वे अपनी रणनीति में बदलाव कर रहे हैं? क्या वे विकल्पों की तलाश कर रहे हैं? या फिर तूफान के थमने तक चुपचाप बैठे रहेंगे?  राजनीति में, चुप्पी शायद ही कभी अर्थहीन होती है.

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