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दो अलग-अलग मौके, 2 नेता: 1 संदेश!, मेरे पास अभी भी 25 साल बाकी हैं?

By हरीश गुप्ता | Updated: February 18, 2026 05:36 IST

दिल्ली के भगवा गलियारे सावधानीपूर्वक तैयारियों से भरे रहे हैं - वरिष्ठ नेता समयसीमा का आकलन कर रहे थे, युवा चेहरे अपनी प्रस्तुति को आकर्षक बना रहे थे, और आशावान नेता चुपचाप शीर्ष कुर्सी के सपने देख रहे थे.

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ठळक मुद्देमेरे पास अभी भी 25 साल बाकी हैं.सेवानिवृत्ति जन्मदिन पर निर्भर नहीं होती, बल्कि समय से जुड़ी होती है.राजनीति में, मजाक अक्सर एक छिपी हुई घोषणा होती है.

अगर किसी को लगता था कि 75 की जादुई उम्र के साथ रिटायरमेंट केक और एक औपचारिक विदाई समारोह आता है, तो पिछले सप्ताहांत ने उन्हें हकीकत का सामना करवाया – दो चरणों में, पहले दिल्ली और फिर मुंबई में. 7 फरवरी को, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘परीक्षा पे चर्चा’ के बीच में उम्र बढ़ने से जुड़ा एक हल्का-फुल्का किस्सा सुनाया. उन्होंने बताया कि उनके 75वें जन्मदिन पर एक नेता ने फोन किया और मजाक में कहा, ‘‘तो, अब आप 75 साल के हो गए हैं?’’ मोदी ने हमेशा की तरह हंसमुख अंदाज में और स्पष्ट इरादे के साथ जवाब दिया: ‘‘मेरे पास अभी भी 25 साल बाकी हैं.’’

किसी और संदर्भ में, यह महज हास्य हो सकता था. लेकिन भारतीय राजनीति में, यह एक संक्षिप्त सार्वजनिक सूचना के समान था. ‘सेवानिवृत्ति नियमों’ और नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाओं के बीच, मोदी का यह हास्य एक संदेश बनकर उभरा : अभी विदाई भाषण लिखना शुरू न करें. फिर, मानो तय समय पर, 8 फरवरी आ गई.

मुंबई में, आरएसएस प्रमुख मोहन भगवत ने उम्र और अधिकार के बारे में अपना स्पष्टीकरण दिया. उन्होंने कहा- आम तौर पर कहा जाता है कि 75 वर्ष की आयु के बाद किसी को कोई पद धारण किए बिना काम करना चाहिए, लेकिन संघ ने उन्हें काम जारी रखने के लिए कहा है. और जब भी आरएसएस निर्देश देगा, वे पद छोड़ देंगे.

दो दिन, दो नेता, एक ही आयु सीमा और आश्चर्यजनक रूप से समान संदेश : उम्र भले ही 75 हो, लेकिन पद छोड़ने का रास्ता अपने आप नहीं खुलता. शायद यह एक संयोग था. या फिर राजनीतिक जगत सबको याद दिला रहा था कि इस व्यवस्था में सेवानिवृत्ति जन्मदिन पर निर्भर नहीं होती, बल्कि समय से जुड़ी होती है.

महत्वाकांक्षाओं को अब 25 साल का इंतजार!

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘मेरे पास अभी 25 साल बाकी हैं’, तो यह जन्मदिन पर किए गए मजाक जैसा लगा. दर्शक हंस पड़े. कैमरे क्लिक करने लगे. लेकिन भाजपा के महत्वाकांक्षाओं से भरे प्रतीक्षा-कक्ष में कहीं न कहीं हंसी थम सी गई. क्योंकि राजनीति में, मजाक अक्सर एक छिपी हुई घोषणा होती है.

वर्षों से, दिल्ली के भगवा गलियारे सावधानीपूर्वक तैयारियों से भरे रहे हैं - वरिष्ठ नेता समयसीमा का आकलन कर रहे थे, युवा चेहरे अपनी प्रस्तुति को आकर्षक बना रहे थे, और आशावान नेता चुपचाप शीर्ष कुर्सी के सपने देख रहे थे. कुछ ने धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा की, कुछ ने अधीरता से, सभी इस बात से आश्वस्त थे कि राजनीति का स्वाभाविक क्रम उत्तराधिकार है.

फिर आया मोदी का गणित. 75, और 25, आपको 2047 से आगे ले जाते हैं - वही वर्ष जिसे वे बार-बार विकसित भारत के लक्ष्य के रूप में उद्धृत करते हैं. अचानक, नारे में तीक्ष्णता आ गई. शायद यह केवल भारत की विकास यात्रा के बारे में नहीं था. शायद यह मोदी के व्यक्तिगत राजनीतिक रोडमैप के बारे में भी था.

संदेश, जानबूझकर हो या अनजाने में, स्पष्ट था: मोदी-बाद के युग के लिए अभी से तैयारी शुरू न करें. अनुभवी नेताओं के लिए यह एक बड़ा झटका था-जिस विदाई की वे उम्मीद कर रहे थे, वह शायद कभी तय समय पर न आए. युवा नेताओं के लिए तो यह और भी परेशान करने वाला था. उनकी आकांक्षाएं, जो कभी शांत भाव से पनप रही थीं,

अब एक अनिश्चित परिपक्वता तिथि वाले दीर्घकालिक निवेश की तरह लग रही थीं. भाजपा में महत्वाकांक्षा कभी खत्म नहीं होती-बस कुछ समय के लिए टल जाती है. इसलिए जब देश सेवानिवृत्ति के नियमों पर बहस कर रहा है, पार्टी कार्यकर्ता अगले चुनाव पर चर्चा कर रहे हैं. एक बात स्पष्ट है : मोदी के ‘25 साल’ वाले बयान ने सिर्फ समय सीमा को ही नहीं बढ़ाया. इसने प्रतीक्षारत सभी लोगों के धैर्य-और राजनीतिक भविष्य-को भी परख लिया.

राहुल गांधी को अब चुप नहीं कराया जा सकता!

राहुल गांधी ने संसद में विपक्ष के कुछ चुनिंदा नेताओं की तरह सुर्खियां बटोरी हैं. फरवरी 2026 के बजट सत्र में, जब सत्ता पक्ष उनसे हमेशा की तरह विरोध, विराम और पीछे हटने की उम्मीद कर रहा था, तब राहुल ने कुछ अलग ही किया. उन्होंने आगे बढ़कर सदन, कैमरों और सत्ता पक्ष को चुनौती दी कि वे उन्हें रोक कर दिखाएं.

और उन्होंने अपना हमला सिर्फ सरकार तक ही सीमित नहीं रखा है. कई लोगों को चौंका देने वाली बात यह है कि उन्होंने अब टेलीविजन चैनलों पर सीधा हमला किया है. वही माइक्रोफोन जो उनसे तुरंत बयान लेने के लिए दौड़ पड़ते थे, अब उन्हें खरी-खोटी सुनाते हैं. वे उन्हें ‘सिखाया हुआ’ कहते हैं.  ऐसा लगता है कि राहुल अब अपनी बात रखने की अनुमति नहीं मांग रहे हैं.

उपहास, व्यवधान, व्यक्तिगत हमले, विशेषाधिकार या अन्य किसी भी प्रकार की अपील उन्हें परेशान नहीं करती. सत्ता पक्ष ने उन्हें घेरने, उनकी आवाज दबाने या उनसे कोई गलती करवाने के लिए बहुआयामी रणनीति अपनाई है-प्रक्रियात्मक पेचीदगियां, तीखे खंडन, आक्रामक पलटवार. फिर भी, वह शोर-शराबे के बीच सीधे चलते जा रहे हैं.

एक के बाद एक बहस में, उन्होंने नीतिगत मुद्दों से कहीं अधिक गहरी बात कही है: यह संदेश कि उनके अनुसार उन्हें पहले कभी बोलने की अनुमति नहीं दी गई थी. उन्हें चुप कराया गया, दरकिनार किया गया, कम आंका गया - और अब विनम्रतापूर्वक प्रतीक्षा करने का समय समाप्त हो गया है. उन्हें ‘बेधड़क’ बनाने वाली बात केवल उनकी मुखरता नहीं, बल्कि उनका दृढ़ संकल्प है.

राहुल गांधी अब अनिच्छुक राजनेता की बजाय एक ऐसे दृढ़ निश्चयी व्यक्ति की तरह दिख रहे हैं जो इतिहास द्वारा उन्हें नकारे गए स्थान को प्राप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है. इस सत्र में, ध्यान राहुल पर नहीं गया है, बल्कि राहुल ने ही ध्यान आकर्षित किया है. सभी की निगाहें भाजपा पर टिकी हैं, जिसके सांसद राहुल को संसद से आजीवन निष्कासित कराना चाहते हैं.

रेवंत रेड्डी का हार्वर्ड प्रवास

रेवंत रेड्डी के हार्वर्ड प्रवास को देश में एक राजनीतिक चमत्कार की तरह पेश किया गया है - सुबह-सुबह की कक्षाएं, शून्य से नीचे का तापमान, लंबे शैक्षणिक घंटे. संदेश स्पष्ट है : एक मुख्यमंत्री जिसने विदेशी धरती पर अपने नेतृत्व कौशल को निखारा है और वैश्विक स्तर पर निपुणता हासिल करके, अपने साथ ‘तेलंगाना राइजिंग 2047’ का नारा लेकर लौटे हैं.

रेवंत पहले से ही सत्ता की कुर्सी पर बैठे हैं, जिनका मूल्यांकन प्रमाणपत्रों से नहीं बल्कि कार्यों से किया जाता है - जमीनी स्तर पर निवेश, गांवों में कल्याण, हैदराबाद में स्थिरता. हार्वर्ड से मिली शिक्षा चमक तो ला सकती है, लेकिन वास्तविक कार्यों का विकल्प नहीं. रेवंत के लिए सीख सीधी है: तेलंगाना विदेशी प्रशंसा से नहीं, बल्कि स्थानीय परिणामों से आगे बढ़ेगा.

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