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राजेश बादल का ब्लॉग: निष्पक्षता और पक्षपात के बीच बेहद महीन रेखा

By राजेश बादल | Updated: May 7, 2019 06:57 IST

भारतीय निर्वाचन आयोग ने अपनी कार्यसंस्कृति और तौर-तरीकों से देश में ही नहीं, दक्षिण एशिया के अनेक राष्ट्रों में महत्वपूर्ण छवि बनाई है.

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यश की पूंजी अर्जित करने में बरसों लग जाते हैं. इस कारण कोई नहीं चाहता कि मेहनत से संचित-अर्जित यश की पूंजी को यूं ही लुट जाने दिया जाए. कठिन परिश्रम के बाद इंसान इसे हासिल करता है.  यश का मर जाना अपने मर जाने से ज्यादा तकलीफदेह है.

भारत जैसे विराट लोकतंत्न में आजादी के बाद देश के नियंताओं ने रात-दिन पसीना बहाकर करोड़ों लोगों के लिए प्रतीक संस्थाएं गढ़ी हैं. इन संस्थाओं ने भी अपनी साख को दो-चार दिन में नहीं हासिल किया है. दशकों के समर्पण, त्याग और निष्ठा के बाद इन प्रतीक संस्थाओं ने अपने यश की पूंजी का विशाल भंडार सुरक्षित कर लिया है.

अगर हिंदुस्तान बीते सत्तर साल में पाकिस्तान जैसा विनाशक मुल्क  नहीं बना है तो इसी वजह से कि हमारे पूर्वज एक ठोस संवैधानिक ढांचा दे गए थे. विडंबना यह है कि हम इसके लिए अपनी आजादी के आंदोलन से निकली तपी तपाई पीढ़ी का भी उपकार मानने के लिए तैयार नहीं हैं. इससे बड़ी कृतघ्नता और क्या हो सकती है? 

भारतीय निर्वाचन आयोग ने अपनी कार्यसंस्कृति और तौर-तरीकों से देश में ही नहीं, दक्षिण एशिया के अनेक राष्ट्रों में महत्वपूर्ण छवि बनाई है.अनेक अवसरों पर इस गौरवशाली संस्था ने समूचे विश्व में अपने कामकाज से अनेक प्रतिमान रचे हैं. इसकी वजह यह भी है कि आयोग की नींव में संविधान के प्रति समर्पण, लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था और निष्पक्षता के संस्कार कूट-कूट कर भरे गए थे.

अपवाद के तौर पर बेशक कुछ उदाहरण आप याद कर सकते हैं, लेकिन इसके उलट यह भी एक तथ्य है कि पहले आम चुनाव के दौरान ऑल इंडिया रेडियो को तत्कालीन सरकार ने निर्देश दिए थे कि किसी भी दल के राजनीतिक कार्यक्रम या प्रचार अभियान का कोई प्रसारण नहीं किया जाएगा. इस चुनाव में रेडियो के जरिए प्रसारण का लाभ सिर्फ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने लिया था. उसका प्रचार अभियान मॉस्को रेडियो से लगातार प्रसारित हुआ था. बात यहीं समाप्त नहीं हो जाती.

तत्कालीन प्रधानमंत्नी जवाहरलाल नेहरू ने पाया कि खुद उनका दल या अन्य विपक्षी दल प्रचार अभियान में स्तरहीन प्रचार कर सकते हैं या सत्ता में होने का अनुचित लाभ ले सकते हैं तो उन्होंने खुद ही चुनाव आचार संहिता बनाने का प्रस्ताव किया. सभी दलों की बैठक बुलाई गई और  प्रारूप स्वीकार किया गया. चुनाव आयोग ने इसे सभी दलों, सांसदों और मीडिया में वितरित किया.

जब 1979 में मध्यावधि चुनाव हुए तो राजनीतिक माहौल बदला हुआ था. मुख्य चुनाव आयुक्त एस.एल. शकधर की अगुवाई में  चुनाव आयोग ने मजबूती दिखाई और सरकारी साधनों का दुरुपयोग रोकने के लिए पहल की. सभी दलों से बात कर संहिता में नया हिस्सा जोड़ा गया.

मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, अटलबिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर, जगजीवन राम और हेमवतीनंदन बहुगुणा से लेकर प्रतिपक्ष में बैठीं इंदिरा गांधी तक ने इसमें संशोधनों को सहमति दी. यह भी महसूस किया गया था कि कहीं कहीं सरकारें सत्ता का लाभ चुनाव के दरम्यान लेना चाहती हैं.

नए परिवर्तनों में सत्तारूढ़ दल पर कई  बंदिशें लगाई गईं. मकसद यही था कि सरकार चला रही पार्टी को अन्य दलों की अपेक्षा शक्तियों के अधिक इस्तेमाल का अवसर न मिले. इसके बाद आया टी. एन. शेषन का कार्यकाल. आचार संहिता को और सख्त बनाया गया. सन 1991 में इसे लागू किया गया. तब से यही आचार संहिता छोटी मोटी तब्दीलियों के साथ चल रही है.

संहिता में साफ कहा गया है कि किसी की निजी  जिंदगी पर हमला नहीं किया जाएगा, सांप्रदायिक आधार पर भावनाएं भड़काने वाली कोई अपील नहीं होगी और जुलूस, प्रचार इत्यादि की सीमाएं तय कर दी गईं. सरकारी कार्यक्र मों, नई नीतियों और फैसलों के ऐलान पर रोक लगाई गई.

सरकारी पैसे का दुरुपयोग रोकने के लिए प्रावधान हुआ और प्रधानमंत्नी - मंत्रियों के दौरे में सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल रोकने के लिए दिशा निर्देश बनाए गए. टी. एन. शेषन ने हिंदुस्तान के निर्वाचन आयोग की प्रतिष्ठा को असाधारण पहचान और ऊंचाइयां दीं.

अफसोस है कि सत्नहवीं लोकसभा के चुनाव में घटिया और शर्मनाक हथकंडों  का इस्तेमाल हो रहा है. चुनाव आयोग से जब सर्वोच्च न्यायालय जवाब तलब करता है तो आयोग बेचारगी का रोना रोने लगता है. जब सर्वोच्च अदालत फटकार लगाती है तो वह दो-चार दिन कड़क होने का अभिनय करता है.

उसके बाद फिर वही लुंज पुंज निर्वाचन आयोग दिखाई देने लगता है. संभवतया यह पहली बार है, जब सुप्रीम कोर्ट को भी चुनाव आयोग को लेकर इतना कड़ा रवैया अख्तियार करना पड़ा है. ताज्जुब होता है कि शेषन के पास उन दिनों कौन से अमोघ अस्त्न थे, जो आज निर्वाचन आयोग के पास नहीं हैं. 

आयोग को याद रखना होगा कि जब वह निष्पक्षता की लक्ष्मण रेखा पार करता है तो करोड़ों आंखें  देखती हैं. उम्मीद करें कि आने वाली नस्लों को यह न बताना पड़े कि हमने एक ताकतवर मुल्क का बेहद दुर्बल  निर्वाचन आयोग भी देखा था. 

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