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संवैधानिक शक्तियों के बीच संतुलन जरूरी, न्यायालय ने तमिलनाडु के राज्यपाल की आलोचना की

By अश्वनी कुमार | Updated: July 30, 2025 05:23 IST

राष्ट्रपति की शक्तियां इस मामले में सीधे प्रश्न के दायरे में नहीं थीं और हमारे संवैधानिक ढांचे में राष्ट्रपति की सार्वभौमिक शक्ति एक अलग स्तर और दायरे में काम करती है.

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ठळक मुद्देभविष्य में राज्यों और केंद्र सरकार द्वारा संवैधानिक शक्तियों के प्रयोग पर इसका बड़ा प्रभाव पड़ेगा.संवैधानिक कर्तव्यों का पालन निष्पक्ष और नियमों के अनुसार करें और यह माना जाता है कि वह शक्ति का दुरुपयोग नहीं करेंगे.राष्ट्रपति के कार्य राष्ट्रीय आवश्यकताओं से प्रेरित होते हैं, जो सामान्यतः न्यायिक मानकों के दायरे में नहीं आते.

सर्वोच्च न्यायालय में होने वाली अगली सुनवाई बहुत महत्वपूर्ण है. यह राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए उस संदर्भ पर है, जो तमिलनाडु राज्य बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल (अप्रैल 2025) मामले के निर्णय से जुड़ा है. यह मामला इसलिए अहम है क्योंकि इसमें राज्यों के अधिकारों में दखल देने और संवैधानिक शक्तियों के प्रयोग में तय परंपराओं की अनदेखी होने की चिंता जताई गई है. न्यायालय की राय वैधानिक रूप से बाध्यकारी नहीं होगी, लेकिन भविष्य में राज्यों और केंद्र सरकार द्वारा संवैधानिक शक्तियों के प्रयोग पर इसका बड़ा प्रभाव पड़ेगा.

अपने निर्णय में न्यायालय ने तमिलनाडु के राज्यपाल की आलोचना की है क्योंकि उन्होंने विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों को मंजूरी देने में बहुत लंबा समय लगाया. न्यायालय ने कहा कि यह आचरण असंवैधानिक है. साथ ही स्पष्ट किया कि भले ही संविधान इस बारे में कुछ न कहे, लेकिन राज्यपाल का दायित्व है कि वह संवैधानिक विवेक का इस्तेमाल उचित और निष्पक्ष तरीके से करें.

सरकारी निर्देशों का हवाला देते हुए न्यायालय ने यह भी कहा कि राज्यपाल और राष्ट्रपति को विधेयकों पर निर्णय सरकार की सिफारिश मिलने के तीन महीने के भीतर लेना चाहिए. राज्यपाल के आचरण को लेकर न्यायालय का फैसला सही और संवैधानिक तर्क पर आधारित है.

लेकिन न्यायालय का यह कहना कि राष्ट्रपति, राज्यपाल द्वारा रोके गए विधेयकों पर निर्णय लेते समय अदालत से सलाह लें, विवादित माना जा सकता है. यह न्यायिक अतिक्रमण पर प्रश्न खड़े करता है इसकी वजह यह है कि राष्ट्रपति की शक्तियां इस मामले में सीधे प्रश्न के दायरे में नहीं थीं और हमारे संवैधानिक ढांचे में राष्ट्रपति की सार्वभौमिक शक्ति एक अलग स्तर और दायरे में काम करती है.

सर्वोच्च संवैधानिक शक्ति के संरक्षक के रूप में राष्ट्रपति से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने संवैधानिक कर्तव्यों का पालन निष्पक्ष और नियमों के अनुसार करें और यह माना जाता है कि वह शक्ति का दुरुपयोग नहीं करेंगे. राष्ट्रपति के कार्य राष्ट्रीय आवश्यकताओं से प्रेरित होते हैं, जो सामान्यतः न्यायिक मानकों के दायरे में नहीं आते.

इन कार्यों की प्रकृति राष्ट्रपति को एक विशिष्ट स्थिति में रखती है, जो राज्यपाल के समान नहीं मानी जा सकती. राज्यपाल तो राष्ट्रपति के प्रतिनिधि होते हैं और उनका पद राष्ट्रपति के विश्वास पर निर्भर करता है. इसलिए यह हैरानी की बात नहीं है कि राष्ट्रपति ने न्यायालय के निर्णय से जुड़े अहम संवैधानिक प्रश्नों पर उसकी राय मांगी है, ताकि निर्णय को लेकर अपनी असहमति जताई जा सके.

राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए संदर्भ में मुख्य प्रश्न यह है कि सरकार और न्यायपालिका की संवैधानिक सीमाएं क्या हैं. यह हमारे संविधान की मूलभूत व्यवस्था से जुड़ा मुद्दा है. न्यायालय की राय किसी पहले से तय निर्णय को नहीं बदल सकती, लेकिन इस संदर्भ को या तो निर्णय पर दोबारा विचार करने का अवसर माना जा सकता है, या फिर ऐसा नया कानून बनाने की तैयारी के रूप में देखा जा सकता है, जिससे राष्ट्रपति को न्यायालय के लगाए गए प्रतिबंधों से छूट मिल सके. विशेष तौर पर अगर अदालत की राय तमिलनाडु मामले के निर्णय से अलग हो.

यह संदर्भ कई विशेष और जनहित के महत्वपूर्ण प्रश्नों पर भी अदालत की राय मांगता है. इन प्रश्नों में यह भी शामिल है कि क्या न्यायपालिका अनुच्छेद 142 के तहत राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा प्रयोग की जाने वाली संवैधानिक शक्तियों में बदलाव कर सकती है या उन्हें रद्द कर सकती है. यह अनुच्छेद सर्वोच्च न्यायालय को बेहद व्यापक न्यायिक अधिकार देता है.

राज्यपाल के आचरण के संदर्भ में न्यायालय का निर्णय तार्किक और सुसंगत है, फिर भी राष्ट्रपति को यह सुझाव देना कि वह अनुच्छेद 143 के तहत अदालत से कानूनी सलाह लें, विवाद का विषय बन सकता है. यह सुझाव विधायी विधेयकों की वैधता से जुड़े मुद्दों पर न्यायालय से राय लेने को लेकर दिया गया था. इसकी आलोचना इसलिए की गई है क्योंकि यह न्यायपालिका का अनावश्यक हस्तक्षेप माना गया,

जबकि मामला केवल तमिलनाडु के राज्यपाल के आचरण तक सीमित था. इसलिए राष्ट्रपति के विवेकाधिकार पर टिप्पणी करना उचित नहीं माना गया. निर्णय के इस हिस्से पर इसलिए भी प्रश्न उठते हैं क्योंकि राष्ट्रपति के पास पहले से ही स्थापित प्रक्रिया है, जिसमें कानूनी सलाह लेना भी शामिल है.

सरकार या संसद के नीतिगत निर्णयों में और संप्रभु शक्तियों के प्रयोग में न्यायपालिका का हस्तक्षेप, जब तक वह स्पष्ट रूप से दुर्भावनापूर्ण न हो, संवैधानिक शक्तियों के संतुलन पर प्रश्न खड़ा करता है. तमिलनाडु मामले में न्यायिक शक्ति के प्रयोग में संयम की आवश्यकता पर स्वयं न्यायालय ने जोर दिया था.

उसने कहा था, ‘न्यायालय आत्मसंयम का पालन करते हुए उन क्षेत्रों में हस्तक्षेप नहीं करते, जहां संविधान ने कार्यपालिका को विशेष अधिकार दिए हैं.’ हाल ही में ऑक्सफोर्ड यूनियन में अपने संबोधन में प्रधान न्यायाधीश गवई ने भी न्यायिक शक्तियों के संतुलित प्रयोग का समर्थन किया है.

अनुभव, कानून और ज्ञान से समृद्ध न्यायाधीशों का मुख्य दायित्व है कि वे समझदारी के साथ मूल्यों का संतुलन बनाए रखें. देश को उम्मीद है कि सर्वोच्च न्यायालय अपनी बुद्धिमत्ता से संवैधानिक शक्तियों का ऐसा संतुलन बनाए रखेगा, जिससे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था किसी एक संस्था की असीमित इच्छाओं के अधीन न हो जाए.

देश की अंतरात्मा के संरक्षक के रूप में न्यायालय से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने निर्णयों में स्थिरता और नैतिकता बनाए रखकर इस विश्वास को मजबूत करे और न तो राजनीति को न्यायिक मामलों में प्रवेश करने दे, न ही न्यायपालिका को राजनीति में. हमें विश्वास है कि वर्तमान समय के कठिन प्रश्नों के स्थायी समाधान समझदारी भरी सोच से ही मिलेंगे.

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