देशवासियों ने नेताजी को अरसे तक अपनी उम्मीदों में जिंदा रखा
By कृष्ण प्रताप सिंह | Updated: January 23, 2026 05:52 IST2026-01-23T05:52:27+5:302026-01-23T05:52:27+5:30
गौर कीजिए : 18 अगस्त, 1945 को ताइपेई में हुई विमान दुर्घटना में नेताजी के निधन की खबर आई तो भी देशवासियों ने उसे खारिज कर उन्हें अपनी उम्मीदों में जिंदा रखा.

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किसी को नेताजी सुभाषचंद्र बोस (जिनकी आज जयंती है) के बारे में सिर्फ एक वाक्य लिखने का अवकाश हो तो भी उसे यह लिखने से बचना मुश्किल होगा कि उनके व्यक्तित्व में बुद्धि और वीरता का अद्भुत समन्वय था. क्योंकि इस समन्वय के बगैर देशवासी स्वतंत्रता संघर्ष में उनके द्वारा प्रदर्शित अप्रतिम शौर्य को लेकर उतने मिथ कतई नहीं रचते, जितने उस संग्राम के दूसरे महानायकों को मिलाकर भी नहीं रचे हैं. गौर कीजिए : 18 अगस्त, 1945 को ताइपेई में हुई विमान दुर्घटना में नेताजी के निधन की खबर आई तो भी देशवासियों ने उसे खारिज कर उन्हें अपनी उम्मीदों में जिंदा रखा.
इसलिए कि उनके पराक्रम को लेकर वे इस हद तक आश्वस्त थे कि उन्होंने मान लिया था कि मौत भी उससे छल नहीं कर सकती. बहुतों की उम्मीदों में वे 1997 में आई अपनी जन्मशताब्दी के बाद भी जिंदा थे तो इसलिए कि ये उम्मीदें किसी भी हालत में मरना नहीं चाहती थीं. तभी तो उनके कहीं ‘रहस्यमय ढंग से रहने’ या ‘प्रकट’ होने की बाबत पता पाते ही भाव व श्रद्धाविह्वल लोग उन्हें निकट से निहारने की लालसा लिए वहां पहुंच जाते थे. उनका दिल किसी भी तरह मानता नहीं था कि वे अब इस संसार में नहीं हैं. कुछ का तो अभी भी नहीं ही मानता.
दूसरे पहलू पर जाएं तो अब ब्रिटेन का नेशनल आर्मी म्यूजियम भी मानता है कि नेताजी की आजाद हिंद सेना द्वारा 1944 में चार अप्रैल से 22 जून तक तीन चरणों में कोहिमा में लड़ी गई लड़ाई ब्रिटेन की लड़ाइयों के इतिहास में महानतम थी. जाहिर है कि इसमें आजाद हिंद सेना की विजय हुई होती तो हमारे देश और उसके स्वतंत्रता संघर्ष का इतिहास बदल जाता.
बहरहाल, 1897 में आज ही के दिन कटक में धर्मपरायण माता प्रभावती देवी और वकील पिता जानकीनाथ बोस के पुत्र के रूप में जन्मे सुभाष ने मैट्रिक परीक्षा में तत्कालीन कलकत्ता सूबे में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया था. 1920 में इंग्लैंड में प्रतिष्ठित आईसीएस परीक्षा में चौथे स्थान पर आकर वे उज्ज्वल भविष्य के सपने संजो ही रहे थे कि जनरल डायर द्वारा अंजाम दिए गए नृशंस जलियांवाला बाग कांड ने देश के अनेक नौजवानों के साथ उनको भी हिला कर रख दिया. फिर तो वे आईसीएस की एप्रेंटिसशिप छोड़कर देश वापस लौट आए और स्वतंत्रता संघर्ष में कूद पड़े.
नारा दिया-तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा! गोरी सत्ता द्वारा देश से निर्वासन के क्रूर दंड तक को बेकार सिद्ध करते हुए 1941 में भूमिगत होकर अफगानिस्तान के रास्ते वे जर्मनी जा पहुंचे और ‘दुश्मन का दुश्मन दोस्त’ की रणनीति के तहत भारत की स्वाधीनता के लिए ब्रिटिश साम्राज्य के जर्मनी व जापान जैसे शत्रु देशों का सहयोग सुनिश्चित करने में लग गए.
अनंतर, सिंगापुर पहुंचकर उन्होंने रासबिहारी बोस से भेंट की और 21 अक्तूबर, 1943 को आजाद हिंद सेना व सरकार गठित करके अपना सशस्त्र अभियान आरम्भ किया. उन्हें विश्वास था कि वे जल्दी ही अंग्रेजों को हराकर भारत को मुक्त करा लेंगे.
देश-विदेश में भारी सहयोग व समर्थन के बीच अंडमान निकोबार को मुक्त कराते हुए 18 मार्च, 1944 को वे भारतभूमि तक पहुंच गए थे. विश्वयुद्ध में उनके सहयोगी देशों की हार के साथ ही बाजी पलट गई और उनका मिशन अधूरा रह गया, लेकिन यह अधूरापन उनके अभियान की महत्ता को कम नहीं करता.