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एशिया के सबसे छोटे देश से भारत के लिए निकलता गंभीर संदेश

By राजेश बादल | Updated: September 4, 2018 05:55 IST

विडंबना है कि वे ही यामीन को राजनीति में लाए थे, जिन्होंने उन्हें जेल में डाला। देश में नया संविधान लाने वाले पहले लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए पूर्व राष्ट्रपति नशीद 13 साल की सजा पा चुके हैं। वे किसी तरह इलाज के बहाने लंदन पहुंचे। वहां से श्रीलंका में शरण पाकर निर्वासित जिंदगी बिता रहे हैं।

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मालदीव के समंदर से हिन्दुस्तान आ रही लहरें आशंका जगाती हैं। एशिया के सबसे छोटे और आबादी में भारत के उदयपुर से भी छोटे इस देश में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। राष्ट्रपति यामीन की तानाशाही की एक ऐसी दास्तान, जो अत्यंत डरावनी है। वहां पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल गयूम अस्सी बरस की उम्र में जेल की सलाखों के भीतर हैं। गयूम तीस बरस तक राष्ट्रपति रहे हैं और यामीन के सौतेले भाई हैं। 

विडंबना है कि वे ही यामीन को राजनीति में लाए थे, जिन्होंने उन्हें जेल में डाला। देश में नया संविधान लाने वाले पहले लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए पूर्व राष्ट्रपति नशीद 13 साल की सजा पा चुके हैं। वे किसी तरह इलाज के बहाने लंदन पहुंचे। वहां से श्रीलंका में शरण पाकर निर्वासित जिंदगी बिता रहे हैं। जिस दिन मालदीव पहुंचेंगे, कारागार उनका स्वागत करने के लिए तैयार है। तीन साल से उनकी पत्नी और बेटी लंदन में निर्वासित जैसी जिंदगी बिता रही हैं। 

आपको याद होगा कि नशीद ने दुनिया में बढ़ते ग्लोबल वार्मिग के संकट पर ध्यान खींचने के लिए अपनी कैबिनेट मीटिंग समंदर के भीतर स्कूबा डायविंग के जरिए की थी। मालदीव के सभी एक हजार से ज्यादा दीव समंदर से सिर्फ छह फुट ऊंचे हैं। इस नाते मालदीव का विनाश निश्चित है। कब होगा कोई नहीं जानता। एक पूर्व उपराष्ट्रपति अहमद अदीब जेल में हैं। 

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अब्दुल्ला सईद और एक अन्य न्यायाधीश अली हामिद जेल में हैं। दो पूर्व रक्षामंत्नी, दो पुलिस प्रमुख, मुल्क के प्रोसिक्यूटर जनरल भी जेल में हैं। इनके अलावा अनगिनत सरकारी अधिकारी और राजनेता कैद में दिन काट रहे हैं। अपने विरोधियों को जेल में डालने से पहले यामीन ने देश में आपातकाल लगा दिया था। 

अपने आलोचकों को जेल में डालने का यह समय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी महीने 23 सितंबर को वहां नए राष्ट्रपति का चुनाव होने जा रहा है। मगर इन परिस्थितियों में वहां अब कोई लोकतांत्रिक बयार बहेगी - यह नामुमकिन सा लगता है।  मालदीव के मुख्य चुनाव आयुक्त अहमद शरीफ ने हालांकि बार-बार साफ किया है कि 23 सितंबर को राष्ट्रपति चुनाव पारदर्शी और निष्पक्ष होंगे लेकिन उनकी बात पर कोई यकीन नहीं करता।    

हिन्दुस्तान के लिए दिखने में भले ही मालदीव का घटनाक्र म गंभीर न लगे मगर आने वाले समय के लिए अत्यंत गंभीर चेतावनी छिपी है। बीते दिनों भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने एक ट्वीट में यह कहकर बवाल खड़ा कर दिया था कि अगर मालदीव में चुनाव में धांधली हो तो भारत को फौजी कार्रवाई करना चाहिए। अक्सर हमारे नेता अपने बड़बोलेपन से देश की कूटनीतिक और रणनीतिक योजनाओं पर पानी फेर देते हैं। इस ट्वीट के बाद मालदीव खफा हो गया और उसके विदेश सचिव ने भारतीय उच्चायुक्त अखिलेश मिश्र को बुलाकर अपनी अप्रसन्नता जताई। 

भारत को इस बयान से अपने आप को अलग करना पड़ा। उसने भारत की ओर से उपहार में दिए गए दो सैनिक हेलिकॉप्टर तत्काल वापस बुलाने का निर्देश दिया है। अब भारत बगलें झांक रहा है। एक बयान ने उसके अनेक कदमों को पीछे हटने पर बाध्य कर दिया है। मालदीव में भारतीयों की हालत बदतर होती जा रही है। दो-तीन साल पहले मालदीव में पीने के पानी का गंभीर संकट पैदा हो गया था। तब भारत ने वहां पेयजल की गंगा बहा दी थी। हाल ही में सुब्रमण्यम स्वामी श्रीलंका गए थे। नशीद से भी उनकी मुलाकात हुई थी।

इसके अलावा वे पूर्व राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे से भी मिले थे, मगर वर्तमान राष्ट्रपति सिरिसेना से उनकी भेंट संभवत: नहीं हुई। भारतीय वैदेशिक नीति में संतुलन का बिंदु हमेशा ताकतवर रहा है। राजपक्षे तो हमेशा चीन समर्थक रहे हैं। अलबत्ता सिरिसेना भारत के प्रति सहानुभूति रखते हैं। अब इस तरह भारत के सत्ताधारी दल के एक सांसद की मुलाकातें हों और उनका प्रचार भी हो तो किसका नुकसान  होता है? 

नहीं भूलना चाहिए कि तीस बरस पहले श्रीलंका में सक्रि य लिट्टे की मदद से मालदीव में अब्दुल गयूम की तख्तापलट की कोशिश हुई थी। गयूम ने भारत से मदद मांगी और केवल नौ घंटे में भारत की सेना ने ऑपरेशन कैक्टस के जरिए तख्ता पलट की साजिश को नाकाम कर दिया था। तब से लेकर आज तक स्थिति एकदम बदली हुई है। हमने अपने हाथों ही मालदीव में अपनी छवि बिगाड़ ली है। आज चीन से पूछे बिना यामीन एक कदम नहीं बढ़ाते। स्वामी के बयान के बाद ताजा खबरें हैं कि चीन ने अपने युद्धपोत मालदीव की ओर रवाना कर दिए हैं। उसने चेतावनी दी है कि किसी देश को मालदीव के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देना चाहिए। आज की तारीख में बहुमत यामीन के पास न के बराबर है। मालदीव की जनता के बीच वे लोकप्रिय नहीं हैं। साम, दाम, दंड, भेद - चारों तरीके उन्होंने अपनाए हैं। चीन की मदद से दोबारा चुने जाएंगे। इसके आसार अधिक हैं। भारत को उस स्थिति में बहुत संवेदनशील होकर अपनी भूमिका का नए सिरे से निर्धारण करना होगा। 

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