अभिलाष खांडेकर
एक पूर्व नामचीन नौकरशाह ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के बारे में लिखा था कि इसमें विचार और वास्तविकता के बीच कोई अंतर नहीं है. हिंदी में भाजपा का एक नारा खूब लोकप्रिय हुआ... ‘मोदी है तो मुमकिन है’ यानी उनके नेतृत्व में सब कुछ संभव है. मोदी लंबे समय से देश में एक लोकप्रिय व्यक्तित्व बन चुके हैं और अब उस दल से कहीं ऊपर उठ चुके हैं जिसने उन्हें 1987 में गुजरात इकाई का महज महासचिव बनाया था. वास्तव में, मोदी के नेतृत्व में भारत की वैश्विक छवि बनी थी; उनके नेतृत्व में पार्टी इतना फली-फूली है जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी.
अमित शाह के शब्दों में : “पिछले कई वर्षों में भाजपा की अखिल भारतीय स्तर पर हुई वृद्धि देश के स्वातंत्र्योत्तर इतिहास में किसी भी पार्टी द्वारा की गई प्रगति से बेजोड़ है और नरेंद्र भाई की लोकप्रियता ने पार्टी के लिए सतत वृद्धि और दीर्घकालिक संगठनात्मक लाभ सुनिश्चित किया है.” मोदी ने अपने भाषण कौशल, संगठनात्मक क्षमता और प्रौद्योगिकी का उपयोग करते हुए साल-दर-साल नए मतदाताओं और समर्थकों को बड़ी संख्या में जोड़ा है, जिससे भाजपा कहीं अधिक शक्तिशाली बन गई है.
वास्तव में, 2014 से पार्टी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा है और अपनी सदस्यता और लगातार जीत के दम पर दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन गई है. पर क्या यही सब काफी है? बदलते समय के साथ-साथ राजनीतिक दलों में भी बदलाव आता है, क्योंकि यही राजनीतिक प्रक्रिया का एकमात्र स्थिर पहलू है. भाजपा भी पिछले कुछ वर्षों में काफी बदल गई है.
वास्तव में, यह पूरी तरह रूपांतरित हो चुकी है और इसे पहचानना थोड़ा मुश्किल है. एक ऐसी पार्टी जो हमेशा ‘सेवा’ में विश्वास रखती थी, अब बात कुछ और है. मुझे लता मंगेशकर का यह कथन याद है, ‘नरेंद्र भाई को सत्ता से कोई लगाव नहीं है.’ यह सच हो सकता है लेकिन मोदी के सत्ता से अनासक्ति के मंत्र में इसके कई नेता विश्वास नहीं करते.
दूसरे शब्दों में, बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा किए जनसेवा करना. भाजपा कार्यकर्ता उतने सेवाभावी नहीं हैं जितने मोदी हैं या कुशाभाऊ ठाकरे जैसे इसके कुछ चुने हुए नेता थे. यदि पार्टी इस स्तर तक संख्याबल में बढ़ गई है तो इसका मुख्य कारण स्वार्थी लोगों का बड़ी संख्या में पार्टी में शामिल होना है, जिनका एकमात्र उद्देश्य सत्ता में हिस्सा बंटाना है.
फिर भी, कई मायनों में भाजपा संगठन, जो अगले दो-तीन वर्षों में अपना अर्धशतक पूरा करने जा रहा है, अपने विरोधियों से अतुलनीय है. इसमें अनुशासन की झलक दूसरों की तुलना में कहीं अधिक है. यह अपने कार्यकर्ताओं को तैयार करने, उन्हें प्रशिक्षित करने, उन्हें व्यस्त रखने और उन पर कड़ा नियंत्रण रखने में माहिर है.
निस्संदेह, भाजपा अपने कार्यकर्ताओं में वामपंथी दलों, कांग्रेस या समाजवादी पार्टी से कहीं अधिक निवेश करती है. वास्तव में, यह एक चौबीसों घंटे सक्रिय रहने वाली पेशेवर पार्टी है. मैं जनसंघ के दिनों से ही भाजपा पर गहरी नजर रखता आया हूं, उसके पूर्ववर्ती स्वरूप से. जनसंघ पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्पष्ट छाप थी; जो भाजपा पर अब धुंधली पड़ गई है.
क्या जनसंघ भाजपा से बेहतर था? एक तरह से हां, क्योंकि उसने सत्ता का स्वाद नहीं चखा था और भाजपा की तरह सारी बुराइयां नहीं समेटी थीं. जनसंघी सादगीपूर्ण जीवन जीते थे और खाली जेब सत्ताधारी कांग्रेस के खिलाफ लड़ रहे थे. अब भाजपा के लगातार बढ़ते पेड़ पर, जो अनगिनत फलों से लदा है, लाखों कार्यकर्ता उन फलों को खाने के लिए लालायित दिखते हैं.
असम के विवादित मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा इसका मात्र एक उदाहरण हैं. उनकी आय में हुई बेतहाशा वृद्धि को देखिए. या फिर अन्य राज्यों के बड़े नेताओं को ही लीजिए. समस्या यह है कि भाजपा के अब कई चेहरे हैं जिन्हें लोग अचरज से देखते रहते हैं.
केंद्र में लगातार तीसरी बार सत्ता में रहने के बावजूद भाजपा ने कांग्रेस से खुद की अलग पहचान बनाए रखी है. लेकिन वर्ष 2024 के चुनावों में भाजपा को मात्र 37 प्रतिशत वोट मिले इसे भुलाना नहीं होगा, क्योंकि नाराज जनता का मिजाज बदलने में देर नहीं लगती है, यह ध्यान रखने योग्य एक महत्वपूर्ण बात है.