प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल का ब्लॉग: जीने के लिए संघर्षरत पड़ोसियों के प्रति दायित्व
By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: December 28, 2019 12:19 IST2019-12-28T12:19:08+5:302019-12-28T12:19:08+5:30
पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान में लगातार हिंदू, बौद्ध, सिख, ईसाई मतों को मानने वाले नागरिकों की जनसंख्या में गिरावट आई है. आखिर ऐसा क्यों होता है?

प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल का ब्लॉग: जीने के लिए संघर्षरत पड़ोसियों के प्रति दायित्व
नागरिक संशोधन कानून 2019 को लेकर बहस करते समय इसे ध्यान में रखना जरूरी है कि देश विभाजन के समय महात्मा गांधी ने कहा था कि पाकिस्तान के अल्पसंख्यक वहीं रहें और भविष्य में यदि उन्हें समस्या हुई तो भारत में उनका स्वागत होगा. यह कानून भारत की ऐतिहासिक जिम्मेदारी थी.
यह कानून भारत विभाजन के बाद बने राष्ट्रों के अल्पसंख्यकों के समक्ष आए संकटों का निदान है. 1947 के पूर्व का भारत यानी अविभाजित भारत और 14 अगस्त 1947 की रात 15 अगस्त 1947 के भोर के बीच भारत के मानचित्न में जो परिवर्तन हुआ था उसके बाद से जो जन जहां भी अल्पसंख्यक रह गया, उसके हितों की चिंता करना उन सरकारों की जिम्मेदारी थी, जो 15 अगस्त 1947 से अस्तित्व में आए थे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.
पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान में लगातार हिंदू, बौद्ध, सिख, ईसाई मतों को मानने वाले नागरिकों की जनसंख्या में गिरावट आई है. आखिर ऐसा क्यों होता है? इस पर पिछले 50-60 वर्षो में बहुत कुछ कहा गया है. नागरिकता संशोधन अधिनियम के आने के साथ बांग्लादेश ने जिस प्रकार से अल्पसंख्यकों को, जो शरणार्थी के रूप में भारत में रह रहे हैं, उनको वापस लेने के संदर्भ में जो विचार किया और सरकार ने कहा हम उनको वापस लेने के लिए तैयार हैं, यह बता रहा है कि कहीं न कहीं कोई ऐसी समस्या है जिसके कारण वे लोग अपना देश छोड़ने को मजबूर हैं.
तो जिम्मेदार लोकतांत्रिक राष्ट्र होने के नाते पड़ोस में जीवन जीने के लिए संघर्ष कर रहे मनुष्य मात्न के सहयोग का दायित्व भारत पर आता है. भारत की संसद ने लंबी चर्चा के बाद इसको स्वीकार किया है.
इस पर कोई पहली बार विचार नहीं हुआ है. पूर्व प्रधानमंत्नी और राजग की सरकार के समय राज्यसभा में विपक्ष के नेता डॉ. मनमोहन सिंह ने पहली बार इस पर संवैधानिक रूप से प्रयास करने की बात कही थी. विभाजन के समय जो परिवार भारत आ गए थे, उन्हें स्वाभाविक तौर पर नागरिक अधिकार मिले लेकिन विभाजन के बाद मजबूरियों में प्रताड़ना के कारण लोगों के आने का क्र म जारी रहा और आज भी जारी है उनको वह अधिकार नहीं मिला.
जो पश्चिमी पाकिस्तान के कुछ हिस्सों से और पाक आक्रांत जम्मू-कश्मीर के हिस्सों से आकर रह रहे थे, उनको भी नागरिक अधिकार नहीं मिल रहे थे क्योंकि नागरिकता अधिनियम में यह सहूलियत उनको प्राप्त नहीं हो रही थी. प्रताड़ित होकर भारत आने वाले, मजबूरियों में भारत आने वाले लोगों को हम शरणार्थी के रूप में स्वीकार करें या उन्हें अपना बंधु मानते हुए, अपना भाई मानते हुए उनको अपने साथ रखें, प्रश्न यही है. यह प्रश्न किसी धर्म के विरोध का नहीं है.
नागरिकता कानून का सवाल भारत के इतिहास और परंपरा से जुड़ा हुआ है. इतिहास गवाह है कि पूरी दुनिया में पारसी कहीं नहीं बचे हैं. कभी पूरा देश हुआ करता था. अगर भारत में उनको समान नागरिक अधिकारों के साथ जीवन जीने की सुविधा न दी गई होती तो भारत में भी पारसी न होते.
भारत के अंदर समान नागरिक अधिकारों के अंतर्गत अन्य स्थानों से आए हुए लोगों को नागरिक अधिकार देने का स्वभाव न होता तो कोलकाता का चाइना टाउन नहीं होता. यह हमारी परंपरा रही है. हम व्यक्ति को शरणार्थी के रूप में स्वीकार करने की अपेक्षा नागरिक के रूप में उसे मनुष्य के सभी अधिकारों से समन्वित करते हुए स्वीकार करने के आदी रहे हैं.
इस कानून को लेकर मतभेद तो हो सकता है लेकिन नागरिक जिम्मेदारी के अंतर्गत उसकी अस्वीकृति लोकतंत्नात्मक संस्थाओं के सामने प्रश्न खड़ा करती है. प्रतिरोध का होना विरोध का होना एक बात है लेकिन देश के नागरिकों के कर के पैसे से अर्जित की गई संपत्ति को आग के हवाले करना, भारत के विभाजन के संबंध में नारे लगाना यह एक नए किस्म का माहौल है.
इस प्रकार का प्रचार चल रहा है कि एनआरसी थोप दी गई और जिसके पास दस्तावेज नहीं होगा, उसको भारत में रहने का अधिकार नहीं होगा. इस तरह एक कल्पित और वास्तविकता से कोसों दूर भ्रम को सामने रखकर के देश के युवाओं को दिग्भ्रमित करने की कोशिश चल रही है. अफवाहों के बाजार को गर्म करते हुए देश में हिंसा का दावानल फैलाने के बजाय आशंकाओं पर युक्ति और तर्क के आधार पर संवाद होना चाहिए.
दुनिया भर में कहीं भी सताए हुए लोगों के साथ भारत खड़ा होता रहा है. युगांडा के साथ भारत की कोई सीमा नहीं मिलती है लेकिन युगांडा में भी सताए गए लोगों को नागरिक का अधिकार देने के लिए हमने व्यवस्थाएं बनाई हैं. यह तो एकदम जिनसे सीमाएं मिलती हैं और जिनकी मजबूरी है कि वहां से प्रताड़ित किए जाएंगे तो भारत के अतिरिक्त कोई स्थान नहीं है जहां उनको संरक्षण प्राप्त हो सके, ऐसे समूह को न्याय देने का प्रयास है नया नागरिक कानून.