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राहुल सांकृत्यायन: घुमक्कड़ी ने जिन्हें महापंडित बनाया 

By कृष्ण प्रताप सिंह | Updated: April 9, 2026 07:32 IST

कहा जाता है कि इस घुमक्कड़ी ने ही उनको महापंडित बनाया.

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अनवरत यात्री, अहर्निश यायावर, तथ्य व तत्व के अन्वेषी, ज्ञान पिपासु, दार्शनिक व इतिहासविद, बौद्धधर्म के अप्रतिम मर्मज्ञ, अभ्यासक व व्याख्याता, बहुभाषाविद, परिवर्तनकामी साहित्यसर्जक, साम्यवादी चिंतक, सामाजिक क्रांति के सार्वदेशिक दृष्टिसम्पन्न अग्रदूत और मनीषी. 1893 में नौ अप्रैल को (यानी आज के ही दिन) उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के पन्दहा गांव में स्थित अपनी  ननिहाल में जन्मे स्मृतिशेष राहुल सांकृत्यायन की बहुज्ञता ने उनके इस संसार में रहते ही उनके ऐसे अनेक परिचय सृजित कर दिए थे.

दूसरी ओर उनके विविध जीवनप्रवाहों ने उनका नाम भी एक नहीं रहने दिया था. उनकी माता कुलवंती व पिता गोवर्धन पांडेय का दिया नाम केदारनाथ पांडेय तब पीछे छूट गया था, जब वैराग्य से प्रभावित होकर वे उसकी शरण में गए और ‘दामोदर स्वामी’ कहकर पुकारे जाने लगे. बौद्ध हुए तो उनका  नाम ‘राहुल’ हो गया, जिसमें अपने पितृकुल का सांकृत्य गोत्र जोड़कर वे राहुल सांकृत्यायन बन गए और इसी नाम से प्रतिष्ठित हुए.

हां, जिसे उनके व्यक्तित्व की विराटता कहा जाता है, धर्म, संस्कृति, दर्शन, साहित्य, इतिहास, शोध और संघर्ष समेत उसके अनेक आयाम हैं, जबकि उनका एक बड़ा परिचय उनकी ‘महापंडित’ की उपाधि भी देती है. हालांकि यह भी कहा जाता है कि वे इसको लेकर बड़ी सीमा तक निर्लिप्त थे.

अलबत्ता यायावरी को (जिसे वे घुमक्कड़ी कहना ज्यादा पसंद करते थे) उन्होंने उम्र भर अपने जीवन की सबसे बड़ी और पहली प्राथमिकता बनाए रखा. यहां तक कि ‘घुमक्कड़ शास्त्र’ लिखकर उसे शास्त्र का दर्जा भी दे गए. वह भी ऐसे दौर में जब न संचार क्रांति हुई थी और न दुनिया इतनी छोटी होकर ग्लोबल विलेज में बदली थी कि आसानी से उसे मुट्ठी में कर लेने का सपना देखा जा सके.

उस समय घुमक्कड़ी का अर्थ नाना प्रकार की दुश्वारियों से गुजरते हुए ऊबड़-खाबड़, कंकरीली-पथरीली और कांटों भरी राहों पर चलना हुआ करता था. इन राहों की दुश्वारियों को, जो तब तक दुर्निवार थीं, इस रूप में समझा जा सकता है कि बौद्ध दर्शन पर उनके जिस युगांतरकारी शोध को आज भी मील के पत्थर सरीखा माना जाता है, उसके सिलसिले में तिब्बत से लेकर श्रीलंका तक की घुमक्कड़ी के दौरान प्रभूत मात्रा में हासिल हुए साहित्य को उन्हें खासे दुर्गम रास्तों से खच्चरों पर लादकर ले आना पड़ा था.

इसके बावजूद उन्होंने घुमक्कड़ी को जीवन की गतिशीलता के पर्याय और साथ ही ऐसे सार्वदेशिक विश्वव्यापी धर्म की संज्ञा दी और उसका शास्त्र बनाया, जिसमें किसी भी व्यक्ति के आने की मनाही नहीं है.  उन्होंने स्वयं भी किशोरावस्था में ही अपना घर छोड़ दिया और वर्षों तक हिमालय में यायावरी कहें या घुमक्कड़ी करते रहे थे. कहा जाता है कि इस घुमक्कड़ी ने ही उनको महापंडित बनाया. उन्होंने वाराणसी में संस्कृत का अध्ययन तो आगरा में अन्य विषयों की पढ़ाई की थी. फिर लाहौर में मिशनरी का काम किया और आजादी की लड़ाई में जेल यात्रा से भी परहेज नहीं किया था.

यहां समझ लेना चाहिए कि उनको जो घुमक्कड़ी अभीष्ट थी और उन्होंने जिसका शास्त्र रचा, वह निरुद्देश्य न होकर लैंगिक भेदभाव से परे मनुष्य की बेहतरी के वृहत्तर उद्देश्य को समर्पित है और इस कारण बड़ी हिम्मत व हौसले की मांग करती है.  

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