पीएम नरेंद्र मोदी से तारीफ सुनकर गदगद हुए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प
By हरीश गुप्ता | Updated: February 11, 2026 05:52 IST2026-02-11T05:52:58+5:302026-02-11T05:52:58+5:30
भारत ने कूटनीतिक चुप्पी साधे रखी - न कोई गुलदस्ता, न कोई धन्यवाद पत्र, यहां तक कि विनम्रता का एक शब्द तक नहीं.

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डोनाल्ड ट्रम्प को दो बातों से कभी परहेज नहीं रहा: श्रेय लेना और तारीफ पाने की इच्छा रखना. लगभग एक साल से, वे भारत से उन जादुई शब्दों का इंतजार कर रहे थे-बल्कि बेकरार थे- जिन्हें वे अपना हक समझते हैं. पिछले साल मई में भारत-पाकिस्तान युद्धविराम की घोषणा के बाद, ट्रम्प को स्टैंडिंग ओवेशन मिलने की उम्मीद थी. पाकिस्तान ने खुशी-खुशी उनकी उम्मीदों पर खरा उतरते हुए उन्हें दिल से धन्यवाद दिया और नोबल शांति पुरस्कार के लिए भी उनके नाम की सिफारिश कर दी.
हालांकि, भारत ने कूटनीतिक चुप्पी साधे रखी - न कोई गुलदस्ता, न कोई धन्यवाद पत्र, यहां तक कि विनम्रता का एक शब्द तक नहीं. यह चुप्पी स्पष्ट रूप से ट्रम्प को परेशान कर रही थी. वे हर मौके पर दुनिया को याद दिलाते रहे कि उन्होंने ‘युद्ध रोक दिया है’ - कभी युद्धविराम के दावों से, कभी टैरिफ की धमकियों से, और हमेशा एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जो दुनिया के शांतिदूत के रूप में याद किया जाना चाहता है.
और फिर दो फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नवीनतम पोस्ट आया. मोदी ने सिर्फ व्यापारिक समझौते की पुष्टि ही नहीं की, बल्कि ट्रम्प को इससे कहीं अधिक मूल्यवान चीज दी: मान्यता. ट्रम्प की आत्म-मुग्ध छवि को ध्यान में रखते हुए, मोदी ने अपने ट्वीट में कहा कि ट्रम्प का नेतृत्व ‘वैश्विक शांति, स्थिरता और समृद्धि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है’ और ‘भारत शांति के लिए उनके प्रयासों का पूर्ण समर्थन करता है’.
ट्रम्प के लिए यह किसी संगीत की तरह था. इसलिए नहीं कि टैरिफ कम कर दिए गए, बल्कि इसलिए कि उनकी पसंदीदा भूमिका - विश्व के प्रधान शांतिदूत - को आखिरकार दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नेता ने स्वीकार कर लिया.
मोदी ने एक ही झटके में ट्रम्प को वह दे दिया जिसकी उन्हें सबसे ज्यादा चाह थी: मान्यता. लेकिन मोदी ने समय का चुनाव सोच-समझकर किया. अब जब ट्रम्प ने यह प्रशंसा सुन ली है, तो शायद वे आखिरकार तारीफों के पीछे भागना बंद कर दें - हालांकि ट्रम्प के मामले में, तारीफें सुनने की चाहत कभी खत्म नहीं होती.
प्रियंका को अभी भी अवसर का इंतजार!
प्रियंका गांधी वाड्रा आज कांग्रेस के एक जाने-पहचाने माहौल में हैं - स्टेडियम में भीड़ उनके नाम का जयकारा लगा रही है, लेकिन पार्टी का कोच अभी भी उन्हें मुख्य मुकाबले में भेजने से हिचकिचा रहा है. कांग्रेस के भीतर प्रियंका को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी भूमिका देने की बढ़ती मांग के बावजूद, उनकी नवीनतम जिम्मेदारी आश्चर्यजनक रूप से सीमित है:
आगामी असम विधानसभा चुनाव के लिए चयन समिति की अध्यक्षता करना. असल में, वह न तो चुनाव प्रचार का नेतृत्व कर रही हैं, न ही राज्य इकाई का संचालन कर रही हैं, बल्कि दूसरों द्वारा तैयार की गई उम्मीदवारों की सूची की निगरानी करना. संसद में हाल ही में जोश और आत्मविश्वास दिखाने वाले नेता के लिए यह कदम पदोन्नति से ज्यादा एक और प्रशिक्षण अभ्यास जैसा लगता है. ऐसा लगता है कि असम में उन्हें कप्तानी नहीं, बल्कि अभ्यास करना है - एक नियंत्रित भूमिका जिसमें राजनीतिक कुशलता दिखाने की गुंजाइश सीमित है.
विडंबना यह है कि प्रियंका को उत्तर प्रदेश की जो पिछली जिम्मेदारी सौंपी गई थी, खराब नतीजों के बाद उस पर आसानी से विफलता का लेबल लग गया. हालांकि यह बात राज्य की जिम्मेदारी उन्हें सौंपे जाने से पहले ही पता थी. सवाल यह उठता है कि क्या प्रियंका को नेतृत्व के लिए तैयार किया जा रहा है या उन्हें हमेशा के लिए बेंच पर बैठा दिया जाएगा?
नम्र, किंतु दृढ़ हैं स्पष्टवादी नितिन नबीन
भाजपा के नवनियुक्त अध्यक्ष नितिन नबीन तेजी से अपनी इस छवि को संजो रहे हैं कि वे ठीक वही हैं जिसकी पार्टी को इस समय जरूरत है: केंद्रित, दृढ़ और सादगीपूर्ण. 45 वर्ष की आयु में, भाजपा द्वारा गर्व से विश्व के सबसे बड़े राजनीतिक संगठन कहे जाने वाले भाजपा के सबसे युवा अध्यक्ष, नबीन वरिष्ठ नेताओं से भरे सदन में प्रवेश कर रहे हैं - जिनमें से कई दिग्गज पिछले एक दशक में प्रतिद्वंद्वी दलों से आए हैं.
शुरू में, कुछ अंदरूनी सूत्रों ने निजी तौर पर उन्हें नाममात्र का नेता बताकर खारिज कर दिया. फिर नरेंद्र मोदी का स्पष्ट संकेत आया : ‘पार्टी मामलों में नितिन नबीन जी मेरे बॉस हैं.’ अचानक, वही नेता उनसे मिलने के लिए कतार में लग गए और पूरी निष्ठा से उनकी बात दोहराने लगे. नबीन जी की खासियत उनका स्पष्ट और व्यावहारिक अंदाज है.
पार्टी प्रवक्ताओं की एक बैठक में, एक सदस्य ने मोदी पर किताब लिखने के बारे में लंबा-चौड़ा भाषण दे दिया. नबीन जी ने विनम्रता से सुना- फिर बीच में ही टोकते हुए उनसे एजेंडे पर टिके रहने को कहा. उनकी राज्यों की यात्राएं औपचारिक मुलाकातों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि रणनीतिक सलाह-मशविरे के लिए हैं.
केरल में, उन्होंने नेताओं को उन 30 निर्वाचन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने का निर्देश दिया, जहां भाजपा का वोट शेयर 30 प्रतिशत से अधिक था, और उस आधार को विधानसभा सीटों में बदलने को कहा. शांत, स्पष्टवादी और सहज रूप से प्रभावशाली नितिन नबीन यह साबित करने के लिए दृढ़ संकल्पित प्रतीत होते हैं कि वे केवल एक औपचारिक नेता नहीं, पार्टी के अगले प्रमुख नीति-नियंता हैं.
बिहार में पांचवीं राज्यसभा सीट के लिए कड़ा मुकाबला
बिहार में आगामी राज्यसभा चुनावों के लिए मुकाबला गरमा रहा है, क्योंकि पांच सीटें खाली हो रही हैं और द्विवार्षिक चुनाव मार्च में होने वाले हैं. राज्य विधानसभा में सीटों का समीकरण, विशेष रूप से पांचवीं सीट के लिए, मुकाबले को बेहद दिलचस्प बना रहा है. वर्तमान में एनडीए को 243 सदस्यों वाली विधानसभा में 202 विधायकों का समर्थन प्राप्त है.
राज्यसभा की सभी पांच सीटों पर जीत हासिल करने के लिए उसे 205 वोटों की आवश्यकता होगी, क्योंकि प्रत्येक सीट के लिए 42 वोट चाहिए. इससे सत्ताधारी गठबंधन को तीन वोटों की कमी रह जाती है. दूसरी ओर, महागठबंधन के पास 35 विधायक हैं, साथ ही सीपीआई-एमएल के दो, सीपीआई-एम का एक और इंडियन इंक्लूसिव पार्टी (आईआईपी) का एक विधायक है.
यदि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी (5) और बसपा (1) गठबंधन कर लें तो महागठबंधन के पास जीतने का मौका है. इसलिए, अहम सवाल यह है कि क्या सत्ताधारी भाजपा-जेडीयू गठबंधन इस कमी के कारण राज्यसभा की एक सीट को हाथ से जाने देगा-या फिर वह राजनीतिक दांव-पेंच से इस अंतर को पाटने और सभी पांचों सीटें हासिल करने की कोशिश करेगा.
गौरतलब है कि जेडीयू और आरजेडी दोनों की दो-दो राज्यसभा सीटें खाली हो रही हैं, जबकि एक सीट उपेंद्र कुशवाहा की है. ऐसी खबरें व्यापक रूप से फैली हैं कि आरजेडी नेता प्रेमचंद गुप्ता, जो पांच बार राज्यसभा सांसद रह चुके हैं, के छठी बार चुनाव लड़ने की संभावना है.
गुप्ता के पास लंबा संसदीय अनुभव होने के साथ-साथ संगठनात्मक और वित्तीय संसाधन भी हैं. इसलिए, उनकी उम्मीदवारी पांचवीं सीट के लिए होने वाले मुकाबले को बेहद रोमांचक बना सकती है. अंततः बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि एनडीए अंतिम सीट के लिए किसे उम्मीदवार बनाता है.



