ब्लॉग: हाथ से फिसलते जनाधार को भांप नहीं सके पटनायक

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Published: June 6, 2024 09:23 AM2024-06-06T09:23:38+5:302024-06-06T09:23:42+5:30

नवीन पटनायक उत्कृष्ट प्रशासक साबित हुए और ओडिशा को उन्होंने तरक्की के पथ पर आगे बढ़ाया। जो ओडिशा किसी जमाने में कालाजार जैसी बीमारी और कालाहांडी में भुखमरी जैसी त्रासदी के लिए बदनाम था, पटनायक के शासन में वह इन दोनों अभिशापों से मुक्त हो गया।

Odisha Lok Sabha results 2024 Naveen Patnaik could not sense the support base slipping from his hands | ब्लॉग: हाथ से फिसलते जनाधार को भांप नहीं सके पटनायक

ब्लॉग: हाथ से फिसलते जनाधार को भांप नहीं सके पटनायक

लोकसभा तथा विधानसभा के चुनावों में आंध्रप्रदेश में तेलुगू देशम पार्टी के मुखिया एवं राज्य के पूर्व  मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू की जबर्दस्त जीत अप्रत्याशित नहीं थी मगर ओडिशा में बीजू जनता दल के प्रमुख नवीन पटनायक के 24 वर्ष के शासन का अंत इतनी बुरी तरह से होगा, यह किसी ने सोचा नहीं था। दोनों ही राज्यों में सत्तारूढ़ दलों के विरुद्ध असंतोष था।

आंध्र में वाईएसआरसीपी की कमान संभाल रहे मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी के विरुद्ध तीव्र लहर थी परंतु ओडिशा में नवीन पटनायक के खिलाफ चुनाव के आरंभिक दौर तक इतना असंतोष नहीं था कि तख्तापलट हो जाए। पटनायक ने खुद दो सीटों से चुनाव लड़ा था और एक ही सीट से जीत पाए, वह भी महज चार  हजार मतों से। ओडिशा पर 24 साल तक शासन करनेवाले पटनायक की पार्टी बीजद के खाते में 51 सीटें ही आईं। 147 सदस्यीय विधानसभा में 78 सीटें जीतकर भाजपा राज्य में पहली बार सरकार बनाने जा रही है। भारतीय राजनीति में नवीन पटनायक अपने ढंग के अनोखे राजनेता हैं। उनके पिता बीजू पटनायक देश की राजनीति के दिग्गजों में रहे। उनके जीवित रहने तक नवीन राजनीति से कोसों दूर रहे। पिता के देहांत के बाद उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया।

वह देश के इकलौते राजनेता हैं जिन्हें अपनी मातृभाषा ओडिया बोलनी नहीं आती। 24 साल के लंबे राजनीतिक कैरियर में उन्होंने अपनी मातृभाषा को सीखने का गंभीरता से प्रयास भी नहीं किया। इसके बावजूद अपने पिता की राजनीतिक विरासत को नवीन पटनायक ने मजबूती के साथ आगे बढ़ाया और उनकी भाषा संबंधी कमजोरी के बावजूद राज्य की जनता ने उन्हें भरपूर समर्थन दिया। नवीन पटनायक उत्कृष्ट प्रशासक साबित हुए और ओडिशा को उन्होंने तरक्की के पथ पर आगे बढ़ाया। जो ओडिशा किसी जमाने में कालाजार जैसी बीमारी और कालाहांडी में भुखमरी जैसी त्रासदी के लिए बदनाम था, पटनायक के शासन में वह इन दोनों अभिशापों से मुक्त हो गया।

अपने 24 वर्ष के शासन के अंतिम एक या डेढ़ वर्षों में पटनायक संभवत: अतिआत्मविश्वास का शिकार हो गए. पार्टी पर उनकी पकड़ कमजोर होने लगी और भर्तृहरि मेहताब जैसे व्यापक जनाधारवाले नेता उनका साथ छोड़ने लगे। पूर्व नौकरशाह वी.के. पांडियन के हाथ में उन्होंने पार्टी की कमान अघोषित रूप से सौंप दी। इससे पार्टी के नेताओं तथा कार्यकर्ताओं के साथ बीजद के वोट बैंक में भी नाराजगी बढ़ी।

इसके अलावा पटनायक की बिगड़ती सेहत को भी भाजपा ने मुद्दा बनाया जो बीजद की हवा बिगाड़ने में सफल रहा। पटनायक अब भले ही ओडिशा के मुख्यमंत्री पद से विदा हो रहे हों लेकिन ईमानदार तथा नैतिक मूल्यों के प्रति समर्पित राजनेता एवं कुशल प्रशासक के रूप में उन्हें हमेशा याद किया जाता रहेगा। आंध्रप्रदेश में एन. चंद्रबाबू की सफलता के पीछे उनका राजनीतिक कौशल निर्णायक रहा।

वाईएसआरसीपी के मुखिया तथा मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी को हराने के लिए उन्होंने दो मोर्चों पर काम किया। पहले चरण में उन्होंने रेड्डी सरकार की विफलताओं को आम मतदाताओं तक पहुंचाने में सफलता पाई और दूसरे चरण में उन्होंने जातिगत समीकरण साधे। चंद्रबाबू को कुशल प्रशासक और बेहतरीन संगठन क्षमता के साथ-साथ उत्कृष्ट रणनीतिकार भी समझा जाता है। आंध्र में लोकसभा तथा विधानसभा चुनाव जीतने के लिए उन्होंने जातिगत समीकरण साधे।. उन्होंने भाजपा तथा अभिनेता से नेता बने जन सेना पार्टी के अध्यक्ष पवन कल्याण से हाथ मिला लिया।

इससे चुनाव में चंद्रबाबू को शानदार सफलता मिली। दक्षिणी राज्य में भाजपा ने चंद्रबाबू के कंधों पर चढ़कर अपनी जड़ें जमाने की कोशिश की है। चंद्रबाबू ने पहले भी मुख्यमंत्री के रूप में आंध्र में विकास के नए मापदंड स्थापित किए हैं। उनसे राज्य की जनता को उम्मीदें बहुत हैं। राज्य की खस्ताहाल आर्थिक स्थिति को पटरी पर लाने के साथ-साथ जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने की चुनौती चंद्रबाबू के सामने है।

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