Mahatma Gandhi Death Anniversary: अंग्रेज तो 1917 में ही बापू की जान के दुश्मन बन गए थे?
By कृष्ण प्रताप सिंह | Updated: January 30, 2026 05:57 IST2026-01-30T05:57:30+5:302026-01-30T05:57:30+5:30
Mahatma Gandhi Death Anniversary: बिहार के चम्पारण अंचल में गोरे नील बागान मालिकों के हाथों उत्पीड़ित हो रहे किसानों की मुक्ति के लिए ऐतिहासिक सत्याग्रह किया था.

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1948 में वह 30 जनवरी यानी आज के दिन की ही शाम थी, जब नई दिल्ली के बिड़ला भवन में सांध्यकालीन प्रार्थना सभा में जा रहे महात्मा गांधी पर चलाई गई तीन गोलियों ने उनको हमसे छीन लिया था. उस समय शाम के पांच बजकर सत्रह मिनट हुए थे और जानकारों के अनुसार 1934 के बाद से यह उनकी हत्या का सातवां प्रयास था. पहले छह प्रयास विफल रहे थे, जबकि यह सातवां उनको चिर निद्रा में सुलाकर ही माना. लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि 1934 से 17 साल पहले 1917 में भी उनकी हत्या की एक साजिश रची गई थी.
तब, जब उन्होंने बिहार के चम्पारण अंचल में गोरे नील बागान मालिकों के हाथों उत्पीड़ित हो रहे किसानों की मुक्ति के लिए ऐतिहासिक सत्याग्रह किया था. महात्मा गांधी के चंपारण सत्याग्रह के दौरान जब गोरे नील बागान मालिकों को नील के अपने साम्राज्य के लिए गम्भीर खतरा दिखने लगा तो उन्होंने महात्मा की हत्या करवाने की सोची.
इस सोच का सूत्रधार इरविन (गवर्नर जनरल व वायसराय लार्ड इरविन नहीं) नामक एक नील बागान प्रबंधक था. मोतिहारी जिले में जन्मे बतख मियां अंसारी (वल्द मुहम्मद अली अंसारी) इसी इरविन के यहां रसोइये का काम करते थे. एक दिन जब उसने उन्हें बुलाकर महात्मा को मार डालने की अपनी साजिश में शामिल करना चाहा.
इसके बदले वेतन बढ़ाने, साथ ही भरपूर इनाम और जमीन वगैरह देकर मालामाल कर देने का प्रलोभन दिया तो उन्हें अपने पांवों के नीचे की धरती सरकती-सी महसूस होने लगी. फिर भी बात न मानने पर कठोरतम दंड, बदले की कार्रवाई और अंजाम भुगतने की क्रूर धमकी के कारण वे उसे दो-टूक जवाब देखकर नाराज करने का जोखिम नहीं उठा पाए.
लेकिन जब उसने मोतिहारी जिला मुख्यालय स्थित अपने घर पर महात्मा को उनके सहयोगी डॉ. राजेंद्र प्रसाद ( जो बाद में देश के पहले राष्ट्रपति बने) के साथ दावत पर बुलाया और बतख मियां को उन्हें जहर भरा दूध पिलाने भेजा तो बतख मियां से रहा नहीं गया. उन्होंने अपने भीतर का सारा संकल्प जगाया और जब तक महात्मा दूध का गिलास हाथ में लेकर होंठों से लगाते, रुद्ध कंठ से बता दिया कि उसमें जहर मिला हुआ है और वे उसे न पीएं. कहते हैं कि इसके बाद बतख मियां भावुक होकर फफक-फफक कर रोने भी लगे.
साजिश विफल हो गई तो कुछ देर को इरविन निष्प्रभ जरूर हुआ, लेकिन बाद में उसके क्रोध व कोप का कोई पारावार नहीं रह गया. उसने न सिर्फ बतख मियां को अपना रसोइया नहीं रहने दिया, बल्कि बहुत मारा-पीटा भी. फिर जेल भिजवाकर उनकी सारी संपत्ति जब्त, घर नीलाम और उनके गांव से उनका निर्वासन करा दिया.
फिर तो बेघर-बेदर बतख मियां को अपने परिवार के साथ जाने कहां-कहां भटकना पड़ा. फिर भी उन्होंने आजादी के विषम युद्ध में उलझे महात्मा, डॉ. राजेंद्र प्रसाद या किसी और नेता से किसी भी तरह के अनुग्रह या मदद की मांग नहीं की. आजादी के कुछ साल बाद देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद एक सभा को संबोधित करने मोतिहारी आए तो पाया कि सभा के एक कोने से एक व्यक्ति बार-बार उनके पास आने की कोशिश कर रहा है और पुलिस के सिपाही उसे रोक रहे हैं.
तब उन्होंने उसको मंच पर बुलाकर गले से लगाया और सभा में उपस्थित लोगों को बताया कि वे बतख मियां हैं, जिन्होंने 1917 में महात्मा गांधी को जहर देकर मार देने की इरविन की साजिश से उनके प्राण बचाए थे. बतख मियां की आपबीती सुनकर वहां उपस्थित जिलाधीश ने उन्हें कुछ एकड़ कृषि भूमि देने का आदेश दिया, लेकिन दुर्भाग्य कहें या लालफीताशाही, 4 दिसंबर 1957 को अपनी मृत्यु तक वह उन्हें नहीं मिल पाई.