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जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल: दूसरे दिन कृष्णा सोबती के निधन से छाई उदासी, फिर जावेद-शबाना ने भरे रंग

By अनुभा जैन | Updated: January 26, 2019 03:20 IST

अपनी संस्कृति और जडों की तरफ आज की युवा पीढी में फिर से झुकाव दिखने लगा है। इसलिये बरेली की बर्फी, सुई धागा जैसी आम घरों की कहानियां वाली फिल्में फिर बनने लगी है- जावेद अखतर

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प्रोगरेसिव शायरों के कलामों व शायरियों में भाषा से परे रेवेल्यूशन और रोमांस दोनों देखने को मिलता है। 1936 में लखनउ में मुंशी प्रेमचंद और रविंद्रनाथ टैगोर की देखरेख में सभी भाषाओं के कवि शायर एकत्रित हुये और प्रेमचंद ने कहा कि शायरी व नजम सिर्फ खुशी ना देकर समाज में व्यापत गुलामी, मजबूरीयों के खिलाफ समाजिक न्याय व बदलाव लाने का संदेश देने वाली होनी चाहिये। यह बातें उर्दू कवियों द्वारा अधिक की गयी। यह कहना था जाने माने लेखक संगीतज्ञ व कहानीकार जावेद अखतर का जो पवन के वर्मा, शबाना आजमी के साथ राना साफवी के साथ सेशन जांनिसार और कैफी पर जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के दूसरे दिन भीड से खचाखच भरे फ्रंट लाॅन में बोल रहे थे। 

जावेद ने आगे कहा कि इस तरह का प्रोगेसिव लेखन 1930 से 1960 में अधिक देखने को मिला। उसके बाद समाज में व्याप्त बुराईयों की बातें कुछ गौण हो गयी लेकिन अब फिर से प्रोगेसिव लेखन मूवमेंट देखने को मिल रहा है। हजरत मुहानी का जिक्र करते हुये जावेद ने कहा कि मुहानी रोमांटिक शायर थे पर मुल्क की आजादी के लिये जेल भी गये।

इसी कडी में कैफी आजमी की पुत्री और जानी मानी कलाकारा शबाना आजमी ने कहा कि कैफी आजमी, जानिसार अखतियार आदि की शायरी में प्रोगेसिव लेखन और मेनिफेस्टो हुआ करता था। उनके काम में रोमांस और रैवल्यूशन दोनों देखने को मिलते थे। जानिसार अखतर के बारे में बोलते हुये शबाना ने कहा कि वह एक ऐसे प्रोगेसिव लेखक कवि थे जो रोमांटिक नजम को पेश करते हुये इतनी बखूबी से अपनी पत्नि के प्रति प्रेम को दर्शाते और साथ ंजीवन के कठिनाईयों को भी बेहद गंभीर अंदाज में प्रस्तुत भी कर देते थे।

भूतपूर्व भारतीय विदेश सेवा में कार्यरत अधिकारी और लेखक पवन के वर्मा ने कहा कि एक भाषा में लिखे साहित्य को अधिकाधिक व विभिन्न भाषा भाषी लोगों तक पहुंचाने के लिये सही ट्रांसलेशन की जरूरत होती है।

हिन्दी सिनेमा में भाषा के बारे में बात करते हुये शबाना ने कहा कि भाषा किसी धर्म से बंधी ना होकर क्षेत्र को दर्शाती है। लोगों और फिल्म निर्देशक दोनों की अहम भूमिका रहती है समाज को वो क्या दे रहे हैं और लोग क्या देख रहे है। अगर कुछ गलत समाज को परोसा जा रहा है तो लोगों की जिम्मेदारी है कि वह उस तरह के कंटेंट को बढावा ना दें।

जावेद ने कहा कि सिनेमा की कहानी व भाषा समाज से उपतजी है। आज हमारे समाज और शिक्षा में भाषा, रिती रिवाजों, संस्कृति को महत्ता नहीं देने से आने वाली पीढी अपने देश की जडों को भूलते जा रहे है। भाषा संस्कृति को आगे लेजाने का माध्यम है और किसी संस्कृति को दर्शाने वाली विंडो है। लेकिन आज यह संस्कृति का खालीपन देखने को मिलता है। भाषा का यह नुकसान फिल्मों में भी दिखता है।

जावेद ने कहा कि अब अपनी संस्कृति और जडों की तरफ आज की युवा पीढी में फिर से झुकाव दिखने लगा है। इसलिये बरेली की बर्फी, सुई धागा जैसी फिल्में आम घरों की कहानियां बनने लगी है। इस तरह आज के इस तेजी के जमाने में लोगों के पास समय का अभाव है। हम स्पीड तो हासिल कर रहे हैं पर अपनी जडों को भुलाने के मूल्य पर। दो बीघा जमीन जैसी फिल्म उस समय सुपर डुपर हिट हुयी पर आज उसी पटकथा को लेकर किसान जो आज मर रहे है फिल्म बनेगी तो वो नहीं चलेगी क्योंकि लोगों में जडों से जुडाव नहीं रह गया है। आखिर में जावेद ने कहा कि बच्चों को घरों और स्कूलों में ऐसा परिवेश मिले जहां एक मेच्योर सिविलाइसेशन के तौर पर उन्हें आधुनिकता के साथ हमारी संस्कृति के बारे में जुडाव उत्पन्न हो।

आज फेस्टिवल के दूसरे दिन की शुरूआत ज्ञानपीठ पुरूस्कार से सम्मानित 94 वर्षीय मशहूर लेखिका कृष्णा सोबती के निधन पर शोकअभिव्यक्ति के साथ हुयी।

जिया जले - स्टोरिज बिहाइंड दी सोंगस में गुलजार और अनुवादक नसरीन मुन्नी ने अनुवाद के बारे में संजोय के राय से बात की । वहीं एक अन्य सेशन में जानी मानी लेखिका शेाभा डे, रेशल जाॅनसन ने राइटिंग अबाउट रिच के संदर्भ मंे माडरेटर सिदार्थ सांघवी से चर्चा की।

टॅग्स :जयपुर
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