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कुमार सिद्धार्थ का ब्लॉग: अनूठे रंगों का पारस्परिक संगम

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: March 10, 2020 06:00 IST

हमारे देश को ‘अनेकता में एकता’ के लिए जाना जाता है, यहां विविध संस्कृतियां निष्पक्ष रूप से ससम्मान निवास करती हैं. हमारे त्यौहार भी हमें यही सीख देते हैं कि मिलजुल कर रहो, आपसी प्रेम, सद्भावना और सौहाद्र्र कायम रहे. होली तो सदियों से सभी संस्कृतियां एकजुटता से मना रही हैं.

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ठळक मुद्देआज की महानगरीय संस्कृति की आपाधापी और भागदौड़ में होली का त्यौहार भी औपचारिकता और दिखावे की भेंट चढ़ता जा रहा है. यह कहना गलत नहीं होगा कि होली मात्न रंगों का त्यौहार नहीं है बल्कि बहुत से विविध और अनूठे रंगों का पारस्परिक संगम भी है.

तीज-त्यौहारों वाले देश भारत में होली अनूठा एवं अलौकिक त्यौहार है, यह लोक पर्व है, मनुष्यता का पर्व है, समाज का पर्व है, संस्कृति का पर्व है एवं यह बंधनमुक्ति का पर्व है. फाल्गुन के बासंती रंगों से सजा पर्व होली, जिसकी गरिमा इसमें बरसते रंगों, खुशनुमा माहौल और परस्पर समरसता से दृष्टिगोचर होती है. 

भारत में होली के अपने धार्मिक, ऐतिहासिक और पौराणिक परिप्रेक्ष्य हैं, जहां यह रंगोत्सव सनातन धर्म के पन्नों में राधा-कृष्ण के प्रेम के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, वहीं मुगल काल में शाहजहां के समय ‘ईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पाशी (रंगों की बौछार)’ के तौर पर भी होली का नाम इतिहास में दर्ज है. 

राजस्थान के अलवर संग्रहालय में एक पुरातन चित्न के अंतर्गत जहांगीर को होली खेलते दिखाया गया है, यहां तक कि मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी के साहित्य में भी रंगोत्सव होली का जिक्र आता है.  

हमारे देश को ‘अनेकता में एकता’ के लिए जाना जाता है, यहां विविध संस्कृतियां निष्पक्ष रूप से ससम्मान निवास करती हैं. हमारे त्यौहार भी हमें यही सीख देते हैं कि मिलजुल कर रहो, आपसी प्रेम, सद्भावना और सौहाद्र्र कायम रहे. होली तो सदियों से सभी संस्कृतियां एकजुटता से मना रही हैं.

असल में होली बुराइयों के विरुद्ध उठा एक प्रयत्न है, इसी से जिंदगी जीने का नया अंदाज मिलता है, औरों के दुख-दर्द को बांटा जाता है, बिखरती मानवीय संवेदनाओं को जोड़ा जाता है. बदलते परिवेश के साथ हालांकि होली का स्वरूप भी बहुत हद तक परिवर्तित हो चुका है. 

आज की महानगरीय संस्कृति की आपाधापी और भागदौड़ में यह त्यौहार भी औपचारिकता और दिखावे की भेंट चढ़ता जा रहा है. पावन पर्व रंगोत्सव में आई इन विकृतियों को दूर करने के लिए हमें मंथन करना होगा और होली के वास्तविक अर्थ को आत्मसात करना होगा. 

यह कहना गलत नहीं होगा कि होली मात्न रंगों का त्यौहार नहीं है बल्कि बहुत से विविध और अनूठे रंगों का पारस्परिक संगम भी है. बुरा न मानो होली है, कहकर सामाजिक मर्यादा का उल्लंघन करने के स्थान पर होली के अति पावन पर्व पर संकल्पित मन से यह निश्चय करें कि पवित्न विचारों के साथ होली के रंगों से अपना जीवन मंगलमय बनाएंगे.

टॅग्स :होली
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