शिक्षा नीति के क्रियान्वयन की राह और चुनौतियां, गिरीश्वर मिश्र का ब्लॉग

By गिरीश्वर मिश्र | Published: July 29, 2021 01:28 PM2021-07-29T13:28:32+5:302021-07-29T13:29:38+5:30

शिक्षा समाज की खास जरूरत होती है क्योंकि समाज अपनी कैसी रचना करना चाहता है इसका विकल्प शिक्षा द्वारा तय होता है.

India explored education system  itself and prepared ambitious draft road and challenges policy Girishwar Mishra's blog | शिक्षा नीति के क्रियान्वयन की राह और चुनौतियां, गिरीश्वर मिश्र का ब्लॉग

नई शिक्षा नीति इस समस्या की काट सोचती है और अध्ययन के विषय और पद्धति में लचीलेपन का स्वागत करती है.

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Highlightsशिक्षा संस्था में इन मूल्यों को जीने का अवसर मिल सकता है.स्वाधीन भारत की संकल्पना साकार हो सकती है.हमें मूल्यांकन के नए विकल्प ढूंढने ही होंगे. साथ ही ऑनलाइन शिक्षा को भी व्यवस्था में शामिल करना होगा.

यह संतोष का विषय है कि लगभग तीन दशकों के बाद भारत ने अपने लिए शिक्षा व्यवस्था की पड़ताल की और देश के लिए उसका एक महत्वाकांक्षी मसौदा तैयार किया. भारतीय शिक्षा के इतिहास में यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसका आयोजन खुले मन से शिक्षा से जुड़े सभी पहलुओं पर गौर करते हुए किया गया और इसे लेकर विचार-विमर्श का पूरा अवसर दिया गया.

ऐसा करना  इसलिए भी जरूरी हो गया था क्योंकि शिक्षा जगत की समस्याएं लगातार इकट्ठी होती रहीं और सरकारी उदासीनताओं के चलते कुछ नया करने की गुंजाइश नहीं हो सकी. परिणाम यह हुआ कि आकार में विश्व की एक प्रमुख वृहदाकार शिक्षा व्यवस्था तदर्थ (एडहॉक) व्यवस्था में चलती रही. हम लोग पुराने ढांचे में छिटफुट बदलाव और थोड़ी-बहुत काट-छांट यानी कतरब्योंत से काम चलाते रहे.

औपनिवेशिक विरासत को ओढ़ते हुए और उसके विभिन्न पक्षों को संभालते हुए और ‘शिक्षा’ को छोड़कर एक यांत्रिक नजरिए से ‘मानव-संसाधन’ पैदा करने की कोशिश में लगे रहे. इस वरीयता के चलते प्रौद्योगिकी और प्रबंधन के उच्च शिक्षा संस्थान हर तरह का समर्थन प्राप्त करते रहे और अन्य संस्थाएं भगवान भरोसे छोड़ दी गईं.

परिणाम यह हुआ कि कम गुणवत्ता की संस्थाओं का अंबार लग गया पर उनके समुद्र में श्रेष्ठ संस्थाओं के कुछ टापू नजर आते रहे जिनमें पढ़-लिख कर युवा विदेश जाने को तत्पर रहे. सभी संस्थाओं की अपनी जीवनी होती है और निहित रुचियां या स्वार्थ भी होते हैं जिनके तहत उनका संचालन होता है. नई शिक्षा नीति इन पर भी गौर कर रही है और संरचनात्मक रूप से बदलाव की तैयारी में है.

शिक्षा समाज की खास जरूरत होती है क्योंकि समाज अपनी कैसी रचना करना चाहता है इसका विकल्प शिक्षा द्वारा तय होता है. न्याय, समता और स्वतंत्नता जैसे सरोकार स्थापित करने के लिए और नागरिक के दायित्व मन में बैठाने के लिए शिक्षा अवसर दे सकती है बशर्ते उसका आयोजन इन मूल्यों की अभिव्यक्ति करते हुए किया जाए.

शिक्षा संस्था में इन मूल्यों को जीने का अवसर मिल सकता है और स्वाधीन भारत की संकल्पना साकार हो सकती है. इसके लिए जिस मानसिकता की आवश्यकता है वह प्रवेश और परीक्षा की चालू अनुष्ठानप्रधान शैली से नहीं निर्मित हो सकती. कोरोना के दौर में यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि हमें मूल्यांकन के नए विकल्प ढूंढने ही होंगे. साथ ही ऑनलाइन शिक्षा को भी व्यवस्था में शामिल करना होगा.

सृजनात्मक होना जितना जरूरी है, ठीक उतनी ही शिद्दत से हमारी शिक्षा अनुकरणमूलक व्यवस्था और पुनरुत्पादन के आसरे चलती आ रही है. नई शिक्षा नीति इस समस्या की काट सोचती है और अध्ययन के विषय और पद्धति में लचीलेपन का स्वागत करती है. इसे लागू करने के लिए बहुविषयी संस्थाओं और अवसरों की विविधता का प्रावधान किया गया है.

इसी तरह मातृभाषा में शिक्षा मिले, इस बात की वकालत करते हुए पद्धति में बदलाव लाने की कोशिश की बात की गई है. शिक्षा को सिर्फ किताबी न बनाकर जीवनोपयोगी बनाने पर जोर दिया गया है. इसी तरह संस्थाओं को स्थानीय समाज और पारिस्थितिकी से सतत जुड़ने का अवसर बनाने के लिए भी कहा गया है. शिक्षक-प्रशिक्षण हमारे लिए एक बड़ी चुनौती बन चुकी है.

नई शिक्षा नीति के प्रति वर्तमान सरकार ने अनेक अवसरों पर प्रतिबद्धता दिखाई है परंतु कोरोना की अप्रत्याशित उपस्थिति ने उसके क्रियान्वयन में गतिरोध पैदा किया है. नीति को लेकर शिक्षा जगत में वेबिनारों की सहायता से जागृति फैली है, भ्रम दूर हुए हैं और लोगों में आशा का संचार हुआ है. शिक्षा नीति के विभिन्न पक्षों पर मार्ग योजना के लिए विशेषज्ञों के दल कार्यरत हैं.

अब आवश्यकता है कि संरचनात्मक सुधारों को लागू किया जाए, पर सबसे जरूरी है कि शिक्षा संस्थाओं में शैक्षिक वातावरण की बहाली की जाए और अकादमिक संस्कृति का क्षरण रोका जाए. शिक्षा की गरिमा की रक्षा के लिए यह ध्यान देना होगा कि गैर शैक्षिक माहौल शिक्षा जगत को न लील सके.

साथ ही इसके उपाय भी करने होंगे कि अधकचरे ढंग से नए शिक्षा संस्थान खोलने की अपेक्षा जो संस्थान हैं, उन्हें ठीक से चलाया जाए. इसके लिए शिक्षा में अधिक निवेश करना होगा. पिछले कुछ वर्षो से विश्वस्तरीय संस्थान बनाने की चेष्टा हो रही है पर हमें उससे अधिक अपनी जरूरतों पर भी सोचना होगा और शिक्षा को देश के अनुकूल और पूरे समाज को समर्थ बनाने पर भी ध्यान देना होगा.

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