मुफ्त की रेवड़ी वाकई गंभीर चिंता का विषय है!

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: February 21, 2026 07:20 IST2026-02-21T07:19:09+5:302026-02-21T07:20:47+5:30

ऐसे में तो कोई कार्य संस्कृति ही पैदा नहीं होगी! यह वाकई गंभीर मसला है और देश के विकास में व्यवधान पैदा करने वाला है.

Free sweets are indeed a matter of serious concern | मुफ्त की रेवड़ी वाकई गंभीर चिंता का विषय है!

मुफ्त की रेवड़ी वाकई गंभीर चिंता का विषय है!

परजीवियों की जमात खड़ी करने को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने जो टिप्पणी की है, वह पूरे देश की चिंता है. कायदे से सत्ता का काम यह है कि रोजगार के इतने अवसर उपलब्ध करा दिए जाएं कि हर हाथ को काम मिले और लोगों की अपनी जरूरतें पूरी हो सकें.

इसमें कोई संदेह नहीं कि ज्यादातर राज्य सरकारें इसमें असफल रही हैं तो उन्होंने मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए मुफ्त योजनाओं का सहारा लेना प्रारंभ कर दिया. अब तो यह चलन ही हो गया है. कहीं मुफ्त बिजली बंट रही है, कहीं साइकिल तो कहीं लैपटॉप! जाहिर सी बात है कि सरकार यह सब करदाताओं के पैसे से ही कर रही है. जो गरीब हैं, उन्हें जरूरत की चीजें उपलब्ध कराने में किसी को कोई गुरेज नहीं होगा.

गरीबों की सहायता करना सरकार का धर्म है, लेकिन जिन लोगों को अभी ये सुविधाएं मिल रही हैं, वे क्या वाकई गरीब हैं? एक तरफ तो दावा यह किया जाता रहा है कि देश में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की संख्या कम हुई है और दूसरी तरफ मुफ्त योजनाओं का लाभ लेने वालों की संख्या है. क्या इन दोनों आंकड़ों का किसी ने विश्लेषण किया है? कोई भी राजनीतिक दल इस तरह के विश्लेषण के लिए तैयार नहीं होगा क्योंकि हर दल लुभाने की राजनीति को सरल मानता है. सर्वोच्च न्यायालय ने बहुत सही कहा है कि कई राज्य सरकारें कर्ज और घाटे से दबी हुई हैं, इसके बावजूद वे मुफ्त योजनाएं चला रही हैं.

सर्वोच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी तमिलनाडु में मुफ्त बिजली के संबंध में दायर याचिका की सुनवाई के दौरान की. यदि हम बिजली का मामला ही देखें तो हो सकता है कि कुछ लोग वाकई इतने गरीब हों कि वे बिजली का बिल नहीं दे पाएं. उनके घरों में भी रोशनी की जिम्मेदारी सरकार की है और ऐसे लोगों को मुफ्त बिजली देने में कोई हर्ज नहीं है लेकिन सरकारें तो धड़ल्ले से मुफ्त बिजली बांट रही हैं!

तुष्टिकरण की यह राजनीति देश के लिए घातक साबित हो रही है. सर्वोच्च न्यायालय ने बिल्कुल सही कहा है कि आप परजीवियों की जमात खड़ी कर देंगे, मुफ्त खाना देंगे, मुफ्त बिजली देंगे तो कौन काम करना पसंद करेगा? ऐसे में तो कोई कार्य संस्कृति ही पैदा नहीं होगी! यह वाकई गंभीर मसला है और देश के विकास में व्यवधान पैदा करने वाला है. इसलिए सारे राजनीतिक दलों को बैठ कर इस पर विचार करना चाहिए कि जो बेहद जरूरतमंद हों, सहायता केवल उन्हीं के लिए हो. मुफ्त की रेवड़ी नहीं बांटी जानी चाहिए!

Web Title: Free sweets are indeed a matter of serious concern

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