बच्चों को हिंसक नहीं, संवेदनशील बनाए शिक्षा
By ललित गर्ग | Updated: February 27, 2026 08:58 IST2026-02-27T08:57:56+5:302026-02-27T08:58:15+5:30
शिक्षा को जीवन का उत्सव बनाएं, न कि भय का कारण

बच्चों को हिंसक नहीं, संवेदनशील बनाए शिक्षा
देश में इन दिनों बोर्ड परीक्षाएं चल रही हैं और सामान्य परीक्षाएं भी शुरू होने वाली हैं. हर साल की तरह इस बार भी परीक्षा का मौसम केवल प्रश्नपत्रों और परिणामों का नहीं, बल्कि मानसिक दबाव, चिंता और असुरक्षा का मौसम बनता जा रहा है. छात्रों के चेहरों पर भविष्य की चिंता साफ पढ़ी जा सकती है. यह चिंता केवल अच्छे अंक लाने की नहीं, बल्कि अपेक्षाओं के बोझ को ढोने की है. दुर्भाग्य यह है कि यह दबाव कई बार इतना असहनीय हो जाता है कि वह आत्मघाती या हिंसक रूप ले लेता है.
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े एक भयावह सच उजागर करते हैं. वर्ष 2013 से 2023 के बीच छात्रों की आत्महत्या की दर में लगभग 65 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है. यह केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के टूटने की कहानी है. इन आत्महत्याओं के पीछे पढ़ाई का दबाव, पारिवारिक अपेक्षाएं, सामाजिक तुलना और आर्थिक तनाव प्रमुख कारण बताए जाते हैं. लेकिन हाल ही में लखनऊ में जो घटना सामने आई, उसने इस संकट को एक और खतरनाक दिशा में मोड़ दिया है.
लखनऊ की घटना केवल परीक्षा के दबाव की कहानी नहीं है, बल्कि परिवारों में बढ़ती संवेदनहीनता, संवादहीनता और मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा का दर्पण है. पुलिस जांच के अनुसार एक पैथोलॉजी लैब संचालक पिता अपने बेटे को डॉक्टर बनाना चाहते थे और उस पर नीट जैसी परीक्षा पास करने का लगातार दबाव बना रहे थे. घटना वाले दिन भी दोनों के बीच बहस हुई और 21 वर्षीय युवक ने पिता की गोली मारकर हत्या कर दी. इसके बाद उसने अपराध छिपाने के लिए शव के टुकड़े किए, कुछ बाहर फेंके, कुछ घर में छिपाए, छोटी बहन को धमकाया और पुलिस को गुमराह करने के लिए पहले लापता होने और फिर आत्महत्या की कहानी गढ़ी.
यह सब बताता है कि यह क्षणिक आवेश नहीं था, बल्कि भीतर लंबे समय से पल रही कुंठा, आक्रोश और मानसिक विघटन का परिणाम था. प्रश्न यह है कि एक बेटे के भीतर इतनी नफरत कैसे पनप सकती है? क्या ‘कुछ बनने’ का दबाव इतना भारी हो सकता है कि वह रिश्तों को भी तार-तार कर दे? हर माता-पिता चाहते हैं कि उनकी संतान सफल हो, प्रतिष्ठित करियर बनाए, समाज में सम्मान पाए. लेकिन जब यह चाहत संवाद और सहयोग की जगह नियंत्रण और दबाव का रूप ले लेती है, तब वह प्रेरणा नहीं, मानसिक उत्पीड़न बन जाती है. ऐसे में शिक्षा जीवन-निर्माण का माध्यम न होकर, विनाश का कारण बन जाती है.
शिक्षा का उद्देश्य जीवनदायिनी होना चाहिए-विवेक, संवेदना और आत्मविश्वास का विकास करना चाहिए. लेकिन जब शिक्षा केवल प्रतिस्पर्धा और रैंकिंग का माध्यम बन जाए, तो वह तनाव और हिंसा को जन्म देती है. अब समय है कि हम सामूहिक आत्ममंथन करें. शिक्षा को जीवन का उत्सव बनाएं, न कि भय का कारण. बच्चों को लक्ष्य दें, लेकिन उनके पंख न काटें. सपने दिखाएं, पर उन्हें सांस लेने की जगह भी दें. जब तक हम सफलता की परिभाषा को व्यापक नहीं करेंगे और बच्चों को अंक से अधिक मनुष्य मानना नहीं सीखेंगे, तब तक यह संकट बना रहेगा.